दर्पण

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कर दो अमर इस सयोंग को

आँखों की भीगी फ्रिक्वेंसी पर सवार

वह तस्वीर लोकतंत्र की चेतना पर

व्यवस्था की आत्मा पर

संसदिये संवेदना पर

सवालिया निशान है

पत्नी का मृत शरीर नहीं

हमारी सभ्यता की आत्मा लपेट ली है उसने

हिम्मत देखो इसकी

प्रेम और लाचारी के इस सयोंग को

गुज़रते समय ने नोट किया है

तुम भी दोहरा डालो अपनी सुन्नत

 

नोच डालो इसकी हिम्मत को

गूंगा कर दो इसकी खामोशियों को

और कर दो अमर इस सयोंग को भी ।।

 

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