दृष्टि : क्या फीका पड़ रहा है जनता का शासन ?

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दुनिया के सबसे बड़े लोकतांत्रिक देश में क्या अवाम के पास हैं लोकतांत्रिक मूल्य?
हर साल 15 सितंबर को यौम-ए-जम्हूरिया यानि लोकतंत्र दिवस मनाया जाता है। इस दिन को मनाने का मकसद समूचे विश्व में इस लोकतंत्र के अवसरों और लोकतंत्र के हितों की समीक्षा करना है। इस दिन कई प्रकार के कार्यक्रम आयोजित होते हैं, लोगों को लोकतंत्र के प्रति जागरुक करने का प्रयास किया जाता है और राष्ट्रीय अंतर्राष्ट्रीय स्तर पर अनेकों भाषणों के ज़रिए जम्हूरियत (लोकतंत्र) की तारीफ में कसीदे गढ़े जाते हैं। आम लफ्ज़ों में बात करें तो लोकतंत्र का मतलब वही है जो अब्राहम लिंकन ने कहा था, ‘जनता का, जनता के लिए, जनता द्वारा शासन।’
भारत की बात करें तो यह दुनिया का सबसे बड़ा लोकतांत्रिक देश है। लोकतांत्रिक देशों के लिए एक मान्यता प्रचलित है कि वहां लोग अपनी मर्जी से सरकार चुन सकते हैं, ऐसे माहौल में सुरक्षा एक मूल्य की तरह होती है और संघर्ष अराजक स्थिति में नहीं पहुंचता। वहां अलोकप्रिय सरकारों को नकार दिया जाता है और कोई हिंसा नहीं होती। देश के सभी नागरिकों को समान अधिकार मिलते हैं। कोई भेदभाव नहीं होता वगैरह। अब इसे दुनिया के सबसे बड़े लोकतांत्रिक देश भारत के परिपेक्ष्य में रखकर देखिए। क्या यहां के नागरिकों के साथ वास्तव में कोई भेदभाव नहीं हो रहा?
शुरुआत करते हैं 13 सिंतबर को गिरफ्तार हुए जेएनयू के पूर्व छात्र नेता उमर खालिद से। उमर खालिद को दिल्ली पुलिस ने पहले पूछताछ के लिए बुलाया और फिर 11 घंटे की लंबी पूछताछ के बाद उन्हें रविवार रात 11 बजे गिरफ्तार कर लिया गया। उमर खालिद के 17 फरवरी को महाराष्ट्र के अमरावती में दिए गए भाषण को दिल्ली पुलिस की स्पेशल सेल ने सबूत के रुप में पेश किया है। इस भाषण में उमर खालिद ने कहा था कि “जब अमरीका के राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप भारत में होंगे तो हमें सड़कों पर उतरना चाहिए। 24 तारीख़ को ट्रंप आएँगे तो हम बताएँगे कि हिंदुस्तान की सरकार देश को बाँटने की कोशिश कर रही है। महात्मा गांधी के उसूलों की धज्जियाँ उड़ा रही है। हम दुनिया को बताएँगे कि हिंदुस्तान की आवाम हिंदुस्तान के हुक्मरानों के ख़िलाफ़ लड़ रही है। उस दिन हम तमाम लोग सड़कों पर उतर कर आएँगे।”
क़ानून के जानकारों के अनुसार, लोगों से प्रदर्शन करने के लिए कहना संविधान के मुताबिक़ अपराध नहीं है, बल्कि लोकतांत्रिक अधिकार है। वहीं लोगों को हिंसा के लिए भड़काना अपराध की श्रेणी में आता है। लेकिन जब आप पिछले साल दिसंबर से लेकर अब तक के आंकड़ो पर गौर करेंगे तो यह मालूम पड़ेगा कि 11 दिसंबर को नागरिकता संशोधन कानून को संसद से मंज़ूरी मिलने के बाद देश भर में शुरु हुए सीएए विरोधी आंदोलन के जितने भी एक्टिविस्ट थे उनमें से या तो कुछ जेल में हैं या फिर खुद पर लगे देशद्रोही का लेबल हटाने की जद्दोजहद कर रहे हैं। इनमें सफूरा ज़रगर, मीरान हैदर, नताशा नरवाल, देवंगाना कलिता, आसिफ इकबाल तन्हा, खालिद सैफी समेत देश के कोने कोने से सीएए विरोधी आंदोलन में भाग लेने वाले अनेकों एक्टिवस्ट शामिल हैं।
