सरकार के तुगलकी फरमान से जूझता आम भारतीय

गाँव में लगभग 75 प्रतिशत लोग गरीब रहते हैं, ये वो गरीब हैं जिसका घर प्रतिदिन कमाई के भुगतान पर चलता है। गाँव की 75 प्रतिशत आबादी में छोटे किसान(कम जमीन वाले किसान), भूमिहीन किसान के अलावा देहाड़ी मजदूर आते हैं।

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चित्र-कैसर नियाजी

-शहिद सुमन

आपने ‘तुगलकी फरमान’ के फरमान के बारे में लोगों को पढ़ते और बोलते हुये सुना होगा। पढ़ते हुये इसलिए की इसका संबंध भारत के इतिहास से है। भारत के इतिहास में 14वीं सदी में “मुहम्मद बिन तुगलक” नाम का बादशाह था, इनके शासनकाल में सल्तनत-ए-दिल्ली का भौगोलिक क्षेत्रफल सर्वाधिक रहा, जिसमें लगभग पूरा भारतीय उपमहाद्वीप शामिल था। अपने 26 वर्ष के लंबे शासनकल में अचानक रातों-रात फैसले लेने में माहिर था। इतिहासकारों के मुताबिक बेहद विद्वान शासकों में शुमार किया जाने वाला मुहम्मद बिन तुगलक वज़ीरों और रिश्तेदारों पर भी हमेशा संदेह करता था, और किसी भी शत्रु को कमतर समझना उसकी फितरत में शामिल नहीं था। इनके द्वारा लिए गए अचानक फैसले तुगलकी फरमान ने कई महत्वपूर्ण निर्णय लिए थे, तुगलक साहब बहुत से राज्य(चुनाव) जीतना चाहते थे, इसके लिए बहुत से धन की आवश्यकता थी और इसके लिए अर्थव्यवस्था औऱ जमाखोरी पर वार करना जरुरी था उसने रातों-रात सोने चांदी के सिक्कों की जगह तांबे के सिक्कों को चलन में लाने का आदेश दे दिया। उन्होंने तांबे के जो सिक्के जारी किए थे, वे अच्छे नहीं थे आसानी से उनकी नकल की जा सकती थी। और ऐसा ही हुआ। सोने को पिघलाने के लिए लोगो ने अपने घर में ही आग लगा दी, जिससे राजस्व की भारी क्षति हुई और फिर उस क्षति को पूरा करने के लिए उन्होंने करों में भारी वृद्धि कर दी, औऱ नई कर व्यवस्था लागू कर दी जिसके कारण लोगों का व्यापार डूबने लगा और पूरी अर्थव्यवस्था धराशायी हो गई हाल के वर्षों में दूसरा फैसला तुगलक ने राजधानी दिल्ली से देवगिरी (दौलताबाद) परिवर्तित करने का निर्णय किया सुल्तान और दिल्ली की जनता के बीच बैर भाव था इसीलिए उसने उनकी शक्ति क्षीण करने के लिए राजधानी परिवर्तित की थी इसके लिए उसने लोगो का व्यापार औऱ सबकुछ काम बंद करके (आज की भाषा मे लॉकडाउन करके) दौलताबाद जाने का आदेश दे दिया गया हजारों लोगों की पैदल चलने और भूखे प्यासे रहने के कारण मौत हो गई। इन्होंने योग्यता के आधार पर लोगों को सरकारी नौकरी देने का एलान किया अर्थात आरक्षण की व्यवस्था को ही समाप्त कर दिया। इसके अलावा इन्होंने सांकेतिक रुपए अर्थात डिजिटल करेंसी की योजनाओं को लागू किया। इन सभी फैसले को लेकर मुहम्मद बिन तुगलक की नीयत औऱ उद्देश्य बड़े ही नेक थे लेकिन इम्प्लीमेंटेशन बहुत बुरा था। अपने इन तुगलकी फैसले को लेकर अवाम में बहुत उम्मीदों को जगाया था। और जिसकी सजा पूरी आवाम ने भुगती और जिससे उनकी पूरी सल्तनत तितर-बितर हो गई थी। 14वीं सदी के इस घटनाक्रम को पिछले कुछ सालों से भारत के घटनाओं से भी जोड़ सकते हैं।
सबका साथ सबका विश्वास में हम सब भारतीय कहाँ हैं?
