राष्ट्र-निर्माण के लिए ख़तरे

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अनवर काठात, ब्यावर
यह विषय जितना बड़ा है उतना ही महत्वपूर्ण और आवश्यक भी है, इसका जितना सम्बन्ध विचारों से है उतना ही गहरा रिश्ता वर्तमान सामाजिक वास्तविकताओं से भी है, इसलिए इस विषय पर सोचना-विचारना बहुत ज़रूरी बन जाता है, ख़ासकर वैचारिक संगठनों के लिए तो यह अति-आवश्यक है!
विषय के दो भाग है, दोनों का आपस में गहरा सम्बन्ध है!
एक यह कि राष्ट्र क्या है, और राष्ट्र-निर्माण से हमारा अभिप्राय क्या है?
दूसरा यह है कि वर्तमान परिस्थितियों में राष्ट्र-निर्माण के पथ में सबसे बड़े ख़तरे क्या-क्या है?
राष्ट्र-निर्माण के खतरों पर चर्चा इस लिए भी आवश्यक है क्योंकि इससे हमारी दूरदर्शिता और समझ विकसित होगी और आगे क्या करना चाहिए, इन सवालों के जवाब मिलेंगें!
राष्ट्र से हमारी मुराद एक ख़ास भू-भाग में रहने वाले निवासियों से और उनमें पाए जाने वाले एकता के एहसास (sense of unity and belongigness) से है!
उस एकता के आधार एक व अनैक हो सकते है!
राष्ट्र-निर्माण से हमारा अभिप्राय लोगों के कल्याण, संसाधनों के सही वितरण, लोगों की एकता-एकजुटता और जनचेतना से है!
राष्ट्र-निर्माण की जब बात करते है तो सभी की बेहतरी व उत्थान की बात करनी पड़ेगी!
जिस प्रकार बहुत सी ऐसी चीज़े होती है जो राष्ट्र-निर्माण में सहायक होती है ठीक उसी प्रकार राष्ट्र-निर्माण को हमेशा कुछ न कुछ ख़तरे लगे रहते है, कभी कोई राष्ट्र संपूर्ण रूप से खतरों से मुक्ति नहीं प्राप्त कर सका!
वर्तमान परिदृश्य में हम देखे तो राष्ट्र-निर्माण में जो बाधाएं व अवरोध है उन्हें हम मोटे तौर पर चार भागों में बाँट सकते है।
1) राजनैतिक क्षेत्र के खतरे,
2) आर्थिक व सामाजिक क्षेत्र के ख़तरे,
3) शैक्षिक स्तर के ख़तरे,
4) असहिष्णुता!

