दादरी के संकेत

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देश के अलग-अलग हिस्सों में थोड़े-थोड़े अंतराल पर घट रही कुछ घटनाएं हैं, जिनका प्रत्यक्ष रूप से एक-दूसरे से सीधा संबंध भले न हो, लेकिन इनका डीएनए विश्लेषण किया जाए तो इनका आपसी संबंध समझा जा सकता है। पूर्व प्रधानमंत्री अटल बिहारी वाजपेयी के विशेष कार्याधिकारी रहे सुधीन्द्र कुलकर्णी के चेहरे पर कालिख पोतना हो या जम्मू-कश्मीर के निर्दलीय विधायक रशीद मसूद को थप्पड़ मारना, एमएम कलबुर्गी की हत्या हो या फिर दादरी में एखलाक़ को अफवाहों के आधार पर सरेआम मार देना हो। इन सभी घटनाओं की पृष्ठभूमि में एक ऐसी मानसिकता काम कर रही है जो हिटलर और मुसोलिनी से प्रेरित होकर वजूद में आई है।

उत्तर प्रदेश के दादरी इलाके में महज एक अफवाह के चलते भीड़ के बर्बर व्यवहार की जैसी घटना सामने आई है, वह एक धर्मनिरपेक्ष और लोकतांत्रिक व्यवस्था के लिए गंभीर चिंता का विषय होना चाहिए। दादरी के बिसाहड़ा गांव में मौजूद एकमात्र मुसलिम परिवार के गाय का मांस रखने की अफवाह फैली। फिर वहां के मंदिर से इस बात की घोषणा के बाद भीड़ ने उस घर पर हमला कर दिया। घर के मुखिया मोहम्मद अखलाक की र्इंट-पत्थरों से मार-मार कर हत्या कर दी और उसके बेटे को बुरी तरह जख्मी कर दिया। कुछ दिनों पहले कानपुर के शेखपुर गांव में भीड़ ने मंदिर के सामने एक शख्स को पाकिस्तानी आतंकी बता कर पीट-पीट कर मार डाला।

इस घटना के बाद भी सत्ता के नशे में डूबे मंत्रियों के विवादास्पद बयान देश को एक अलग रुख़ पर ले जाने का भरसक प्रयास कर रहे हैं। डा.शर्मा भाजपा के सांसद और केंद्र सरकार में संस्कृति मंत्री भी हैं। दादरी कांड को किसी साजिश की परिणति वे नहीं मानते। वे कहते हैं कोई भी साजिश दो घंटे में नहींहो सकती। साजिश बनाने में एक महीना लग जाता है, एक पखवाड़ा लग जाता है। केंद्र सरकार का मंत्री और इलाके का सांसद ऐसा कह रहा है तो इसके पीछे कौन सा अनुभव है, यह जानने की उत्सुकता है। दादरी कांड में साजिश नहीं थी, यह तो उन्होंने कहा ही, यह भी कहा कि साजिश रच कर भीड़ ने ऐसा किया होता तो घटना के वक्त घर में मौजूद अखलाक की 17 साल की बेटी को छुए बिना लौट नहींगई होती। देश के पर्यटन व संस्कृति मंत्री के इस बयान पर उनकी सरकार को शर्म भले ही न आए लेकिन सभ्य समाज के निवासी जरूर शर्मिंदा एवं चिंतित हैं।

ये घटनाएं यह बताने के लिए पर्याप्त हैं कि हिंदुस्तान के सामाजिक, सांप्रदायिक, जातीय और धार्मिक सौहार्द्र का तानाबाना किस तरह बिखर रहा है। प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी खामोश हैं। अब  जितना उनका बड़बोलापन चुभता है, उतनी ही उनकी खामोशी भी चुभती है। नयनतारा सहगल और अशोक बाजपेयी द्वारा साहित्य अकादमी सम्मान लौटाने और देश में कई जगह से इस सांप्रदायिकता, संकीर्णता, कट्टरता, असहिष्णुता के खिलाफ उठती आवाजों के बावजूद प्रधानमंत्री की चुप्पी टूट नहींरही है। सरकार की संवेदनशीलता कोमा में चली गई है।

एक ओर भाजपा नेताओं के एक के बाद एक आपत्तिजनक बयान आ रहे हैं और दूसरी ओर बड़बोले प्रधानमंत्री, विदेशों में जाकर बड़ी-बड़ी बातें करने वाले नरेन्द्र मोदी इस दर्दनाक घटना पर सांत्वना और अफसोस का एक शब्द भी नहीं बोल पाए। और बोले भी तो उन सांप्रदायिक शक्तियों, जिन्होने देश को नफरत के ज़हर से भर दिया है, पर कटाक्ष करने का साहस भी न जुटा पाए। उनके मन की सारी बातें संवेदनशील सांप्रदायिक मुद्दों पर आकर चुक जाती हैं।

बहरहाल, जिनकी पहचान गोधरा और गुजरात से हो उनसे इससे अधिक की आशा करना बेमानी होगा। एखलाक़ की मौत ने देश के हर उस नागरिक को चोट पहुंचाई है जिसकी भारत गणराज्य और इसके धर्मनिरपेक्ष मूल्यों में आस्था है। अब समय आ गया है कि यही लोग हिन्दुत्व के नाम पर समाज को तोड़ने, समाज में रहने वाले लोगों से अभिव्यक्ति की स्वतन्त्रता छीनने, उनके खानपान और रहन-सहन के अधिकार से वंचित करने वालों के खिलाफ़ उठ खड़े हों ताकि भारत के सामाजिक एवं सांप्रदायिक तानेबाने को बिखरने से रोका जा सके।

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