सबका साथ सबका विश्वास का नारा लगाने वाली बीजेपी सरकार का यह दूसरा कार्यकाल है। इस सरकार ने अपने पहले कार्यकाल में नोटबंदी और जीएसटी जैसी कार्ययोजना लागू की थी। दोनों कार्ययोजनाएं देश के आर्थिक घटनाक्रम से जुड़ी हैं। इन दोनों आर्थिक घटनाक्रम के बाद से देश के अर्थशात्री केंद्र सरकार को लगातार आगाह करते रहे हैं, अर्थव्यवस्था में बड़े बदलाव की आवश्यकता है। फिल्मी स्टाइल में हेमशा कुछ नया करने की जिद ने देश की व्यवस्था को चौपट कर दिया है। सरकार के हर अच्छे-बुरे फेसले को राष्ट्र प्रतीक समझाया जा रहा है, गलत नीतियों का विरोध राष्ट्र का विरोध प्रचारित किया जा रहा है।
देश में नोटबंदी की घोषणा अचानक 8 नवंबर 2016 की रात के 8 बजे प्रधानमंत्री ने घोषणा की ठीक वैसे ही जैसे कोई चोर डाकू बदमाश अपने शिकार की तलाश में रहता है। फिर इसके बाद जो हुआ सब जानते ही हैं। लंबी-लंबी कतारें लगी, लोग इधर उधर भागते नजर आए। लाइनों में खड़े लोगों की मरने की खबरें आने लगी। देखते ही देखते अपनी ही मेहनत की जमापूंजी को बचाने में लगभग 150 लोगों की मृत्यु हो गई। पैसे की किल्लत में लोगों की शादियाँ टूटने लगी। चारों तरफ आर्थिक आपातकाल का माहौल फैल गया। इसके खिलाफ विरोध के स्वर तो उठे लेकिन सरकार के तर्क के पीछे प्रतिरोध का स्वर बौना साबित हो गया। सरकार का तर्क था कि इसके बाद देश में आतंकवाद और अलगाववाद के साथ-साथ जाली नोटों के कारोबार जैसी गंभीर समस्याओं से निजात मिलेगा। इसके अलावा सरकार ये भी कहती रही कि देश में भ्रष्टाचार के स्तर को नोटबंदी कम करेगा। कुछ महीने बाद जब देश में नोटबंदी की अफरा-तफरी का माहौल जब शांत हुआ तो रिजर्व बैंक ऑफ इंडिया ने अपने जारी सर्कुलर में कहा कि नोटबंदी के बाद लगभग 99% पुराने नोट बेंक को वापस मिल गया है। आतंकवाद और भ्रष्टाचार की घटनाओं का भुक्तभोगी आम जनता खुद है। जनता अपने पैरामीटर के जरिए कम से कम भ्रष्टाचार को तो नाप ही सकती है। अगाववाद की समस्याएं आज भी कश्मीर और नॉर्थ ईस्ट में मुखर है, जिसे सरकार महीनों इंटरनेट बंद करके दबाने की असफल कोशिश करती रही है। इसके अलावा पैलेटगण से इन इलाकों में रहने वालों की समस्याओं को जबर्दस्ती दबाने की कोशिश की जाती है। इसके शिकार आज भी विकलांग होकर सरकारी व्यवस्था को मुंह चिढ़ा रहा है।
इन सबके अलावा नए नोट की छपाई में 2015-18 बीच आरबीआई ने 16298 हजार करोड़ रुपए खर्च किये। इतना सबकुछ होने के बाद भी पुराने प्रश्न आज भी जिंदा है। ये अलग बात है कि नोटबंदी को राष्ट्रीय मुद्दा बनाकर बीजेपी की राज्यों में कई सरकारें बन चुकी हैं।
देश में आर्थिक आपातकाल की दूसरी सरकारी कोशिश जीएसटी के जरिये हुई। इस कोशिश में छोटे और मँझोले किस्म के उद्योग पूरी तरह से चौपट हो गए। इसकी बड़ी वजह ये रही कि इस तरह के उद्योग धंधे में कम पढ़े-लिखे लोग ज्यादा हैं। उन्हे तो जीएसटी का फूल फार्म ही समझ में नहीं आता। ऐसे कारोबारी लोग अपने धंधे को मार्केट से समेट चुके हैं।