1) राजनैतिक क्षेत्र के ख़तरे:-
(मुद्दा-विहीन, भ्रष्टाचार, मीडिया के गिरते मानक)
राजनीति एक व्रहद क्षेत्र है, अक्सर चीज़ों को अपने में समोहित करके रखती है!
वर्तमान समय में राजनीति का गिरता स्तर, भाई-भतीजावाद, बेजा आरोप-प्रत्यारोप, मुद्दा-विहीन चुनाव, यह सब भी राष्ट्र-निर्माण के रस्ते में बड़े अवरोध है!
वोट व चुनाव आधारित राजनीति का बाज़ार गर्म है, सत्ता पाने के लिए हर कोई कुछ भी करने को तैय्यार है!
लोकतंत्र को संख्या का खेल और सत्ता हथियाने का एक टूल मात्र समझ लिया व बना दिया गया है, न आम जनता में राजनैतिक जागरूकता है और न ही किसी मुद्दे पर रचनात्मक राजनैतिक इंटरवेंशन करने की समझ!
राजनैतिक व व्यवस्था के गिरते स्तर के कारण हर तंत्र में भ्रष्टाचार वयाप्त है!
जनता लाचार है, पूंजीवादी-राजनीतिक लुटैरे खुश है, छोटे से काम के लिए लोगों को बरसों कोर्ट-कचहरी, थाने-चौकी और अफसरों के आगे-पीछे घूमना पड़ता है फ़िर भी काम नहीं हो पाता!
राजनीति ही के ज़ुमरे में, लोकतंत्र के चतुर्थ स्तम्भ की बनी दुर्दशा व बिकाऊपन को उजागर करना भी ज़रूरी है!
मीडिया व राजनीति की नूराकुश्ती, मीडिया का चंद पूंजीपति-निवेशकों के हाथों में क़ैद हो जाना, टी.वी. डिबेट्स की बातूनी लड़ाइयां, व वास्तविक मुद्दों से इतर फ़ालतू की बहसों में जनता को अटकाए-लटकाए रखने में मीडिया ने बड़ा किरदार निभाया है!
जिसे लोकतंत्र का चतुर्थ स्तम्भ कहा जाता है उसने लोकतंत्र की नीवें ही हिला दी, इसने लोकतंत्र को मज़बूत करने के बजाए उसे खोखला करने में बड़ी मुख्य भूमिका निभाई है!
संक्षिप्त में कहे तो राजनीति का धंधा बन जाना, रचनात्मक राजनीति का अभाव, जनता में राजनैतिक जागरूकता की कमी, मीडिया के गिरते मानक राष्ट्र-निर्माण के रस्ते में बड़े ख़तरे है!
2) आर्थिक व सामाजिक स्तर के ख़तरे:- अर्थ व समाज का एक दुसरे से घनिष्ट सम्बन्ध है, जैसा आर्थिक ढांचा होगा वैसा ही समाज वुजूद में आएगा!
किसी भी राष्ट्र की आर्थिक व्यवस्था व उसकी प्रणाली इस देश की जान होती है, किन्तु भारत की अर्थव्यवस्था विशेषकर वर्तमान युग में एक बड़ा खतरा बन गई है, ख़तरा इस प्रकार से के, न संसाधनों का उपयुक्त वितरण किया जा रहा है, और न ही सबका कल्याण हो आहा है, न विकास में सबकी भागीदारी सुनिश्चित की जा रही है, बढ़ती महंगाई, ग़रीबों व अमीरों के बीच बढ़ती खाई, पूंजीपतियों की चांदी, व आम-आदमी मज़दूर-मेहनतकशों को उनके मूलभूत अधिकारों से वंचित रखा जा रहा है!
इसके साथ-साथ समाज में ऐसे कई तबके है जिन्हें सुनियोजित तरीके से पीछे रखा जा रहा है, उनसे भेदभाव किया जाता है, उन्हें इंसान तक नहीं समझा जाता, यह एक बड़ी सामाजिक समस्या है!
यह आर्थिक व सामाजिक असमानता बल्कि सुनियोजित ख़तरनाक भेदभाव राष्ट्र-निर्माण के लिए बड़ा ख़तरा है!
3) शैक्षिक क्षेत्र की चुनौतियाँ व ख़तरे:-
(शिक्षा की पहुंच, शिक्षा का निजीकरण व बाज़ारीकरण, दोहरी शिक्षा प्रणाली, ओरिजिनल शोध का अभाव, सामाजिक कमिटमेंट का कम होना)
शिक्षा इंसान की बुनियादी ज़रुरत है, अगर किसी शख़्श को अच्छी व वैज्ञानिक शिक्षा ना मिले तो उसका सम्पूर्ण विकास लगभग असंभव है!इसीलिए सभी को मुफ़्त एवं गुणवत्तापूर्ण शिक्षा मुहय्या कराना सरकार की प्राथमिकता होनी चाहिए!
भारतीय सरकारों की सबसे बड़ी विफ़लता यह रही के स्वतंत्रता प्राप्ति के सत्तर वर्ष पश्चात भी यह अपने समस्त नागरिकों तक शिक्षा की पहुँच बना पाने में असफ़ल सिद्ध हुई है!
आज भी करोड़ों बच्चे ऐसे है जिनके सपने साकार करने के लिए न स्कूल है और न ही सरकारी कोशिशों की झलक ही दिखती है!
राष्ट्र के सभी लोगों तक शिक्षा का न पहुँच पाना मतलब राष्ट्र-निर्माण के प्रोसेस से उनका बाहर हो जाना, इससे यह अन्दाज़ा लगाया जा सकता है के यह कितना बड़ा ख़तरा है!
शिक्षा के साथ दूसरी बड़ी समस्या यह रही कि, वो शिक्षा जो कभी पूण्य अर्जित करने का माध्यम हुआ करता था आज वो बाज़ार का एक उत्पाद (product) बनकर रह गया है!
प्रतिभाओं की पहचान-सम्मान-निखार,utilize करना व उन्हें दिशा देना एक रूढ़िवादी काम समझा जाने लगा और डिग्रीज़ व सर्टिफ़िकेट्स बांटने को एक सम्मानजनक कार्य समझा जाने लगा!
कैसे शिक्षा के मानक परिवर्तित हो गए!
जो शिक्षा सरकार को मुहय्या करानी थी सरकार उससे मुंह फेरती रही है, इससे निजी लोगों ने इस क्षेत्र को अपना धंधा बना दिया और शिक्षा को बाज़ार में एक प्रोडक्ट की हैसियत से प्रस्तुत किया!
