जहर खाने की यह कैसी मजबूरी है?

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लगभग दो साल पहले की बात है, जब सेंटर फॉर साइंस एंड एनवॉयरमेंट की एक रिपोर्ट आई थी जिसमें कहा गया था कि देश की राजधानी दिल्ली सहित कई राज्यों में स्थित महानगरों में पोल्ट्री फॉर्म के संचालक मुर्गे-मुर्गियों का वजन बढ़ाने के लिए उन्हें एंटीबायटिक दवाएं देते हैं। यह एंटीबायटिक इंजेक्शन या गोलियों का चूरा बनाकर उनके खाद्य पदार्थ में मिलाकर दिया जा रहा है। ऐसे मुर्गे-मुर्गियों का उपयोग करने वाले यदि बीमार पड़ते हैं, तो उन पर डॉक्टर द्वारा दिए गए एंटीबॉयटिक दवाओं का कोई असर नहीं होता है। ऐसे मांस का उपयोग करने वालों को कई तरह की घातक बीमारियां भी हो रही हैं, जो जानलेवा भी साबित हो रही हैं। उन दिनों सेंटर फॉर  साइंस एंड एनवायरमेंट (सीएसआई) ने दिल्ली-एनसीआर के अलग-अलग इलाकों से चिकन के 70 नमूने लिए थे। इनमें से 40 प्रतिशत सैंपल में एंटीबायटिक के अंश मिले। 17 प्रतिशत सैंपल में एक से ज्यादा तरह के एंटीबायटिक मिले। और अब कृषि मंत्रालय की एक रिपोर्ट यह खुलासा कर रही है कि देश में बिकने वाली सब्जियों, दालों, फलों, मीट और मसालों सहित दूसरे खाद्यान्नों में  निर्धारित मात्रा से कहीं ज्यादा कीटनाशक पाए गए हैं। कुछ मामलों में तो ये कीटनाशक खतरनाक स्तर तक यानी निर्धारित मात्रा से तीन से चार गुना ज्यादा पाए गए हैं। कृषि विभाग की रिपोर्ट में यह भी खुलासा किया गया है कि कीटनाशकों की यह बढ़ी हुई मात्रा पिछले सात सालों में किए गए अध्ययन के दौरान पाई गई है। वर्ष 2008-09 के दौरान किए गए एमआरएल (मैक्सिमम रेजिड्यू लेवल) टेस्ट में 1.4 प्रतिशत नमूने (13,348 में से 183) फेल पाए गए। छह साल बाद वर्ष 2014-15 के दौरान यह आंकड़ा 2.6 प्रतिशत (20,618 में से 543 सैंपल) तक पहुंच गया था। इस में चौंकाने वाली बात यह है कि फल, सब्जियों, मीट और दूसरे खाद्यान्न में पाया जाने वाला कीटनाशक प्रतिबंधित किस्म था।