2019 का आम चुनाव सम्पन्न होता है, पुनः कतिथ राष्ट्रवादी सरकार का नरेंद्र मोदी के नेतृत्व में आगाज होता है। अपने मजबूत संसदीय संख्या बल के आलोक में पार्टी(बीजेपी) मेनिफेस्टो के वादे के अनुरूप काम करने का सपथ लेती है। अमित शाह को गृह मंत्री बनाया जाता है। पहला संसदीय सत्र में ही कई दूराभाषी बिल को संसद के पटल पर सांसदों के बहस के लिए रखा जाता है। हल्के फुल्के बहस के बाद कई महत्वपूर्ण बिलों को बीजेपी के एक तरफा बहुमत से पास कर दिया जाता है। जिसमें तीन तलाक एक्ट, धारा 370 को हटाना, आरटीआई में बदलाव, यूएपीए में संशोधन आदि महत्वपूर्ण हैं।
सरकर के दूसरे कार्यकाल का पहला सम्पूर्ण बजट हल्के-फुल्के हंगामे के साथ पास हो चुकी है। मीडिया मैनेज के जरिए आमजनता को समझा दिया जाता है, सब चंगासी! बजट पास होते ही उधर सेंसक्स धड़ाम से नीचे गिर जाता है। पहला झटका शेयर मार्केट से पैसे के भावमूल्य के काम होने से लगता है। उसके बाद लगातार भारतीय रुपैया डालर के मुक़ाबले में कम होता गया। इसी दौरान पीएमसी के बाद प्राइवेट सेक्टर का दूसरा बैंक “यस बैंक” ने भारतीय जनता को नो बैंक कहकर झटका दिया और आर बी आई ने एक सर्कुलर जारी कर यस बैंक के खाताधारकों से खा कि आप अप्रेल तक 50000 रुपए से ज्यादा नहीं निकाल सकते हैं।इसके बाद यस बैंक के खाताधारकों ने अपने आस-पास के एटीएम और नजदीकी शाखा के पास लंबी लाइनों में खड़े हो गए। तबतक देर हो चुकी थी, लोग बैंक के सामने खड़े होकर रोने-धोने लगे।
आरबीआई गवर्नर और भारतीय अर्थव्यवस्था
आप देखेंगे कि किस प्रकार रघुराम राजन जो कि अर्थशात्री हैं। अर्थशात्र में इनका योगदान सकारात्मक रहा है। मनमोहन सरकार के समय से ही भारत के आर्थिक सलहकर के पद पर कार्यरत रहे हैं। 6 अगस्त 2013 को मनमोहन सरकार ने रघुराम राजन को 23वें गवर्नर के रूप में ज़िम्मेदारी देते हैं। उसके बाद आरबीआई गवर्नर के रूप में अपने पहले भाषण में, राजन ने बैंकिंग सुधारों का वादा किया और विदेशी बैंकिंग पर अंकुश को कम किया, जिसके बाद बीएसई सेंसेक्स 333 अंक या 1.83% बढ़ा। कार्यालय में अपने पहले दिन के बाद, रुपया अमेरिकी डॉलर के मुकाबले 2.1% बढ़ा। आरबीआई के गवर्नर के रूप में, राजन ने मुद्रास्फीति को अपने प्राथमिक ध्यान में रखते हुए, सितंबर 2013 में खुदरा मुद्रास्फीति को 9.8% से घटाकर जुलाई 2015 में 3.78% कर दिया – 1990 के बाद सबसे कम था। थोक महंगाई दर सितंबर 2013 में 6.1% से घटकर जुलाई 2015 में -4.05% के ऐतिहासिक निचले स्तर पर आ गई। इसके मोदी सरकार को इस तरह बड़ी उपलब्धि शायद रास न आया हो। नोटबंदी के बाद जब रघुराम राजन ने सरकार के इस बेतुके फैसले पर अपने कमेंट्स दिये तो उसके बाद की कहानी से आप भी अवगत होंगे। उसके