रामजास का ‘रण’ और हिंसक होती छात्र राजनीति

हम जब केरल और बंगाल के छात्र आंदोलन की पड़ताल करते हैं तो वहां भी हमें वाम छात्र संगठनों का ऐसा ही वीभत्स्य रूप दिखता है। जादवपुर यूनिवर्सिटी, कोलकाता यूनिवर्सिटी केरल के कन्नूर और कालीकट यूनिवर्सिटी में एसएफआई की हिंसक छात्र फासीवादी रूप में और भी खतरनाक दिखती है। दिल्ली के कैम्पसों में जहाँ यह डेमोक्रेसी और डिसेंट के झंडे बुलंद करते हैं वहीँ केरल और बंगाल में फासीवादी हो जाते हैं।

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रामजास कॉलेज, नयी दिल्ली

शारिक़ अंसर…

पिछले साल 9 जनवरी को दिल्ली विश्वविद्यालय की आर्ट्स फैकल्टी में एक सेमिनार रखा गया था। विषय था ”श्री रामजन्म भूमि मंदिर: उभरता परिदृश्य” कार्यकर्म एक अनुसंधान पीठ ने रखा था जिसकी स्थापना अशोक सिंघल ने की थी। कार्यक्रम की अध्यक्षता सुब्रमण्यम स्वामी कर रहे थे और सुनने वालों में भी दक्षिणपंथी शिक्षक और छात्र की तादाद ज़्यादा थी। कार्यक्रम के विरोध में वामपंथी छात्र संगठन, शिक्षकों का समहू ने खूब हल्ला काटा। कैंपस परिसर में बड़ी तादाद में पुलिसबल तैनात कर दिए गए और प्रदर्शनकारियों ने घंटों ज़ोरदार विरोध प्रदर्शन किया। कहा गया कि कैंपस को ‘एक विचारधारा की  साम्प्रदायिक सोच’ का केंद्र नहीं बनने देंगे।

 

अब फिर से एक साल बाद दिल्ली विश्वविद्यालय के रामजास कॉलेज में जेएनयु छात्र उमर खालिद को एक कार्यक्रम में बोलने को लेकर  दक्षिणपंथी छात्र  यही आरोप लगा रहे हैं कि कैंपस में देशद्रोहियों को बोलने नहीं देंगे। छत्तीसगढ़ और झारखण्ड के आदिवासियों के मुद्दे पर उमर खालिद तीन अन्य वक्ताओं के साथ यहाँ आमंत्रित थे।  कार्यक्रम के विरोध और समर्थन में छात्र संगठन आंदोलित हो गए और देखते देखते दक्षिणपंथी छात्र संगठन के हिंसक रूप ने छात्र राजनीति के दायरे को कलंकित कर दिया।

 

दिल्ली विश्वविद्यालय, मौरिस नगर थाना, दिल्ली पुलिस हेडक्वार्टर, नार्थ कैंपस, मंडी हाउस से पार्लियामेंट विरोध प्रदर्शनों का केंद्र बन गया। लेफ्ट-राईट और रॉंग-राईट की इस लड़ाई ने मीडिया को यूपी चुनाव से हटा कर ‘डीयु का संग्राम’ जैसे ब्रेकिंग न्यूज़ और डिबेट करने पर मज़बूर कर दिया।  इस घटना से दिल्ली विश्वविद्यालय की छात्रा गुरमेहर कौर सबसे ज़्यादा शिकार हुई। महज़ 20 साल की गुरमेहर कौर अपने फौजी पिता की मौत पर अपने ‘मन की बात’ कहने भर में सोशल मीडिया के ऑनलाइन गुंडा गर्दी की शिकार हुई। उसे ट्रोल किया गया, गालियां बकी गई,  बलात्कार करने की धमकी मिली, उसके राजनीतिक कनेक्शन तलाशे गए और पाकिस्तान भेजने तक की बात कही गई। बिल आखिर उसे कैंपस छोड़ कर अपना घर जालंधर जाना पड़ा। सोशल मीडिया कब एन्टी सोशल हो जाता है पता ही नहीं चलता।  इसका यह वीभत्स चेहरा हमें ऐसे मौकों पर ज़्यादा देखने को मिलता है। सोशल मीडिया ‘फ्रीडम ऑफ़ स्पीच’ का सबसे सशक्त माध्यम कब ऑनलाइन गुंडागर्दी में बदल जाए कहा नहीं जा सकता।

 

