न्यूजीलैंड से श्रीलंका तक आतंक ही आतंक!

श्रीलंका को 10 दिन पहले भारतीय खुफिया एजेंसी में हमले की पूर्व सूचना दी थी। भारतीय खुफिया एजेंसी को यह जानकारी कहां से मिली कोई नहीं जानता ? श्रीलंका की सरकार ने उस सूचना पर कार्यवाही क्यों नहीं की, यह सवाल खुद प्रधानमंत्री राष्ट्रपति से कर रहे हैं!

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क्राइस्टचर्च हमले के 35 दिन बाद ईसाईयों के त्योहार ईस्टर के दिन श्रीलंका में कोझीजकोड, कटुआ पटिया और बटिकालुआ में स्थित तीन गिरजा घरों और राजधानी कोलंबो में तीन होटलों दि शंगरीला, सिनामेन ग्रैंड और किंग्स बरी में 8 बम बम धमाके हुए। इस आतंकी कार्रवाई में लगभग 300 लोगों के मारे जाने और 400 से अधिक लोगों के घायल होने की खबर ने सारी दुनिया को हिला कर रख दिया है। ईस्टर के दिन खुशी के मौके पर बेकसूर लोगों पर ऐसा बर्बर हमला हुआ जो किसी भी हाल में बरदाश्त के काबिल नहीं है। कोलंबो के कार्डिनल आर्चबिशप मैलकम रंजीत ने जनता से धैर्य के साथ शांति व्यवस्था बनाए रखने की अपील की है। उन्होंने कहा यह हम सबके लिए अत्यंत कठिन हालात हैं क्योंकि हमें इसकी जरा भी आशंका नहीं थी और वह भी ईस्टर के दिन। हमारे लोग बिना किसी भय के चर्च गए और दो चर्चाें में अधिकतर लोग मार डाले गए। गुड फ्राइडे के बाद वाले रविवार को ईश्वर की प्रार्थना का आयोजन किया जाता है, उसी के दौरान यह बर्बर हमला हुआ।
न्यूजीलैंड के तुलना में श्रीलंका की घटना इस आधार पर भिन्न है कि इस बार किसी ने बम धमाके की ज़िम्मेदारी कबूल नहीं की है। फिर भी अधिकारियों ने अभी तक 22 लोगों को गिरफ्तार कर लिया है। श्रीलंका में 70 प्रतिशत आबादी बौद्ध धर्म के मानने वालों की है जो ईसवी पूर्व से उस देश में बसे हुए हैं। यह लोग सिन्हाली भाषा बोलते हैं। श्रीलंका की सबसे बड़ी अल्पसंख्यक 13 प्रतिशत हिंदू है। इनमें से कुछ सिन्हाली भाषा बोलते हैं, लेकिन अधिकतर तमिल हैं जो उत्तरी तट पर बसे हुए हैं। मुसलमानों की आबादी वहां 10 प्रतिशत है और ईसाई 7 प्रहतशत हैं।
श्रीलंका एक लंबे समय तक विद्रोह और संघर्ष का शिकार रहा है। 1976 में स्थापित होने वाली तमिल हिंदुओं का संगठन एलटीटीई तीन दशकों तक सरकार से संघर्षरत रहा और उस बीच उसने अपनी समुद्री शक्ति और हवाई शक्ति भी स्थापित कर ली। श्रीलंका के उत्तर में ये लोग एक अलग समानांतर सरकार स्थापित करने में भी कामयाब हो गए थे। मुसलमानों की बहुसंख्या चूंकि तमिल बोलती है इसलिए वे आरंभ में एलटीटीई के सहयागी रहे, लेकिन जब तमिल टाइगर्स ने उन्हें अपने इलाकों से निकाल दिया तो उसके बाद उनके संबंध टुट गया। एलटीटीई और श्रीलंका की सरकार के बीच नॉर्वे की मदद से 2002 में संवाद आरंभ हुआ जो 2007 में विफलता पर समाप्त हो गया। उसके बाद श्रीलंका के राष्ट्रपति महेंद्र राजपक्षे ने तमिल टाइगर्स के विरुद्ध सैन्य कार्रवाई की। साथ ही सितंबर 2008 में उनके महत्वपूर्ण केंद्र मलावी को अपने कब्जे में लेकर तमिल विद्रोहियों के खिलाफ युद्ध में जीत की घोषणा कर दी।
