शिक्षा में सत्ता का दखल क्यों ?

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हिन्दू राष्ट्र की स्थापना का स्वपन लिए एक संगठन अपने एजेंडे के विस्तार के लिए हरसंभव कोशिशों में जुटा हुआ है।इस ही प्रयास में वह ‘शिक्षा को वैचारिक प्रभुत्व करने के लिए हथियार के रूप में उपयोग कर रहा है।
इंसान की मानसिकता के जोड़ तोड़ से लेकर सोचने,विचारने, ओर अपना नज़रिया बना पाने में हर तरह उसे मिल रही शिक्षा का योगदान होता है।
शिक्षा एक ऐसा हथियार है जिसे ढाल बना कर आप किसी भी नज़रिये,विचारधारा या अपने विरोधी समूह की सोच को तोड़ मरोड़ सकते हो।
एक लोकतांत्रिक राष्ट्र की शिक्षा पद्धति शिक्षा को स्वरूप देने वाली संस्था या शिक्षा में फेरबदल करने का ठेका भी अगर राजनीतिक दलीय बहुमत वाली सरकार के पास होता है तो इस बात को ध्यान में रखा जाए कि वह राष्ट्र अपने दुखों गमों ओर रंजो का रोना सदियों ओर बहुत दूर तक रोता ही रहेगा।
राजनीतिक दलों का बंटवारा विचारधारा के आधार पर होता है।ऐसा कभी सम्भव नही है कि एक ही विचारधारा के दो संगठन आमने सामने देखे जाएं या देखे गए हों,आंतरिक मतभेद ओर कलह एक अलग विषय है।
सत्ता का आना जाना लोकतंत्र में एक आम सा विषय है लेकिन क्या हम सत्ता के आने और आकर जाने के मध्य में जो पहलू छूट जाते हैं उनपर बात करते हैं ?
जब एक सरकार बहुमत लिए सत्ता में कदम रखती है विराजमान होती है।तब आम सी दृष्टि से हम ये प्रतीत कर पाते है कि एक चेहरा या एक समूह है।लेकिन एक महत्वपूर्ण बिंदु हम कहीं छोड़ देते जिसे कस कर पकड़े रहना जानना समझना हमारे लिए अतिआवश्यक है।
यही वह बिंदु है जिसे सत्ता में बैठे हुए व्यक्त्वि या समूह का आधार माना जाता है,जिसे हम विचारधारा कहते हैं।
यही वह बिंदु है जिसके आधार पर हमें सत्ता द्वारा वर्तमान से शुरू करके भविष्य में हांका जाता रहेगा।

हम भारतीय राजनीतिक स्वरूप या सत्ता में विराजमान वर्तमान विचारधारा पर अगर बात करें तो यही पाएंगे की देश मे रहने वाली एक बहूत बड़ी संख्या ऐसी है जो सिर्फ चहरों से परिचित है बिना उन चहरों का वैचारिक आधार जाने हुए।

समस्या गम्भीर है कि एक खास विचारधारा द्वारा हमें हांका जा रहा है और हम इस पूरे खेल से अपरिचित से हैं।सत्ता में विराजमान जिस विचारधारा से हमें परिचित होते हुए जिस लाठी का हमें हाथ बड़ा कर विरोध करना था वह हमसे बार बार फिसल जा रही है।
आखिर ऐसा क्यूं ?

कहा जाता है और बड़े गर्व के साथ माना भी जाता है कि हिन्दू संस्क्रति के बाद ही भारत का जन्म हुआ।
भारत=हिन्दू संस्क्रति ओर हिन्दू संस्कृति=भारत,की जिस गणित को एक खास विचारधारा द्वारा समाज पर थोपने की एक कोशिश लगातार जारी है।
लेकिन प्रश्न ये है कि इस विचारधारा को वर्तमान धर्मनिरपेक्ष भारत पर क्यूं थोपा जा रहा है ?

जबसे संघी विचारधारा सत्ता में आने और अपना आधार बनाने में सफल हुई है तब ही से इन लोगों की यह कोशिश रही है कि किस तरह जल्द स्व जल्द अपनी विचारधारा को समूचे भारत पर थोप दिया जाए।

विचारधारा या किसी भी सोच को समाज में थोपने का तरीका या कहें कि माध्यम “शिक्षा,शैक्षिणिक संस्थान, ओर वहां पढाए जा रहे तरीके के आधार पर किया जाता है।

वर्तमान भारत मे यही सब चल रहा है।

पाठ्यपुस्तकों ओर पाठ्यक्रम में बदलाव लाने के अपने इरादों की घोषणा सरकार अपने आने से भी पहले कर चुकी है जिसे हम 23 जून 2013 को दिए गए पूर्व केंद्रीय मंत्री वेंकैया नायडू ने के बयान से समझ सकते हैं “कि यदि भाजपा सत्ता में आती है तो वह पाठ्यपुस्तकों तथा पाठ्क्रम में बदलाव करेगी।

पहले भी भाजपा सत्ता में रहकर प्रयास कर चुकी है लेकिन इस बार वह अपने दम पर बहुमत के साथ सत्ता में है गठबंधन की राजनीति से मुक्त है।इसलिए बदलाव को लेकर भी सुनिश्चित है।

अब मेरा सवाल यही है कि क्या शिक्षा में सत्ता का दखल ओर विचारधारा का समावेश आवश्यक है ?
क्यूं हम शिक्षा को स्वतंत्र रखते हुए एक विविधता में एकता की भावना को लिए जिंदा रहने वाले भारत की कामना नही करते ?
अगर इस ही तरह सत्ता का शिक्षा में दखल बना रहा तो नीचे निम्न उदहारण दिए जा रहा हूँ उन्हें समझ कर भविष्य के भारत के लिए आपके दिमाग मे जो भी तस्वीर बनती है उसके लिए तैयार रहिए।

राजस्थान की भाजपा सरकार द्वारा किए गए पाठपुस्तक में बदलाव की के बाद कि कुछ तस्वीर।

समाजिक विज्ञान कक्षा-9 अध्याय 3 के पृष्ठ संख्या 31 बिंदु 13 में कहा गया है कि व्रहत्तर भारत में बौद्ध और मुस्लिम धर्म के प्रसार के कारण हिन्दू धर्म का प्रसार ना हो सका,यह पंक्तियां बच्चों में धार्मिक भेदभाव को उतपन्न करती हैं।

अध्याय 4 पृष्ठ संख्या 34 पर कहा गया है कि भारत आने वाले मुस्लिम और ईसाइयों ने भारत मे व्याप्त धर्मकांडो ओर रूढ़िवादिता का फायदा उठाया और अपना काम आसानी से पूरा किया,यह बात छात्रों में वैमनस्य पैदा करती है।

कक्षा 7 की सामाजिक विज्ञान पुस्तक के पृष्ठ संख्या 134 पर अलाउद्दीन खिलजी द्वारा चित्तोड़ पर अधिकार जमा लेने का इतिहास बताते हुए लेखक सीधेतौर पर “मुस्लिम सैनिक”उपयोग में लेते हुए लिखता है कि मुस्लिम सैनकों ने जनता को जी भर कर लूटा ओर कत्ल ए आम करने के साथ साथ भव्य मन्दिरों को धाराशायी कर दिया।

चलिए,आखिर में क्या कहा जाए क्या लिखा जाए,जो है आपके सामने है,समझिए,विचार कीजिए,क्योंकि स्थिति गम्भीर है।

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