गुजरात विधानसभा चुनाव 2017 : क्या हवा बदलेगी ?

मोदी-शाह की हिट जोड़ी अब स्पष्टीकरण के mode में सच में defensive नजर आ रही हें और उसी मोदी अदा में राहुल गाँधी अब सवाल पुछ कर जनता का समर्थन हासिल कर रहे हें.

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“तकलीफ आती हे तो चारो तरफ से आती हे”  यह कहावत से भाजपा अध्यक्ष परिचित हें।  कारण फर्जी मुठभेड़ में एक या दुसरे मामले में फसाया जाना और आईपीएस पुलिस अधिकारी के साथ मिलकर फिरोती संग्रह के मामले में राज्य से तड़ीपार होना । इन दोनों घटनाओं के  न्यायिक आदेश के वक्त उन्होंने इस भावना को बेशक महसूस किया हे. फिर जय शाहज़ादे का मामला और पेरेडाइज़ पेपर्स का खुलना और मुख्यमंत्री रुपानी को शेर के मामले में सेबी की नोटिस का आ जाना.

 

गुजरात में 150+ टारगेट के साथ अहमद पटेल को राज्यसभा के चुनावो में बिलकुल हीcorner करके कांग्रेस के विधायकों को बिखेर कर जो खेल कर दिखाया उसके बाद इतनी तेज़ी से माहोल बदलेगा इसकी कल्पना भी नहीं थी।  उत्तर प्रदेश की अभूतपूर्व जीत पर व्यापक मीडिया जब एक ही धुन लगातार सुना रहा हे तो कौन इस व्याकुलता का पता लगा सकता है… खैर.

 

लेकिन साबरमती-नर्मदा का पानी जिस गति से मानसून के बाद बह रहा हे उसको भी छलांग कर चुनौतियां की श्रृंखला ने घेर लिया हे.  सेम पित्रोडा ने जिस तरह राहुल गांधी को अमेरिकी यात्रा के माध्यम से makeover किया हे वो वाकई शानदार हे. बॉडी लैंग्वेज से लेकर भाषा की पकड और व्यंगो की बारिश उनके भाषण और ट्विटर सभी में आकर्षण पैदा कर रही  है।

 

मोदी-शाह की हिट जोड़ी अब स्पष्टीकरण के mode में सच में defensive नजर आ रही हें और उसी मोदी अदा में राहुल गाँधी अब सवाल पुछ कर जनता का समर्थन हासिल कर रहे हें.

 

यही तो हे भारतीय लोकतंत्र का कमाल! गुजरात इलेक्शन खूब उत्तेजक रहेगा, यह तो पहले से ही दिखाई दे रहा था लेकिन यह गेमचेंजर भी साबित हो सकेगा इसका किसी को ख्याल भी नहीं था. लेकिन अब! वर्षो से भाजप का समर्थन करने वाले एक बुज़ुर्ग Columnist भी इस इलेक्शन को *गेम चेंजर* लिखने पर मजबूर हुए हें और कांग्रेस की जीत की संभावना का साफ़ इशारा किया हे. ये वही श्रीमान हें जिन्होंने २००४ में शाइनिंग इंडिया की चमक में ऐसा लिखा था के श्रीमती सोनिया गाँधी को बाजपाई के सामने २०१४ तक तो राह देखनी पड़ेगी और क्या हुआ उसका इतिहास साक्षी है.

 

अल्पेश ठाकोर, हार्दिक पटेल और जिग्नेश मेवानी की तिकड़ी ने मृत्युशय्या पर बेठी हुई कांग्रेस में जान डाल दी हे. खेल खेलने में माहिर मोदी-शाह को उनकी निति पर गर्व था और इन तीनो की तिकड़ी को मनाने में भाजप को कोई परेशानी नहीं होगी ऐसी सोच शुरू से ही राजनीतिक पंडित भी रख रहे थे. एक तरफ अल्पेश ठाकोर स्वयं अपनी होर्डिंग में अल्पसंख्यको को हटाकर भाजप की तरफ जा रहे हें, ऐसा स्पष्ट संकेत के बावजूद सबको उल्लू बना गया, और धार्मिक ट्रस्ट और व्यापर-उधोग के माध्यम से हार्दिक पटेल को अपनी तरफ कर लेंगे ऐसे गुमान में मगन भाजपा और पाटीदार नेताओं को इस नौजवान ने जिस तरह हक्का बक्का कर दिया  वो वास्तव में आश्चर्यजनक हे, और जिग्नेश मेवानी तो किसी की सुनता ही नहीं हे.