एलटीटीई को दुनिया का सबसे शक्तिशाली और संगठित अलगाववादी संगठन समझा जाता था। उसको आत्मघाती हमलों में विशेष महारत प्राप्त थी। उन हमलों में पुरुष और महिलाएं दोनों शामिल होते थे और वे हवाई जहाज तक का इस्तेमाल करके सरकार और सेना के उच्च अधिकारियों की हत्या कर देते थे। उनके हमले का शिकार होने वालों में भारत के पूर्व प्रधानमंत्री राजीव गांधी, श्रीलंका के राष्ट्रपति राणासिंहे प्रेमदासा और रक्षा मंत्री रंजन विजयरांते शामिल हैं।
उस गृह युद्ध के 9 वर्षों बाद पिछले साल मार्च में फिर से बड़े पैमाने पर हिंसा की घटनाएं हुई, लेकिन उनमें बौद्ध धर्म के सिन्हाली लोग लिप्त थे। उन लोगों ने मस्जिदों और मुसलमानों की संपत्ति को निशाना बनाया था। संघर्ष के बाद देश में पहली बार आपात स्थिति की घोषणा करनी पड़ी। उन हमलों का कारण यह बताया गया था कि ट्रैफिक की समस्या पर कुछ मुस्लिम लड़कों ने बौद्ध धर्म के मानने वाले एक व्यक्ति की हत्या कर दी थी। उसकी प्रतिक्रिया में होने वाली हिंसा में 4 लोग मारे गए और दर्जनों लोग घायल हो गए। कट्टर बौद्ध धार्मिक संगठन बोदुबाला सेना पर उन हमलों का आरोप लगाया गया। उस संगठन ने पूर्व राष्ट्रपति राजपक्षे के शसनकाल में मुसलमानों के विरुद्ध रैलियां और प्रदर्शन भी किए थे। मुसलमानों के विरुद्ध अफवाह उड़ाने और हम लोग का समर्थन करने में फेसबुक का इस्तेमाल किया गया था। सोशल मीडिया के माध्यम से नफरत भरे संदेश फैलाए गए थे।
श्रीलंका के सिन्हाली बहुसंख्या में होने के बावजूद खुद को अल्पसंख्यक कहते हैं। वे तमिलों को भारतीय राज्य तमिलनाडु का हिस्सा और मुसलमानों को वृहद मुस्लिम उम्मत का हिस्सा मानते हैं। 2011 से उन लोगों ने मुसलमानों पर हमले शुरू किए और आमतौर सजाओ से बचे रहे। ‘सेक्रेट्रिएट फार मुस्लिम’ नामक संगठन ने 2013 से 2015 के बीच वहां मुसलमानों के विरुद्ध 538 घटनाएं दर्ज की हैं। बोदु बाला सेना वर्मा के अतिवादी बुद्धिस्ट ग्रुप से प्रेरणा लेती है और मुसलमानों पर ज्यादा बच्चे पैदा करने और बौद्धों को जबरन मुसलमान बनाने का आरोप लगाती है। संगठित हमलों के बाद स्थानीय विश्लेषकों ने अखबार ‘दि आईलैंड’ में लिखा था कि इसके नतीजे में मुस्लिम नौजवान उग्रवाद की ओर बढ़ सकते हैं और मुसलमानों संयमी वर्ग कमजोर पड़ जाएंगे। लेकिन यह सच्चाई है कि श्रीलंका के मुसलमानों ने राजनीतिक परिपक्वता का प्रदर्शन करते हुए शांतिपूर्ण और संवैधानिक तरीकों से ही विरोध किया। श्रीलंका के राष्ट्रपति मैथ्रिपाला श्रीसेना ने इस समस्या को पार्लिमेंट में उठाया और हिंसा पर काबू पाने के लिए 3 सदस्यों की एक समिति का गठन किया। मयसंमार के बौद्धों के विपरीत श्रीलंका के बौद्धों ने मुस्लिम विरोधी हिंसा के खिलाफ कोलंबो में विरोध रैली निकाल कर मुसलमानों का समर्थन किया।