इस प्रकार से शिक्षा का निजीकरण व व्यवसायिकरण राष्ट्र-निर्माण के लिए एक बुनियादी ख़तरा है!
इसी से जुडी एक और बात यह है कि एक ही देश में दोहरी शिक्षा प्रणाली का चलन है!
वो इस प्रकार से के एक तरफ़ टाटा-बिरला-अम्बानी जैसी संस्थाएं hifi, तमाम सुख-सुविधाओं से सुसज्जित, गुणवत्तापूर्ण शिक्षा दे रही है, जहाँ सिर्फ़ अमीर बापों की रईस औलादें पढ़ती है, ग़रीब बच्चों को ऐसी स्कूलें देखना तक नसीब नहीं होती।
वहीं दूसरी तरफ़ सरकारी स्कूलों का ख़स्ता-सड़ा हाल है जहाँ न खेल का मैदान है, न पुस्तकालय, न टॉयलेट्स है और न ही क़ाबिल टीचर्स। गुणवत्ता का कोई गुण नहीं, स्टैंडर्ड के सारे मानकों का सत्यानाश कर दिया गया है!
जब बचपन से ही शिक्षा की यह दोहरी प्रणाली समाज में रहेगी तो कहाँ से समानता विकसित होगी!
अच्छा माहौल और बेहतर गाइडेंस न मिलने की वजह से विद्यार्थियों में न ओरिजिनल एकेडमिक रिसर्च का न जज़्बा रह पाता है और न ही क़ाबिलियत पैदा हो पाती है।
निजी-निवेशकों ने अपने लिए नौकरशाह पैदा करने के लिए सिर्फ़ प्रोफ़ेशनल techniqal और मैनेजमेंट के कोर्सेज़ को ही प्रमोट किया और humanities व सोशल साइंसेज के सब्जेक्ट्स को प्लानिंग के साथ sideline किया ताकि सवाल पूछने वाले, तंत्र हिलाने वाले, न्याय की आवाज़ उठाने वाले न परवान चढ़े!
इसका यह मतलब हरगिज़ नहीं है कि professional कोर्सेज़ वाले सोचते समझते नहीं बल्कि यह अभिप्राय है कि इन सब में careerism हावी रहता है, जट कोर्स पट नौकरी और बस!
इन सब को ध्यान में रखते हुए यह बात समझ में आती है के समाज व राष्ट्र बहुत सी समस्याओं से जूझ रहा है, देश व समझ किस पथ की तरफ़ अग्रसर है, इनसब पर विद्यार्थियों का ध्यान केंद्रित नहीं है!
इसी वजह से उनमें सोशल कमिटमेंट की क्षमता और दक्षता कम ही होती है!
एक और बड़ी समस्या राष्ट्र-निर्माण में यह है कि स्टूडेन्ट मूवमेंट्स/आंदोलनों को सरकार व प्रशाशन बल व छल प्रयोग से दबाना चाहते है!
इन सबके आधार पर हम यह कह सकते है के शैक्षिक स्तर पर राष्ट्र-निर्माण के रस्ते में बहुत ख़तरे है अगर समय रहते उनका निवारण नहीं किया गया तो समस्याएं विकराल रूप धारण कर लेगी!
4) असहिष्णुता (Intolerance):- राष्ट्र-निर्माण के पथ में एक बड़ा ख़तरा असहिष्णुता है!
असहिष्णुता को किसी ख़ास ऐनक से देखने के बजाय सामाजिक स्तर पर इसका जायज़ा लेना चाहिए!
असहिष्णुता यह है के आप दूसरों के प्रति अपना टेम्परेचर जल्दी खो देते हो, आपमें बर्दाश्त करने व सहने की क्षमता क्षीण रह जाती है, आप अपनी चीज़े दूसरों पर थोपनें के लिए अग्रसर हो जाते हो, हर वो आदमी जो आपके धर्म,जात,भाषा,क्षेत्र,रंग,कल्चर का मानने वाला नहीं है तो आप उसे अपना शत्रु मान लेते हो, और यहीं से समस्या आरम्भ हो जाती है!
आख़िर क्या कारण व क्या परिस्थितियां रही जिसने देश के बुद्धिजीवियों, लेखकों, वैज्ञानिकों,कलाकारों और बहुत लोगों को विचलित कर दिया एवं उनको अपने क़ीमती अवॉर्ड तक वापस लौटाने को मजबूर कर दिया था, यक़ीनन यह समाज व देश के बदलते हालात के प्रति उनका ज़िन्दा दर्द था!
सांस्कृतिक फ़ासीवाद, वर्तमान भारत का एक बड़ा मसअला बन गया है, एक ख़ास प्रकार के रंग-ढंग, तौर-तरीके, धारणाएं-मान्यताएं, संस्कृति-जीवन शैली सभों पर एक समान “थोंपी” जाने के हिंसात्मक प्रयास जारी है!
जातीय असहिष्णुता:- सब इंसान बराबर है, कहते सब ही है पर मानते कम ही है, सदियों से दलितों-आदिवासियों को उनकी जाति के आधार पर पिछड़ा समझा व बनाए रखा गया, हाल ही में रोहित की संस्थागत हथ्या से लेकर ऊना में दलितों पर अत्याचार की घटनाएं बड़ी विचलित कर देने वाली  है, इसी से फ़िर क़ानून-व्यवस्था के ठप होने का ख़तरा भी उत्पन्न होता है तो वहीँ न्याय-व्यवस्था की सुस्ती और दोगलापन भी जगजाहिर होती है!
इस प्रकार से यह असहिष्णुता एक बड़ा ख़तरा है राष्ट्र-निर्माण के पथ में।
संक्षिप्त में कहा जाए तो राष्ट्र-निर्माण के पथ में बहुत कांटें भी है, तो कुछ फ़ूल भी मिल जाएंगे!
खतरों का बखान करके मातम मनाना कोई लक्ष्य नहीं है बल्कि अपनी समझदानी को बड़ा करके समाज व देश-हित के प्रति संजिदा होकर उनके कल्याण के लिए प्रयासरत रहना हालात व वक़्त की अहम् तरीन ज़रुरत है।

 

 

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