गुजरात फ़ाइल्स : साहस और हिम्मत की एक अद्भुत कहानी

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राना अय्यूब की प्रसिद्ध दस्तावेज़ी किताब ‘गुजरात फाइल्स; एनाटोमी ऑफ़ आ कवर अप ; पढ़ने में आई । यह किताब, किताब क्या है, खोजी पत्रकारिता के इतिहास में एक युवा महिला पत्रकार की अविश्वश्नीय साहस और हिम्मत की एक अद्भुत कहानी है! राना अय्यूब ने इस तथ्य को साबित करके रख दिया कि मामला अगर सत्य और न्याय की लड़ाई, सत्य की खोज के लिए संघर्ष और प्रतिबद्धता व सहस के प्रदर्शन का हो तो महिलाओं को ‘सिन्फ़े नाज़ुक ‘ कहकर उन्हें under estimate नहीं किया जा सकता। राना की इस बहादुरी पर सभी न्यायप्रिय लोगों को सलामी पेश करनी चाहिए जिसका प्रदर्शन उन्होंने अपनी जान जोखिम में डाल कर किया है। कई अवसरों पर वह मौत के कगार पर थीं!
यह किताब दरअसल उनके संवादों पर आधारित है जो राना ने मैथली त्यागी (राना के फर्जी नाम, एक लड़की जो संस्कृत में प्रतिबद्धित , आरएसएस से जुड़े भारतीय मूल की अमेरिकी फिल्मकार है) के नाम से अंडर कवर होकर गुजरात के कई उच्च अधिकारियों के साथ गुप्त कैमरों की मदद से रिकॉर्ड किए थे। यह वह पुलिस अधिकारी थे जो २००२ के गुजरात दंगों , इशरत जहां फर्जी एनकाउंटर, सोहराबुद्दीन और कौसर बी फर्जी एनकाउंटर और हरेन पांड्या (केशुभाई पटेल के शासनकाल में गुजरात के गृह मंत्री) के राजनीतिक हत्या के समय महत्वपूर्ण केंद्र, राज्य और क्षेत्रीय पदों पर बैठे थे, उनमें से कुछ उन मामलों में स्वयं involve थे।
गुजरात फाइल्स ‘शक्तिशाली’ राजनीतिक नेताओं के सामने लोकतंत्र, नौकरशाही प्रणाली और कानून की बेबसी की दुखद कहानी है। पुलिस अधिकारियों ने साफ साफ बता दिया है कि गुजरात में मुसलमानों का नरसंहार कैसे सुनियोजित था और कैसे मुख्यमंत्री और गृहमंत्री के नेतृत्व में हिंदुओं के लिए ‘ज़ालिम ‘ मुसलमानों से बदला लेने का ‘इंतिज़ाम’ किया गया था। इसी तरह इशरत जहां, सोहराबुद्दीन और उसकी पत्नी कौसर बी और हरेन पांड्या की हत्या की घटनाएं राजनीतिक लाभ के लिए मुख्यमंत्री और गृह मंत्री के आदेश के तहत अंजाम दी गई थीं।
अधिकारियों के बयान पढ़ने के बाद सबसे अधिक नफरत तत्कालीन गुजरात के मुख्यमंत्री, वर्तमान भारतीय प्रधानमंत्री, नरेंद्र मोदी के राइट हैण्ड अमित शाह से हो रही है। यह नफरत स्वाभाविक है तक़रीबन सभी अधिकारियों ने उनके घिनौने ‘कारनामों ‘ और अपने ‘यूज़ एंड थ्रो’ नीति की वजह से उनसे नफरत व्यक्त की है। मोदी और शाह दोनों ने यह विश्वास दिलाकर कर कि कोई तुम्हारा बाल बांका नहीं कर सकेगा, इन अधिकारियों से अवैध काम करवाए, तो उन्हें जेलों में सड़ने के लिए छोड़ दिया। दिलचस्प बात यह है कि आज ये दोनों अपने आप को लोकतंत्र के चैंपियन बावर करा रहे हैं, विभिन्न कार्यक्रमों में लोकतंत्र पर व्याख्यान दे रहे हैं!
किताब के अध्ययन से इस भावना को भी बल मिला कि सारे के सारे अधिकारी सांप्रदायिक और तानाशाह नहीं होते। कई अधिकारी सही और नेक भी होते हैं। लेकिन उन्हें राजनीतिक नेताओं की राजनीति की चक्की में पिसना पड़ता है। उनके पास कुछ ही विकल्प हैं, या तो ‘ऊपर’ के आदेश का पालन करते हुए अवैध कार्य, या अपनी नौकरी से हाथ धोने के लिए तैयार रहें या अपनी जान गंवाने के लिए। अधिकारियों ने अपने इंटरव्यू में बताया है कि किस तरह अमित शाह ने अपने राजनीतिक पद का दुरुपयोग करते हुए अधिकारियों को अवैध काम करने के लिए मजबूर किया, जिसने आपत्ति की यह या तो साइड पोस्टिंग दी या नौकरी से बर्खास्त कर दिया या उसका काम ही तमाम करवा दिया। अमित शाह खुलेआम कहते थे कि वह मानव अधिकारों में विश्वास नहीं रखते।

राना की इतनी बेबाकी के बावजूद तहलका के एडीटर्स ने नरेंद्र मोदी का साक्षात्कार लेने से उन्हें मना कर दिया क्योंकि मोदी एक शक्तिशाली नेता है, इससे तहलका को खतरों का सामना करना पड़सकताहे। यह स्टोरी का एक अफसोस पहलू है। कहानी के शबाब पर पहुंचने के बाद मोदी का साक्षात्कार न होना, एक प्यास की भावना पैदा करता है। यह भी दुर्भाग्यपूर्ण है कि राना की इस किताब को उनके एडीटर्स और न कोई पब्लिकेशन प्रकाशित करने का साहस कर सका। यह काम भी राना को अपने जोखिम पर खुद ही करना पड़ा।

सऊद आज़मी

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