यह जमीनी सच्चाई दुनिया भर के मीडिया में मौजूद है। विश्व मीडिया में हमलों से संबंधित विभिन्न आशंकाओं का अनुमान लगाया जा रहा है। मयांमार के बौद्धों ने अपनी कार्रवाइयों से यह साबित कर दिया है कि वे कैसे बर्बर हैं, इसलिए उनके रवैयों पर भी बातचीत हो रही है। इन हमलों को मुंबई से जोड़ा जा रहा है हालांकि वह आत्मघाती हमला नहीं था। आत्मघाती हमलों की महारत तो एलटीटीई के पास सबसे ज्यादा थी। इन हमलों में पूर्व प्रधानमंत्री राजपक्षे का हाथ भी देखा जा रहा है।
श्रीलंका सरकार का रवैया बहुत संतुलित है। उसने अभी तक न तो किसी संगठन को और न किसी और को आरोपी ठहराया है। लेकिन भारतीय मीडिया इसे जानबूझकर मुसलमानों से जोड़ने की कोशिश कर रहा है। आश्चर्य की बात यह है कि आत्मघाती हमलावर का नाम भारतीय अखबारों के अलावा कहीं नहीं छपा।
हमलावर मोहम्मद आजम के बारे में बताया गया कि वह होटल में 1 दिन पहले आया था। लेकिन गौरतलब है कि क्या इस तरह का हमला करने वाले अपने असली नाम से यात्रा करते हैं? इस पर किसी ने गौर करने की जरूरत नहीं महसूस की और अगर वह मुसलमान भी था तो यह भी पता लगाने की जरूरत नहीं महसूस की गई कि वह किसके लिए काम कर रहा था ।
श्रीलंका को 10 दिन पहले भारतीय खुफिया एजेंसी में हमले की पूर्व सूचना दी थी। भारतीय खुफिया एजेंसी को यह जानकारी कहां से मिली कोई नहीं जानता ? श्रीलंका की सरकार ने उस सूचना पर कार्यवाही क्यों नहीं की, यह सवाल खुद प्रधानमंत्री राष्ट्रपति से कर रहे हैं।
मुस्लिम संगठन नेशनल तौहीद जमाअत पर 2014 में गौतम बुद्ध की मूर्तियां तोड़ने का आरोप भी यूरोप और अमेरिका के अखबारों में नहीं है, लेकिन हिंदी मीडिया में इसपर खूब चर्चा हुई। अब यह खबर भी फैलाई जा रही है कि वह भारतीय राज्य तमिलनाडु में भी सक्रिय है।
इस परिपेक्ष में कोलंबो के सबसे बड़े ईसाई धार्मिक नेता कार्डिनल मालकम रंजीत का बयान बहुत महत्वपूर्ण है। उन्होंने श्रीलंका की सरकार से मांग की है कि एक निष्पक्ष और कड़ी जांच की जाए और हमलावरों को सख़्त सजा दी जाए। इसलिए कि केवल दरिंदे ही ऐसी हरकत कर सकते हैं। श्रीलंका के रक्षा मंत्री रुवान विजयवरदे ने भी आतंकवादियों की पहचान का दावा करने के बाद कहा कि वे इस कार्रवाई में लिप्त हर आतंकवादी ग्रुप के विरुद्ध सारी जरूरी कार्रवाई करेंगे। और उनके पीछे जाएंगे चाहे वह किसी भी धार्मिक उग्रवाद का मानने वाला हो। इस तरह की बेलाग और साहसिक कार्रवाई के बिना आतंकवाद पर लगाम लगाना संभव नहीं है.

– डॉ॰ सलीम ख़ान

1 COMMENT

  1. लेखक जा पूरा लेख बस ये कहने में निकल गया के श्रीलंका और विदेशी मीडिया तो अच्छा है जो मुस्लिम आतंकी घटनाओं को ज्यादा कवर नही करता है।
    बस इंडियन मीडिया ही पागल है।

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