कांग्रेस, जिसमे killing instinct दिखता ही नहीं था अब तो हर पहलु में शानदार दिख रहा हे. पाटीदार आरक्षण के समाधान के लिए वरिष्ठ Lawyer कपिल सिब्बल एक तरफ नज़र आ रहे हें तो दूसरी तरफ सेम पित्रोडॉ को युवाओ को आकर्षित करने के लिए सही समय पर मैदान में लाया गया हे.

 

लेकिन फिरभी वर्तमान में सभी चीजें  उनके पक्ष में होने के बावजूद कांग्रेस के लिए जंग आसान नहीं है. मोदी-शाह की केमेस्ट्री एक तरफ सरकार की उपलब्धियों के माध्यम सेविकास की गाथा बयान करने में  तो दूसरी तरफ संगठन के क्षेत्र में पृष्ठ कार्यकर्ता से लेकर बूथ मैनेजमेंट तक को  गति देने में बेमिसाल हे. IT सेल और मीडिया मैनेजमेंट द्वारा जनता को हमेशा मुख्य मुद्दों से दूर रखना और भ्रम की स्थिति में रखने में वे Pioneer हें. उनका ये मोडल जब पुरे देश में धूम मचा रहा हो तो अब गुजरात में वे निरंतर इन्नोवेशन करने की कोशिश में लगे रहेंगे ये तो निर्विवाद हे.

 

मोदी-शाह दोनों गुजरात में सभा, रोड शो, संगठन बैठक द्वारा कार्यकर्ताओं का उत्साह बढ़ाने के लिए लग गए हें. राहुल गाँधी को आक्रामक तौर से counter करने की तरकीबे निकाली जा रही हे. लेकिन रूपाणी-रुपाला बोहत कमजोर दिख रहे हे. दुसरे केन्द्रीय या प्रादेशिक कोई भी नेता लोगो में उत्साह पैदा नहीं कर पा रहे हे. सुषमा हो या निर्मला, स्मृति हो या फिर जावड़ेकर सभा में भाड़े की भीड़ या कार्यकर्ताओ के अलावा आम लोगो को जोड़ना कठिन ही नहीं बलके असंभव लग रहा हे. उत्तर प्रदेश के मुख्मंत्री योगी भी हिंदुत्व कार्ड के माध्यम से माहोल बनाने के पहले चरण में पूरी तरह से विफल हो गए है. पाटीदार आंदोलन के साथ ठाकोर क्षत्रिय सेना और दलितो का मोर्चा अभी भाजप को कोई स्पेस नहीं दे रहा और जनता भी anti incumbency के माध्यम से शासन विरोधी भावना बता रही हे यह स्पष्ट लगता है.

 