इस घटना से फिर से कैंपस में ‘बोलने की आज़ादी’ और ‘छात्र राजनीति’ दोनों सवालों के घेरे में है। कुछ लोग इसे यूपी चुनाव में बीजेपी के पिछड़ने और आखिरी बचे दो चरणों के चुनाव में ध्रुवीकरण की सोची समझी रणनीति बता रहे हैं तो कई लोग छात्र संगठनों के बीच  के वर्चस्व की लड़ाई। लेफ्ट- राईट और रॉंग-राईट  में उलझे इस घटना से एक बात साफ़ होती है कि कैंपस पॉलिटिक्स भी अपने मेनस्ट्रीम पॉलिटिक्स की राह पर चल निकली है। देश के महत्वपूर्ण कैम्पसों में भी साम्प्रदायिक जहर फैलता जा रहा है जिसका शिकार न सिर्फ छात्र और संस्थान हो रहे हैं अपितु समाज भी कलंकित हो रहा है। कैंपस छात्र राजनीति की नर्सरी होती है, यहाँ छात्र पढ़ाई के साथ नए नए विचारों से रूबरू होते हैं। लेकिन वर्तमान में शैक्षिक संस्थान वैचारिक दुराग्रह के केंद्र बनते जा रहे हैं।

 

हैदराबाद सेंट्रल यूनिवर्सिटी में रोहित वेमुला की संस्थागत हत्या, जेएनयू में 9 फरवरी की घटना, नजीब की गुमशुदगी, इलाहाबाद या पुणे की घटना हर जगह सरकार की मौन चुप्पी या संरक्षण और एकतरफा कार्यवाई  ने लोगों को विचलित किया ।  रामजास कॉलेज में हुए छात्रों और अध्यापकों पर हमले के दौरान केंद्र सरकार के अधीन दिल्ली पुलिस की एकतरफा कार्यवाई और सरकार का रवैया सवाल खड़े कर रहे हैं।

 

संघ का शिक्षण संस्थानों में दखल पहले भी होता रहा है लेकिन भाजपा के सत्ता में आते ही शिक्षण संस्थाओं की  अकादमिक स्वायत्ता‘ खतरे में पड़  गयी है।  सरकार भी जैसे संघ के इशारे पर अपने छात्र संगठन को आगे करती है। रोहित के मेल में बंडारू दत्तारे का पत्र लिखना, जेएनयू की घटना पर महेश गिरी और अब रामजास की घटना पर किरण रिजिजू का शर्मनाक बयान।  

 

मोदी सरकार के सत्ता में आते ही दक्षिणपंथी छात्र संगठन कैंपस में अपने वर्चस्व को जनबल, बाहुबल और अब सत्ता बल के बूते हर हाल में मज़बूत से मज़बूत करना चाहती है। लेकिन हिंसा के तरीके से छात्रों के इस आंदोलन को सही नहीं ठहराया जा सकता। रामजास में गुरमेहर कौर से पहले प्रोफेसर प्रशांतो चक्रवर्ती की पिटाई ने भगवा ब्रिगेड के शील एकता की कलई खोल दी। ये वही व्यवस्थित गुंडे हैं जो कभी उज्जैन में प्रोफेसर की हत्या करते हैं तो मोदी के खिलाफ टिप्पणी पर दिल्ली विश्वविद्यालय के प्रोफेसर उमेश राय की पिटाईकैंटीन का मुद्दा उठाने पर छात्रा पर हमला  कराते है  कैंपस गुंडागर्दी की इनकी  एक लम्बी कहानी है। 

 

 

ऐसा नहीं है कि केवल एक विचारधारा ही कैंपस हिंसा में शामिल रही हैं।  हम जब केरल और बंगाल के छात्र आंदोलन की पड़ताल करते हैं तो वहां भी हमें वाम छात्र संगठनों का ऐसा ही वीभत्स्य रूप दिखता है। जादवपुर यूनिवर्सिटी, कोलकाता यूनिवर्सिटी केरल के कन्नूर और कालीकट यूनिवर्सिटी में एसएफआई की हिंसक छात्र फासीवादी रूप में और भी खतरनाक दिखती है। दिल्ली के कैम्पसों में जहाँ यह डेमोक्रेसी और डिसेंट के झंडे बुलंद करते हैं वहीँ केरल और बंगाल में फासीवादी हो जाते हैं। 

शिक्षण संस्थान दरअसल कई वैचारिक संघर्षों की प्रयोगशाला होती हैं। ये संघर्ष अकादमिक स्तर के होते हैं। अलग अलग विचारों पर बहस व मुबाहसे इसे खूबसूरत बनाते हैं। देश की आज़ादी से पुर्व छात्र आंदोलनों ने राजनीतिक और सामाजिक सतह पर कई स्वर्णिम बदलाव किये। देश और समाज को नई दिशा देने में महत्वपूर्ण भूमिका अदा  किये हैं। लेकिन आज छात्र राजनीति अपने भटकाव के दौर से गुज़र रही है। इसे ठीक करना और दिशा देना ज़रूरी है। अकादमिक जगत से लोगों को कई उम्मीदें हैं।
(लेखक स्वतन्त्र पत्रकार हैं )

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