मुस्लिम समाज, और “नया सीखने का रुझान” : सआदतुल्लाह हुसैनी

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शिक्षा और साक्षरता के आंकड़े एक समूह और समाज  को मापने के महत्वपूर्ण स्रोत माने जाते है। विकसित देशों में, एक से अधिक विषय सूचियों  की शुरुआत शुरू हो गई है, जिसे “लाइफ लाँग लर्निंग का सूचक” कहा जाता है। इस संकेत की प्रेरणा यह है कि ज्ञान के एक्सप्लोजन और शैक्षणिक विकास गति में आश्चर्यजनक वृद्धि के कारण उच्च शिक्षा भी अपर्याप्त है।   जीवन भर में  सीखने की आवश्यकता है और जो लोग हर रोज नई बातें और नए कौशल सीखने की क्षमता नहीं रखते, चाहे उन्होंने किसी एक समय में बहुत कुछ पढ़ा हो  और सीखा  हो, वह आधुनिक समय के अनपढ़ समझे जाएंगे … अलवेन टाफलर का यह कथन  बहुत प्रसिद्ध हुआ था  “ The illiterate of the 21st century will not be those who cannot read and write, but those who cannot learn, unlearn, and relearn”

“21 वीं सदी के अशिक्षित वो लोग नहीं होंगे, जो पढ़ और लिख नहीं सकते हैं, ये वो लोग होंगे जो लर्न , अनलर्न और रीलर्न की प्रतिभा से महरूम रहेंगे।“

लाँग लर्निंग इंडेक्स से आंकड़े  दर्शाते हैं कि इस संबंध में डेनमार्क और स्वीडन विश्व के सबसे विकसित देश हैं। यही कारण है कि यहां लोग नए नए ज्ञान  और कला सीखते हैं।

इस संदर्भ में, हमें अपना  आकलन करने की ज़रूरत है । मेरा अनुमान है कि हमारे भारतीय मुसलमानों का  शिक्षित वर्ग  भी इस पहलू से बहुत पिछडा हैं। जैसे ही  हम तरक़्क़ी  की कुछ सीढ़ियां चढ़ते हैं  हैं, हम सीखने की आवश्यकता को इगनोर करना शुरू करते हैं। सीखने वाले और सिखाने वाले , हमारे बीच  दो अलग-अलग, खंड  हैं। जो लोग शिक्षण या प्रशिक्षण दे रहे हैं, उनके लिए ‘सीखना’  उनकी शान और महिमा से परे एक चीज़ है । हमारे विद्वान, हमारे लीडर, हमारे बुद्धिजीवी, यह सब समझते हैं कि नई चीजें सीखने और पढ़ने का समय और अवसर  अब गुजर चका..इल्ला  माशा अल्लाह..अब नई चीजें सीखना उनके लिए असंभव है  है न ही  उसकी उन्हें कोई जरूरत है।

इसलिए एक ऐसे दौर में जब दुनिया में हर विभाग के विश्वविख्यात  और अग्रणी लोगों भी तरह तरह के प्रशिक्षण पाठ्यक्रमों से गुज़रते रहते हैं, हमारे यहाँ अकाबरीन के  प्रशिक्षण की कल्पना करना भी किसी अपराध से कम नहीं हे. इसी  फेसबुक पर 30 साल से कम आयु और पचास साल से अधिक  सक्रिय लाभार्थियों का अनुपात  निकाला जाए और इसकी तुलना इसी ग्रुप के मुसलमानों के अनुपात से किया जाए तो  तो नए कौशल सीखने की हमारी क्षमता का अनुमान लग जाएगा । जहां अन्य क्षेत्रों में सत्तर और अस्सी साल के उम्र के सक्रिय सामाजिक मीडिया उपयोगकर्ताओं (इस विवरण के साथ कि वहाटसप सोशाल मीडिया नहीं है …) ट्वीटर और फेसबुक पर सक्रिय दिखाई देंगे, हमारे दरमियान विशेषतः दीन दार लोगों में उनकी संख्या नहीं के बराबर है। यह तो मात्र एक उदाहरण है  यह स्थिति हर नए कौशल  और  कला के  मामले में देखी जाएगी।

यह इस विकसित समय में यह  एक मामूली मुद्दा नहीं है। असाक्षरता  और जिहालत  की तरह  नई चीजें न सीख पाना भी आज के दौर में एक माजूरी है  है यह अक्षमता और असमर्थता  पूरे समाज में आम हो जाए तो हमारी समाजी माजूरी  बन जाती है।  यही वास्त्विकता है  कि हमारी यही समाजी  माजूरी  ही  आज की कई समस्याओं की जननी  हैं … (जारी)

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