राष्ट्रीय मुद्दे में महंगाई, रोजगार के मुद्दे तो है हीं लेकिन विमुद्रीकरण और GST ने शासन विरोधी वातावरण को बहुत उत्तेजित कर दिया हे. भ्रष्ट और कलंकित बाबु बोखारिया,रादडीया, पुरुसोत्तम सोलंकी जेसे मंत्री जनता में क्या चमक पैदा कर सकते हें ये बात सोचने के लायक हे.  सौरभ पटेल को १३ साल तक उर्जा विभाग में रख कर सभी adjustment को सेट करके अब आंतरिक विवाद में बहार रख कर उनके भ्रष्टाचार प्रकट करो,फिर ‘ना खाऊंगा ना खाने दूंगा’ कहा से फिट बेठेगा. ये बात लोगो की समझ से बाहर हे. पनामा पेपर्स के बाद अब पैराडाइज़ पपर्स के खुलासे से सरकार, भाजप और खुद मोदी अचंबित है. इंडियन एक्सप्रेस और अंतर्राष्ट्रीय पत्रकार संगठन के सामने उंगली उठाना संभव नहीं है. लेकिन ये बंदा है कीअमिताभ बच्चन को इसी तरह रोल मॉडल दिखा रहा है. अब तोCBI के डायरेक्टर IPS गुजरात कैडर के आस्थाना का नाम भी सांडेसरा ग्रुप की डायरी में हवाला कनेक्शन खुल गया हे. प्रत्येक शासन के खिलाफ सवालो में आप विधानसभा की प्रश्नोत्तरी फिक्स करो, केग की रिपोर्ट या मानवाधिकार की रिपोर्ट अंत में औपचारिक रूप से रखो, लेकिन अब ये सोशयल मीडिया को किस तरह फिक्स करना उसका कीमिया उनको नहीं मिल रहा.

 

पाटीदार का dynamic ग्रुप  निरंतर सोशयल मीडिया पर घेरे रखता हे और इसीलिए रेशमा और वरुण पटेल भी ‘पास’ से भाजप में गए तो शांत रहने पर मजबूर हो गए. अल्पेश का कांग्रेस में counter करने के लिए भाजप ने रेशमा-वरुण की जोड़ी को प्रवेश देकर आकर्षण पैदा करने और पाटीदार आंदोलन में बाधा डालने का प्रयास किया हे, लेकिन हार्दिक की सेक्स सीडी प्रगट होने के बाद भी उसकी आक्रमकता को काबू में बिलकुल नहीं कर पा रहे हे. जेसे जेसे चुनाव नजदीक आ रहा हे वेसे वेसे हार्दिक की फ़्लैश सभा में अभूतपूर्व भीड़ अनायास आ रही हे. सुरेंद्रनगर की सभा में १ लाख की भीड़ उसकी लोकप्रियता को साबित करने के लिए उचित हे,  इसका कारण यह मोदी की सभा के बराबर है.

२२ साल के शासन के बाद कांग्रेस को नेगेटिव पॉइंट्स को ही अचीवमेंट में बताना बोहत भारी पड़ रहा है. नर्मदा का मुद्दा कोई प्रभाव पैदा नहीं कर पाया क्योंकि वितरण के लिए उप-नहरों के काम में भाजपा शासन बिलकुल विफल रहा है. जयनारायण व्यास जो भाजपा के मंत्री और प्रवक्ता रहे हें और सनत मेहता के छात्र के तौर पर नर्मदा डेम और सिंचाई के बारे में अपने विशेषज्ञ चार्टर्ड सिविल इंजिनियर होने के नाते ऑथोरिटी कहा जा सकता है उन्होंने दो दसक पहले के अखबारी लेख में इसी मुद्दे पर जोर दिया था… क्यूंकि उसमे कई छोटे खेतों को छिद्रित करने का यह चुनौतीपूर्ण काम हे.लेकिन यही भाजपा आंतरिक विवाद में यह बहुमुखी विशेषज्ञ को भूल गई और परिणाम हमारे सामने है. अब आप सरदार की प्रतिमा को रख कर जनता को उल्लू बनालो ये बोहत मुश्किल काम हे. अब ‘सरदार का उपयोग पाटीदार आक्रामक तौर पर इसी सरकार के विरोध में कर रहे हें. जय सरदार जय पाटीदार.