बाद ऊर्जित पटेल 24वें आरबीआई के गवर्नर बने। इसके द्वारा आरबीआई गवर्नर का कार्यभार संभालते ही मोदी सरकार ने अचानक 8 नवम्बर के रात्री के 8बजे नोटबंदी का फैसला लिया। इस फैसले के बाद देश की अर्थव्यवस्था की कमर टूट गई। इस टूटते कमर को बिना सीधा किए ऊर्जित पटेल गवर्नर पद से निजी व्यस्तता बताकर इस्तीफा दे देते हैं। इसके बाद 1980 बैच के तमिलनाडू कैडर के आईएस शक्तिकान्त दास आरबीआई के 25वें गवर्नर के रूप में पदभार ग्रहण करते हैं। सबसे दिलचस्प बात यह है की इन्होंने एसटी स्टीफेंस कॉलेज, दिल्ली विश्वविद्यालय, दिल्ली से इतिहास में एमए किया है। अपने पढ़ाई के दौरान इन्होंने अर्थशात्र में बिना कोई विशेषज्ञता हासिल किए देश के सबसे प्रमुख आर्थिक सिस्टम आरबीआई के पहले गवर्नर बने हैं। इनके गवर्नर बनते ही बीजेपी के राज्यसभा संसद एवं अर्थशात्री सुब्रमनयम स्वामी ने सरकार के इस पहल का विरोध किया था। खैर वर्तमान में बिना किसी स्पेशल आर्थिक ज्ञान के इनके मजबूत कांधे पर देश की डूबती अर्थव्यवस्था का कार्यभार है। फिलहाल कोरोना महामारी की वजह से पूरी दुनिया आर्थिक मंदी के चपेट में है। ऐसे में भारत सरकार देश को अपने ढुलमुल रवैये से इस वेश्विक मंदी के आहट से बचा पाने में कितना सक्षम है, ये देखने योग्य होगा।
कोरोना से जूझते आर्थिक व्यवस्था में भारतीय किसान
10 अप्रेल को भारतीय जनता पार्टी की ऑफिस के ट्वीटर अकाउंट से एक ट्वीट किया गया ट्वीट के शब्द इस प्रकार थे, “जिन योजनाओं का हुआ अपमान वो लॉक डाउन में बने वरदान वो प्रधानमंत्री किसान आत्म सम्मान निधि योजना को नाकाफी बताते थे और आज 8 करोड़ 69 लाख किसानों को 2000 रुपए की मदद पहुँचाकर ये उनका मनोबल बढ़ा रहे हैं” इससे लगा की चलो देर ही सही सरकार लॉक डाउन में जब सब कुछ बंद है, जो आपके अपने निजी हाथों में है वही आपका है। एक कहावत है “डूबते को तिनके का सहारा” ऐसे वक्त में शायद साढ़े सत्रह हजार करोड़ रुपए किसान सम्मान की ये राशि किसानों के आत्मसम्मान को बचाने में कितना कामयाब होगा ये आने वाला वक़्त बताएगा। खैर ये बात तो मीडिया में प्रचारित किया गया। अब आइये किसान आत्म सम्मान निधि की वेबसाइट को खंगालते हैं वहाँ के अपदेट्स क्या हैं। सरकार के वेबसाइट के बेहद चौकने वाले हैं। साढ़े सत्रह हजार करोड़ में 7384 करोड़ रुपए वितरित किए गये. अगर आप वितरित किए गए रशि 7384 रुपए का 8 करोड़ 69 लाख किसानों में वितरन करें तो हर एक किसान के खाते में 849 रुपए 71 पैसे। अगर सरकार के मुताबिक एक किसान को 2000 रुपए दिये गए तो खर्च किए गए रकम से 3 करोड़ 60 लाख किसानों को ही इसका फायदा होगा। जबकि सरकार ने लॉक डाउन में जूझते भारतीय जनता के लिए 1 लाख 76 हजार करोड़ के पैकेज की घोषणा की गई है। किसान की दैनिक समस्या से जुड़ी मुख्य मीडिया की भाषा क्यों नहीं है? इस घटना से जुड़े बाकी