वर्ष 2005 में शुरू की गई केंद्रीय कीटनाशक अवशिष्ट निगरानी योजना (मॉनीटरिंग ऑफ पेस्टीसाइड्स रेजिड्यूस) के तहत वर्ष 2014-15 में देशभर में 20,618 सैंपल इकट्ठे किए गए थे। इनमें से हर आठ में से एक में प्रतिबंधित कीटनाशक पाया गया। इन आंकड़ों में किसी किस्म की शंका न रहे, इसलिए इन्हें देश भर की 25 प्रयोगशालाओं में भेजकर जांच कराया गया। देश भर में मिलावटी सामान, एंटीबॉयटिक्स और प्रतिबंधित कीटनाशकों के उपयोग का मामला दिनों दिन बढ़ता जा रहा है। दिल्ली और देश के अन्य भागों में ऐसे-ऐसे मामले सामने आ रहे हैं कि यह समझ में ही नहीं आ रहा है कि इंसान खाए, तो खाए क्या? यह बात कई बार अखबारों में छप चुकी है कि देश के कई हिस्सों में लतावर्गीय सब्जियों की अच्छी और जल्दी फसल लेने के लिए अब किसान आक्सीटॉसिन का इंजेक्शन लगाने लगे हैं। आमतौर पर यह इंजेक्शन प्रसव पीड़ा को कम करने और बच्चे का आसानी से जन्म हो जाए, इसके लिए महिलाओं को लगाया जाता है। लतावर्गीय सब्जियों में ही क्यों, अब तो हर दूध बेचने वाला अपने घर में आक्सीटॉसिन का इंजेक्शन रखता है और इंजेक्शन लगाकर ही गाय या भैंस दुहता है। इस इंजेक्शन की एक खासियत यह बताई जाती है कि आक्सीटॉसिन लगाई गई सब्जी, दूध या दूसरी चीजें जब पकाई या उबाली जाती हैं, तो आक्सीटॉसिन रासायनिक रूप से अपरिवर्तित ही रहती है। इसका नतीजा यह हो रहा है कि बच्चे-बच्चियां जल्दी जवान हो रहे हैं। बच्चियों में मासिक धर्म समय से पूर्व हो रहे हैं। अब तो घर और बाहर हम जो कुछ भी खा रहे हैं, वह सब कुछ शक के दायरे में है। खाद्यान्नों, फल, सब्जियों, मांस और दूध में कीटनाशक,  आक्सीटॉसिन, खतरनाक रंगों का अंधाधुंध उपयोग तो हो ही रहा है, अब तो प्लास्टिक चावल, सिंथेटिक दूध, पनीर, खोया हमारे जीवन में जहर घोल रहा है। घर से लेकर बाजार में जिस चावल को हम बड़े प्रेम से खा रहे हैं, वह असली चावल है या चीन में निर्मित प्लास्टिक चावल है, कौन कह सकता है। इन दिनों सोशल मीडिया पर लगभग तीन-चार मिनट का एक वीडियो बहुत देखा जा रहा है जिसमें चीन का एक नागरिक सिंथेटिक पत्तागोभी बनाता है और उसे असली पत्तागोभी की तरह काटकर दिखाता है।

उस वीडियो को देखने पर तो यही लगता है कि इस सिंथेटिक पत्तागोभी को असली पत्तागोभी के साथ रख दिया जाए, तो दोनों में भेद कर पाना मुश्किल है। यह सब कुछ बाजार का करिश्मा है। बाजार ने मुनाफे के आगे आदमी की जिंदगी को बौना बना दिया है। अगर मुनाफा मिले, तो किसी को भी कुछ भी बेचा जा सकता है, भले ही वह मानवता के लिए कितना भी घातक क्यों न हो? सोचिए भला, जिस देश की बहुसंख्यक आबादी सिंथेटिक दूध, पनीर, खोवा, घी, मिलावटी तेल, मिलावटी मसाले और प्लास्टिक के चावल, प्रतिबंधित या सामान्य कीटनाशकों की निर्धारित से कहीं मात्रा से युक्त गेहूं, दाल, फल और सब्जियों का उपयोग करेगी, वह कितनी स्वस्थ रहेगी? ऐसे देश के बच्चों का जीवन कितना लंबा होगा? वैसे तो देश में कीटनाशकों और मिलावटी सामान की बिक्री पर नियंत्रण के लिए कृषि, स्वास्थ्य एवं वाणिज्य मंत्रालयों के अधीन तीन बड़ी संस्थाएं सेंट्रल इंसेक्टिसाइड्स बोर्ड एंड रजिस्ट्रेशन कमेटी, फूड सेफ्टी एंड स्टैंडड्र्स अथारिटी ऑफ इंडिया और एग्रीकल्चरल एंड प्रासेड्स फूड प्रॉडक्ट्स एक्सपोर्ट डिवेलपमेंट अथारिटी हैं, लेकिन इनका काम देश की जनता को दिखाई नहीं पड़ता है। ये सभी संस्थाएं सिर्फ खानापूर्ति करती नजर आती हैं। बहुत अधिक दबाव पडऩे पर कभी कभार किसी छोटे-मोटे व्यापारी पर कार्रवाई करके अपने कर्तव्य की इतिश्री समझ लेती हैं। इनकी कार्य प्रणाली भी कुछ ऐसी है कि जिसके खिलाफ कार्रवाई की जाती है, वह बाद में जमानत पर जेल से बाहर आकर अपने पुराने काम में लग जाता है। हालत फिर वही ‘ढाक के तीन पात’ वाले हो जाते हैं।

(लेखक दैनिक न्यू ब्राइट स्टार में समूह संपादक हैं।)

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