 

जाति के समीकरणों में पाटीदार,ठाकोर, दलित, ओबीसी की कई प्रजातियां अब भाजप से मुं फेर रही हें तो कांग्रेस भी उसे हवा देने और बहकाने में कोई कसर नहीं छोड़ रखी हे. कारडीया राजपूत और कोली समाज का भावनगर में पार्टी के अध्यक्ष जीतू वाघानी के सामने आक्रोश एक उदाहरण है. छोटू वसावा, NCP, आप और अन्य दलों से कम से कम नुक्सान हो उसकी सारी तैयारी में कांग्रेस तत्पर दिखाई दे रही हे. शंकर शिंह वाघेला की जन विकल्प पार्टी का अभी तो हवा निकल गई  है. लेकिन फिर भी उम्मीदवार घोषित होने के बाद क्या नुक्सान पोहंचा सकता है उसको ध्यान में लेना पड़ेगा. २०१२ के इलेक्शन में केसू भाई पटेल की परिवर्तन पार्टी को ३.६३ और निर्दलीय ५.८३ प्रतिशत वोट मिले थे. अगर कांग्रेस इसमें से 2 से ३ प्रतिशत वोट भी अपनी तरफ खींच ले तो उसे बहुत सफलता मिल सकती हे. कांग्रेस के ३८.९३ प्रतिशत के सामने भाजप को ४७.८५ वोट मिले थे. अगर यह ९ प्रतिशत के अंतर में कांग्रेस ४-५ प्रतिशत जो फ्लोटिंग (अनिर्णित) कमिटमेंट के अलावा के वोटर हें उन्हें बदल कर भाजप से लेले तो समीकरण कुछ हद तक बदल जाएगा.

 

२०१५ में पाटीदार आंदोलन के प्रारंभ में तालुका जिला पंचायत के परिणाम जिससे आनंदीबेन पटेल को कुर्सी छोड़नी पडी उसमे भी इतना ही अंतर दर्ज किया गया हे. भाजप का ४५.३५ प्रतिशत था तो कांग्रेस का ४९.०८ प्रतिशत दर्ज किया गया… बेशक, शहर के निगमों और बड़े नगर निगमों में भाजप का प्रभाव बरक़रार था. और अभी भी उसमे कोई बदलाव हो जाए ऐसा दिख नहीं रहा हे. सूरत और दुसरे शहरो में पाटीदार आंदोलन का असर रहेगा और सीटो का भी नुकसान पहुंच सकता है.

 

और अंत में, भले ही कांग्रेस सरकार बनाती दिख रही हो तो ये भी गुजरात मॉडल की एक पहेल हे के राहुल गाँधी मंदिरों के दर्शन से लेकर जाति के समीकरण को सुलझा रहे हों, वो सभी प्रोग्रामो में अल्पसंख्यको का (मुस्लमान नहीं) उल्लेख करने से बचे हें और खुद कांग्रेसी मुसलमानों को ये विश्वास बेठा हुआ हे के सब ठीक ही हो रहा हे. आखिरकार, R.S.S. के एजेंडे के अनुसार हाशिए पर आ गए मुस्लिम धर्मनिरपेक्ष या हिंदू भाइयों और सभी दल इस मामले में चुप हें के तुष्टिकरण (appeasement) का ठीकरा हमारे सर न फूटे, चाहे सच्चर कमिटी की रिपोर्ट आइना बताए कि अल्पसंक्यक में जैनों को बिना मांगे सभी लाभ उपलब्ध हैं, हमारी भलाई चुप रहने में ही हे.

 

इसी एजेंडा के तहत ऊंची जाति, गुज्जरों, जाट, पाटीदारों खुद को आरक्षण प्राप्त कराने के लिए आक्रामक रूप से मैदान पर आकर सरकारों को घुटनों के बल गिराते है और दलित,वंचित और मुसलमान बेबसी की हालत में इस तमाशे को सिर्फ देख रहे हें. वे न तो इसका विरोध करने में सक्षम हैं और न ही कोई भी अपनी खुद की प्रस्तुति का प्रदर्शन कर सकता है. चुनावी माहोल में गुजरात में यह एक नया रंग है…

 

यह बहुत स्पष्ट है कि गुजरात चुनाव आने वाले वर्षों में आगामी विधानसभा चुनाव राजस्थान, एमपी, कर्णाटक आदि और २०१९ लोकसभा चुनाव के लिए गेमचेंजर साबित होगा. /

उमर वोहरा 

(लेखक मुख्य इंजीनियर GETCO में सेवानिवृत हें. आपका संपर्क ९९२५२१२४५३ और[email protected] पर किया जा सकता है।)

 

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