मुगलसराय- नाम बदलो अभियान की विनम्र भेंट

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भारतीय रेलवे का दिल कहे जाने वाला “मुगलसराय” अपने नाम ही में एक विशेष आकर्षण समोहे दुबका सा अपने अतीत की पहचान लिए उत्तरप्रदेश की सरज़मीं पर विराजमान है।
विश्व में अपनी अलग पहचान रखने वाला मुगलसराय एशिया का सबसे बड़ा रेलवे यार्ड व एशिया की विशालतम कोयला मण्डी के लिए भी चर्चित है।मुगलसराय को भारतीय रेलवे में एक महत्वपूर्ण स्थान प्राप्त है।
मुगलकालीन समय में यहां मुगलों की दो सरायें हुआ करतीं थीं जिसमें मुगलों की सेना व व्यापारी ठहरा करते थें बाकी इन सरायों के पास इनके मनोरंजन के वास्ते लोगों का जमावड़ा हुआ करता था,इस शहर को बसाने में शेरशाह सूरी का बड़ा योगदान रहा है। मुगलसराय का यह स्टेशन दिल्ली व हावड़ा रेल लाइन के मध्य स्थित है।

पहले केंद्र में भाजपा सरकार को बहुमत प्राप्त हुआ तब गुड़गांव का नाम गुरुग्राम कर दिया गया,गुड़गांव के गुरुग्राम हो जाने या मुगलसराय के दीन दयाल में परिवर्तित हो जाने से अगर देश के विकास में वाक़ई सहयोग प्रदान होता है तो पूरे देश मे “नाम बदलो”अभियान चलाया जाना चाहिए क्योंकि देश को ऐसे विकास की सख्त ज़रुरत है जिसके लिए संघर्ष लगने का तो सवाल ही ना उठता हो बस नाम बदलने का आदेश काफी है।

ये हमारे लिए नया नही है,यूपी में योगी राज आने के बाद ऐसा होना सम्भव था क्योंकि यह वही सत्ता है जिसका इतिहास ही इतिहास के साथ खेल खेलना का रहा है,भारत की पहचान के रूप में प्रसिद्ध “मुगलसराय”कुछ दिन बाद सरकारी दस्तावेजो के पूर्ण होते ही मार दिया जाएगा,अगर कुछ बाकी रहेगा तो अपनी पहचान के साथ छेड़छाड़ को लेकर सवाल करती हुई पुरानी इमारतें ओर दीवारें का ढर्रा।

क्या बहुमत से सत्ता प्राप्ति के बाद ये सब करना इतना आसान हो जाता है कि कुर्सी पर विराजमान चंद लोग कुछ भी अपनी दिमागी उपज के आधार पर निकालें और वो स्वीकृत हो जाए ? क्या देश की पहचान का कत्ल कर देना इतना ही आसान है जैसा हो रहा है ?

सत्ता प्राप्ति का यह उपयोग मेरी नज़र में अपराध से बढ़कर कुछ नही है,बीबीसी की एक ताज़ा रिपोर्ट को पढ़ते हुए मुगलसराय में रहने वाले कुछ लोगों के बयान को मैने ध्यान से पढ़ा तो पाया कि वहां के लोग इस सरकारी फरमान से चिंतित तो है हीं साथ ही विरोध में उतरने की योजनाएं भी बना रहे हैं।

अब सवाल यही है कि किसी गांव,शहर या स्टेशन का नाम बदलवाने की ललक किसे ज़्यादा होनी चाहिए ?
वहां रह रहे लोगों को या सरकार को ? जवाब बहुत साधारण सा है कि वहां की आम जनता इस निर्णय के लिए ज़्यादा इछुक पाई जाना ज़्यादा ज़रूरी है,लेकिन मुगलसराय का नाम बदलकर दीनदयाल उपाध्याय कर देने में मुगलसराय की जनता रत्ती भर भी रूचि नही रखती।

गुड़गांव से गुरुग्राम हो जाने के बाद देश के एक खास तबके की अंतरात्मा को तसल्ली ज़रूर मिल गई हो लेकिन ज़्यादा कुछ नही बदला या हुआ। आज भी एक आम आदमी दिल्ली से गुड़गांव को जाते हुए अपने परिवार या साथियों को यही कह कर निकलता है कि भई गुड़गांव जा रहा हूँ !

क्या मुगलसराय का नाम बदल दिया जाना भी इतना आसान होगा ?
आप पांचवी के बच्चे को महारणा प्रताप की अकबर पर विजय होने की झूठी कहानी पढ़ा सकते हैं तब इससे ज़्यादा मैं आपकी मंशा पर क्या शक करूँ सरकार जी ?

खेल खेल रहे हैं आप देश के साथ, खेलिए क्योंकि आपका वक़्त है।
लेकिन ये अपराध है ध्यान कर लीजिए ज़्यादा दिन चलने वाला नही है।

अहमद कासिम (राजस्थान विश्विद्यालय,जयपुर)

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