ताजमहल पर राजनीति देश की साख पर धब्बा

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आज ताजमहल के इतिहास के बारे में बात करना तो बेवकूफी ही होगी क्योंकि हिंदुस्तान में शायद ही कोई ऐसा होगा जिसे ये भी ना पता हो कि ताजमहल किसने बनाया और क्यों बनाया।
वैसे तो ताजमहल हमेशा से ही देशी विदेशी पर्यटकों और खासकर मोहब्बत करने वालों के लिये आकर्षण का विशेष केंद्र रहा है। लेकिन जिस तरह से अभी उत्तरप्रदेश के मुख्यमंत्री, मंत्री और विधायकों द्वारा ताजमहल का ज़िक्र किया जा रहा है उससे ताज देश और प्रदेश की राजनीति के केंद्र में आ गया है। जो ताजमहल अब तक मोहब्बत की निशानी के तौर पर जाना जाता था आज राजनीति ने उसे साम्प्रदायिक बना दिया है। ताजमहल को सांप्रदायिक बनाने वाले लोगों को शायद ये नही पता की ताजमहल सरकार के लिये सोने के अंडे देने वाली मुर्गी की तरह है।
यूपी में एक विधायक को हर महीने 1.87 लाख रुपये की तनख्वाह दी जाती है। जो विधायक आज ताजमहल पर बयान दे रहें है वो शायद ये भूल गये की ताजमहल से होने वाली 3 साल की कमाई से यूपी के 100 विधायकों को 3 साल तक तनख्वाह दी जा सकती है।
एक सवाल के लिखित जवाब में केंद्रीय पर्यटन एवं संस्कृति मंत्री महेश शर्मा ने लोकसभा में ये बताया था कि पिछले तीन साल में ताजमहल से 75 करोड़ से भी ज्यादा की आमदनी सरकार को हुई है।मंत्री जी ने बताया कि 2013-14 में 22.45 करोड़, 2014-15 में 21.26 करोड़, 2015-16 में 23.88 करोड़, और 1 अप्रेल 2016 से जून 2016 तक 8 करोड़ 30 लाख की सरकारी आमदनी हुई है।
जिस ताजमहल को पूरी दुनिया मे सात अजूबों में शामिल किया जाता है आज उसी ताजमहल को उत्तर प्रदेश के पर्यटन स्थलों की सूची से हटा देना और ताजमहल को भारतीय संस्कृति पर एक बदनुमा दाग़ बताया जाना बेहद अफ़सोसनाक बात है। चलते चलते एक और बात कहना चाहता हूँ, “राजनीति में कुछ भी यूँही नहीं होता है”  सोचियेगा ज़रूर।

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