मतभेद का सलीका और मुस्लिम समाज

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मिल्लत ए इस्लामिया इख्तिलाफात के साथ जीने का सलीका कब सीखेगी.!!!

मोलाना सलमान नदवी बनाम पर्सनल ला बोर्ड की जुबानी जंग से कई नताइज लिए जा सकते हैं.
दोनों तरफ के अफराद, उलेमा और मुबस्सिरिन ने ज़बान व बयान के जिस मेआर का मुजाहिरा किया है उस ज़बान व बयान को आप शायद भाजपा और कांग्रेस, सपा और बसपा, अमेरिका की रिपब्लिक और डेमोक्रेटिक, ब्रिटेन के लेबर और कंज़र्वेटिव में शायद ही पायें. मिल्लत ए इस्लामिया की गुफ्तुगू का सबसे अफ़सोसनाक मुजाहिरा दो अवकात में होता है; या तो हम जब किसी की अंधी तकलीद में मुब्तला होते हैं या फिर किसी से इख्तिलाफ करते हैं. कितने ही उलेमा माजी में अपने मुखालिफिन की ज़बान से काफिर व मुनाफ़िक़ करार पा चुकें हैं.

एक बात वाज़ेह है कि गुज़िश्ता दो सौ सालों में हमने इख्तिलाफ के आदाब के बाब में हमने कुछ नहीं सीखा है. और इस मामले में हम इस क़दर बे रहम हैं कि हम पीछे पलट कर भी नहीं देखते कि हमने क्या खोया और क्या हासिल किया?

अलीगढ़ और देवबंद के दरमियान इख्तिलाफात में मिल्लत ए इस्लामिया का इल्मी मुस्तकबिल बर्बाद हुआ, अलीगढ़ में शिबली नोमानी और सर सय्यद और उनके बाद के रुफका के दरमियान फलसफा ए तालीम पर इख्तिलाफात. देवबंद के मोलाना हुसैन अहमद मदनी और मौलाना अबुलआला मौदूदी के इख्तिलाफात की खलीज आज भी तकरीबन कायम है. नदवा और शिबली नोमानी के इख्तिलाफात ने नद्वे का फिक्री रुख ही यक्तर्फा कर दिया. मोलाना अबुल कलाम आज़ाद और मुहम्मद अली जिन्नाह के दरमियान इख्तिलाफात के सदके में हम आज दो मुल्कों में बटे हुवे हैं.


लिस्ट तवील है लेकिन नतीजा एक है कि मिल्लत ए इस्लामिया हिन्द अपने आपसी फिक्री और इल्मी इख्तिलाफात के लिए एक कॉड ऑफ़ कंडक्ट नहीं रखती, जिसे इख्तिलाफ़ के वक़्त इस्तेमाल करने से सभी फरीक मुत्तफ़िक़ हों.
इख्तिलाफ फिक्री अमल है और बेहद ज़रूरी है लेकिन निज़ाम ए इख्तिलाफ का होना ज्यादा नुकसानदह है. यूरोप में इख्तिलाफात होते हैं तो साइंसी इजादात हो जाती है और हम इख्तिलाफ करते हैं तो बनी बनाई विरासत तबाह हो जाती है!


हमारे मआशरे में इख्तिलाफ की सिर्फ एक ग्रामर है; हक और बातिल, सहीह और गलत, सियाह और सफ़ेद, मुनाफ़िक़ और मोमिन, गद्दार और वफादार. इफ्हाम और तफ्हीम की कोई गुंजाइश ही नहीं होती. सवालात और सेहतमंद तन्कीदों के दरवाज़े हर तरफ से बंद हैं. क्या मौलवी और क्या जदीद तालीम याफ्ता तबक़ा सभी हलकों में इख्तिलाफ बर्दाश्त करने की गुंजाइश नापैद है. किसी भी मिल्ली इदारे को उठा लीजिये अपने आप में खलीजी मुमालिक की तर्ज़ पर एक बादशाहत या आमरियत का माहोल है. हम इख्तिलाफात के साथ जीने का तरीका नहीं सीखेंगे तो ये सिलसिला जारी रहेगा.

उमैर अनस

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