पिछले वर्ष पांच अगस्त 2019 को केंद्र सरकार ने जम्मू कश्मीर से धारा 370 हटाई थी तो यह दावा किया जा रहा था कि अब कश्मीरियों के दिन बहुरेंगे। कश्मीर में अमन चैन के दिन वापस आ जाएंगे। लेकिन अभी भी वहां ऐसे ढेरों परिवार मौजूद हैं जिनसे हर रोज़ कोई ना कोई अपना छिन जाता है और कुछ दिनों बाद पता चलता है कि वह किसी आंतकी गतिविधि में लिप्त था और किसी मुठभेड़ में ढेर हो गया। जम्मू कश्मीर के शोपियां जिले में 18 जुलाई को हुए एनकाउंटर में तीन आंतकियों को मारने का दावा किया गया था। यह तीनों ही लड़के आपस में रिश्तेदार थे और 16 जुलाई को घर से निकले थे। परिजनों को डीएनए रिपोर्ट से ज्यादा इंतजार उस रिपोर्ट के आने का है, जो 18 जुलाई को हुए एनकाउंटर का सच सामने लाए। पुलिस ने किन सबूतों के आधार पर मारा? पूछताछ क्यों नहीं की? मिलिटेंट हैं, इसकी पुष्टि कैसे की? ऐसे तमाम सवाल परिजनों के मन में चल रहे हैं। इन लोगों को तो अभी तक यह भी नहीं पता कि बच्चों की डेडबॉडी आखिर रखी कहां है? उसे दफना दिया गया है या कहीं रखा गया है? 13 अगस्त को परिजनों से कहा गया था कि दस-बारह दिन में डीएनए की जांच रिपोर्ट आ जाएगी और एनकाउंटर की सच्चाई भी। अभी भी इन दोनों ही चीजों का इंतजार है।
370 हटने के बाद घर वापसी का सपना देख रहे विस्थापित कश्मीरी पंडितों को भी आज तक कुछ हाथ नहीं लगा। जिस समय विशेष दर्जा हटा उस समय कश्मीरी पंडितो को ऐसा महसूस हुआ कि अब वे कश्मीर घाटी के दरवाज़े तक तो पहुंच ही गए हैं लेकिन उन्हें एक साल से अधिक समय बीतने के बाद अभ वे खुद को ठगा सा महसूस कर रहे हैं। 15 सिंतबर 2019 को जारी अपने संदेश में संयुक्त राष्ट्र के महासचिव एंटोनियो गुतारेस ने कहा था कि लोकतंत्र दरअसल जनता पर केंद्रित होता है। “इसकी बुनियाद सबको साथ मिलाकर चलने, समान व्यवहार और भागीदारी के सिद्धांत पर टिकी होती है, और लोकतंत्र शांति, टिकाऊ विकास और मानवाधिकारों के लिए नींव का पत्थर होता है।” लेकिन भारत में आपको ऐसे लाखों की तादाद में लोग मिल जाएंगे जिनको उनके अधिकार मिलने की बात तो दूर बल्कि उन्हें यह भी नहीं पता कि उन्हें किस गुनाह की सज़ा मिल रही है।
देश में जम्हूरियत केवल गिनतियों के खेल तक ही सीमित हो चुकी है। यहां अवाम को केवल राजनीतिक प्रणाली में भाग लेने के लिए मजबूर किया जाता है। पूंजीपति सिर्फ इतना चाहते हैं कि देश की अवाम केवल राजनीति में हिस्सा ले लेकिन राजनीति को निंयत्रित करने का अधिकार सिर्फ और सिर्फ उनके पास हो। इसीलिए जनता के शासन में ही जनता को केवल वोट देने की प्रक्रिया तक ही महदूद रखा जाता है।
17वीं शताब्दी में लॉक के समय से ही विचार और अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता को किसी भी राजनीतिक समाज की आवश्यक शर्त माना जाता रहा है। अमरीकी संविधान में अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता को जगह दी गई, जिसका समर्थन नैतिकतावादी जॉन स्टुअर्ट मिल ने भी किया था। इस स्वतंत्रता को मनुष्यता की आवश्यक शर्त के रूप में देखा जाता है। लेकिन भारत में यदि कोई अपनी अभिव्यक्ति की आज़ादी का इस्तेमाल करते हुए सरकारी नीतियों की आलोचना करता है तो उसे देशद्रोही साबित कर दिया जाता है। उसे देश छोड़ने की धमकी तक मिलने लगती है और उसके अस्तित्व पर ही प्रश्नचिन्ह लगा दिया जाता है। क्या दुनिया के सबसे बड़े लोकतांत्रिक देश में इस तरह के भेदभाव लोकतंत्र का मखौल नहीं उड़ाते?

लेखक : सहिफ़ा खान

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