कतर विवाद के समाधान मे मध्यस्थ बने भारत

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हाल ही मे मध्य एशिया के कुटनीतिक व राजनीतिक गलियारों मे उस समय भूचाल आ गया जब सऊदी अरब , बहरीन समेत छ: देशों ने कतर से सभी तरह के राजनीयिक सम्बन्ध तोड़ लिए| इन देशों का आरोप है कि कतर हमास , मुस्लिम ब्रदरहुड़ जैसे इस्लामी गुटों को निरंतर रुप से आर्थिक व सैन्य सहायता कर रहा है जो क्षेत्रीय स्वायत्तता के लिये खतरनाक है| कतर पर लगाये गये विभिन्न प्रतिबंधो के अनुसार अागामी आदेश तक सभी तरह की हवाई व समुद्री सीमाओं की बहाली बंद कर दी गई है| हालांकि कतर ने स्वंय पर लगाये गये आरोपों को अमानवीय करार देकर न सिर्फ पूरी तरह खारिज कर दिया बल्कि सभी तरह की मांगो को भी मानने से इनकार कर दिया है| इन असमायिक परिस्थितियों मे तुर्की व ईरान कतर को खाध सामग्री मुहैया करा रहे हैं| अचानक पैदा हुए कतर-अरब विवाद ने सभी को आश्चर्यचकित कर दिया साथ ही ये चिंता भी बढ़ा कि कहीं ये विवाद मध्य-पूर्व मे चल रहे उपद्रव का रुप धारण न कर ले| भारत के विवाद मे शामिल सभी देशों से सदैव मधुर व स्थायी सम्बन्ध रहे है| एक अनुमान के मुताबिक भारत हर वर्ष कतर से लगभग 85 लाख टन गैस आयात करता है जो कि कुल खपत का 65 प्रतिशत है| भारत के कतर के साथ विभिन्न प्रकार के वीजा , साईबर सुरक्षा सम्बन्धी समझौते हैं तथा भारत की कई कंपनियां कतर मे रेल , रोड़ , मेट्रो प्रोजेक्ट के लिये कार्य कर रही है| दूसरी ओर सऊदी अरब व मिस्र जैसे देश भारत के पारम्परिक व सांस्कृतिक साझीदार रहे हैं तो इस दृष्टि से भी भारत की भूमिका महत्वपूर्ण हो जाती है| भारत लगभग 20 प्रतिशत कच्चा तेल सऊदी अरब से प्राप्त करता है व लगभग 27 लाख भारतीय सऊदी अरब मे कार्य कर रहे हैं जो देश की जीडीपी का महत्वपूर्ण भाग है|

उपरोक्त पहलु ये दर्शाते हैं कि भारत के हित सभी क्षेत्रों मे निहित है , जिनकी अनुपस्थिति व स्थगन की स्थिति हमारे लिए आघात का कारण बन सकते हैं| आवश्यकता इस बात कि है कि इस विवाद की समाप्ति के लिए भारत संतुलित राय से बढ़कर सकारात्मक मध्यस्थ की भूमिका निभाये ताकि इसके माध्यम से न सिर्फ रिश्तों के नए आयाम स्थापित हो साथ ही क्षेत्रीय शांति भी कायम हो सके|

अशफाक खान( इंजीनियरिंग छात्र)

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