फातिमा लतीफ़ इस्लामोफोबिक दृष्टिकोण से प्रेरित संस्थागत हत्या का शिकार -एसआईओ ऑफ इंडिया

ये कोई साधारण आत्महत्या का मामला नहीं है, यह आईआईटी मद्रास में इस्लामोफोबिक और जाति-आधारित दृष्टिकोणों से प्रेरित संस्थागत हत्या का मामला है, यह हमारे लिए एक सोचने का मौका है कि हम इस देश में संस्थागत भेदभाव और नस्लवाद की वास्तविकता को जगाएं, जिससे रोहित वेमुला जैसे मेधावी युवा छात्रों की संस्थागत हत्या हुई और इस कड़ी में धीरे धीरे देश के होनहार और क़ाबिल युवाओं डॉ पायल तडवी, फ़ातिमा लतीफ़ और कई अन्य छात्रों के नाम जुड़ते चले गए

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संगठन एसआईओ ऑफ़ इंडिया आईआईटी मद्रास में फ़ातिमा लतीफ़ की संस्थागत हत्या की कड़ी निंदा करता है, एसआईओ के राष्ट्रीय अध्यक्ष लबीद शफ़ी ने इस मामले पर अपनी संवेदना प्रकट करते हुए कहा कि “दुख की इस घड़ी में हम फ़ातिमा लतीफ़ के परिवार के साथ खड़े हैं और उन्हें न्याय दिलाने के सभी प्रयासों में साथ हैं। मैं अल्लाह से पीड़ित परिवार को धैर्य और इससे हुए नुकसान को सहन करने की शक्ति देने की भी प्रार्थना करता हूं,साथ ही हमें यह भी याद रखना चाहिए कि ये कोई साधारण आत्महत्या का मामला नहीं है, यह आईआईटी मद्रास में इस्लामोफोबिक और जाति-आधारित दृष्टिकोणों से प्रेरित संस्थागत हत्या का मामला है, यह हमारे लिए एक सोचने का मौका है कि हम इस देश में संस्थागत भेदभाव और नस्लवाद की वास्तविकता को जगाएं, जिससे रोहित वेमुला जैसे मेधावी युवा छात्रों की संस्थागत हत्या हुई और इस कड़ी में धीरे धीरे देश के होनहार और क़ाबिल युवाओं डॉ पायल तडवी, फ़ातिमा लतीफ़ और कई अन्य छात्रों के नाम जुड़ते चले गए”
19 वर्षीय छात्रा, फ़ातिमा लतीफ़ ने अपने शिक्षक सुदर्शन पद्मनाभन को अपनी मौत के लिए दोषी ठहराया है,यह बात उन्होंने अपने सुसाइड नोट में लिखा है,फातिमा लतीफ के पिता ने आगे बढ़कर यह कहा कि फ़ातिमा को कुछ शिक्षकों द्वारा उनके धार्मिक विश्वास के कारण प्रताड़ना और उत्पीड़न की शिकायत की गई थी,
यह कहते हुए कि उनमें से कई शिक्षकों के लिए “उसका मुस्लिम नाम ही समस्या है” और “वे परीक्षा में मुस्लिम नाम देखने से निराश थे”।
दुर्भाग्य से, यह पहला ऐसा मामला नहीं है और पिछले एक साल में देश के उच्च शिक्षा संस्थानों में छात्रों और शिक्षकों द्वारा कम से कम पांच ऐसे आत्महत्याएं की गई हैं। यह अल्पसंख्यक और हाशिए के समुदायों से आने वाले छात्रों ,विशेष रूप से दलित और मुस्लिम के लिए भेदभाव और उत्पीड़न के एक बड़े व्यवस्थित पैटर्न का हिस्सा है । हमें इस दुर्भाग्यपूर्ण मौत को हमारे शिक्षा संस्थानों में प्रचलित जातिवादी और इस्लामोफोबिक दृष्टिकोण के गंभीर अनुस्मारक के रूप में लेना चाहिए।
इस समस्या के हल करने के लिए देशव्यापी संवाद एक स्पष्ट और ईमानदार कोशिश करने की जरूरत है। इसके अलावा संस्थागत हत्या के कारणों को तलाश कर ठोस कानूनी सुरक्षा और उपायों की दिशा में काम करने की तत्काल आवश्यकता है।

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