मिल्ली सियासत के ‘शहाबी दौर’ का ख़ात्मा

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शिबली अर्सलान ज़की

कल सैय्यद शहाबुद्दीन,मरहूम हो गए..निज़ामुद्दीन के पंजपीरान क़ब्रस्तान में मिल्लत के विभिन्न वैचारिक धड़े के रहनुमाओं व नुमाइंदों ने उन्हें सुपुर्द-ए-ख़ाक कर दिया,एक पत्रकार मित्र के फेसबुक लाइव के द्वारा मैंने क़ब्रस्तान का मंज़र भी देखा..इस तरह मिल्ली रहनुमाइ व मिल्ली सियासत के ‘शहाबी दौर’ का ख़ात्मा होगया…शहाब साहब को मैं बहुत क़रीब से जानता हूं…वे बिहार के मुस्लिम बहुल किशनगंज लोकसभा क्षेत्र से सांसद रहे,मेरे ज़िला अररिया का बड़ा हिस्सा भी,इस क्षेत्र में शामिल था..अररिया में मेरे वैचारिक-बौद्धिक गुरू मरहूम अफरोज़ आलम एडवोकेट, शहाब साहब के गहरे मित्र थे…अररिया में अफरोज़ आलम एडवोकेट की कुटिया ही उनका मर्कज़ था…अफरोज़ अंकल मरहूम,मुझे उनकी बौद्धिकता,सिद्धांतवादिता और इमानदारी व बेबाक-बेलौस ज़िंदगी की रूदाद सुनाते रहते थे…वे विभिन्न देशों में भारत के एम्बेसडर रहे,बड़े बुद्धिजीवि,क़ानूनची और उच्च स्तरीय लेखक थे…वे वैचारिक तौर पर पक्के सेक्युलर थे,विभिन्न दीनी जमाअतों पर यदा कदा तंक़ीदें भी करते रहते मगर बाबरी मस्जिद एक्शन कमीटी और हिन्दुत्वा फोर्स से लड़ाइ की वजह से मेनस्ट्रीम मीडिया ने उनकी छवी कम्युनल मुस्लिम लीडर की बना दी थी..वे इमानदारी और उसूल-पसंदी में बड़े अख्खड़ और अतिवादी थे..लोग उनसे मिलने में कतराते थे..शैड्यूल और रूटीन के मुताबिक काम किए जाना उनकी आदत थी,भटकाव और वक़्त गुज़ारी के वे बड़े विरोधी थे…डाक्युमेंटेशन और रिकार्ड रखना उनकी ख़ास हौबी थी…जब वो मुशावरत के प्रेसिडेंट नहीं रहे और ‘मुस्लिम इंडिया जर्नल’ के एडिटर भी नहीं रहे,फिर बाद में मुस्लिम इंडिया बंद भी हो गया,तब भी वे डाक्युमेंटेशन का काम करते रहे…उनके मित्र अफरोज एडवोकेट साहब का लेटर लेकर जब मैं आखरी बार उनसे मिलने गया था तो उन्होंने कहा था ‘मैं work alcoholic हूं..आराम नहीं कर सकता…’ मिल्लत में अब ऐसे उच्च कोटी के स्कालर,इमानदार व बेबाक राजनेता और भारतीय संविधान व राजनीति के राज़-आशना नहीं रहे….
(लेखक ‘छात्र विमर्श ” के पूर्व संपादक हैं )

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