प्रश्न आपके हिस्से के लिए छोडता हूँ। शहरी क्षेत्रों में 50 प्रतिशत आबदी गरीब है, गाँव में लगभग 75 प्रतिशत लोग गरीब रहते हैं, ये वो गरीब हैं जिसका घर प्रतिदिन कमाई के भुगतान पर चलता है। गाँव की 75 प्रतिशत आबादी में छोटे किसान(कम जमीन वाले किसान), भूमिहीन किसान के अलावा देहाड़ी मजदूर आते हैं। इसी श्रेणी में ये देश के वो लोग हैं जिसका दैनिक काम बंद तो घर का चुल्हा ठंडा। इनलोगों के लिए सरकार ने मुफ्त चावल, गेहूं और दाल देने की घोषणा की है। हरियाणा के मुख्यमंत्री ने किसानों से हक कि बात कहने कि बजाय इस विपरीत हालात अपने ऊपर हल्की-फुलकी ज़िम्मेदारी लेते हुये गुजारिश करते हैं कि 1 केजी से 5 केजी प्रति क्विंटल के हिसाब से दान कर देना चाहिए। ये उस वक़्त कहा जा रहा है जब किसान के अनाज न्यूनतम समर्थन मूल्य पर खरीद नहीं हो रही है। खेतों में फसल पड़ा हुआ है। कोई निकलकर काटने नहीं जा पा रहा है। पूर्व के तैयार फसल का खरीद-बिक्री केंद्र बंद है।
500 लाख टन अनाज एफ़सीआई गोदाम में पड़ा हुआ है कोई ऐसा सरकारी व्यवस्था नहीं है जिसके जरिये इस अनाजों को गांवों तक पहुंचाया जा सके। उन भूखे गरीबों तक पाहुचाया जा सके जो इस समय अचानक लॉक डाउन की घोषणा से अपने संकरें कमरों में केदियों सी जिंदगी गुजर रहे हैं। इसमें सबसे बड़ी तादाद 10 से 15 हजार या उससे कम कमाने वालों की है। दिल्ली में इस वक़्त लाखों की संख्या में दिहाड़ी मजदूर और छोटे कारखानों के कारीगर जो अपने घर नहीं जा सके दिल्ली सरकार के तमाम हवा-हवाई दावों के बीच भी यमुना किनारे गीली जमीन पर रहने को मजबूर हैं। इसके अलावा ये सभी जंगलों में भी रहने को मजबूर हैं, ये लोग कभी-कभी 24 घंटे में एक वक़्त का खाना खा रहे हैं।
भारत में मनरेगा मजदूरों के साथ आम मजदूरों की स्थिति और कोरोना संकट
भारत में मानरेगा के कार्ड धारी पंजीकृत 7 करोड़ 63 लाख है। जिसके लिए सरकार के बजट में 20000 हजार करोड़ शामिल है। इस योजना के तहत एक मजदूर को एक साल में 100 दिनों का रोजगार 205 रुपए के दैनिक भुगतान के हिसाब से मिलेगा। इस बजट के मुताबिक 6 करोड़ मजदूरों को 16 दिन के काम के लिए 205 रुपए दैनिक मजदूरी के हिसाब से खर्च हो जाएगा। इस प्रकार 205 रुपए के न्यूनतम मजदूरी के हिसाब से पंजीकृत मजदूरों को साल 2020 में 16 दिनों के दैनिक मजदूरी से एक मजदूर 3200 रुपए मिलते हैं, जो इन मजदूरों को पूरे एक साल चलाना है। ये रिपोर्ट वर्ष 2020 का है। इस प्रकार फसल बीमा योजना की भी लगभग यही हालत है। ऐसे में क्या देश के जिम्मेदारों से कोई उचित सवाल पूछा नहीं जाना चाहिए। इन
सरकार का एक और फैसला देश सभी ग्रामीण हाट(जो लगभग 22000 हैं) को कृषि मंडी में बदला जाएगा। सरकार ने अबतक 22000 ग्रामीण हाट में से सिर्फ 410 हाटों को कृषि मंडी में बदल पाई है।
सूरत में पवार लूम में काम करने वाले मजदूरों के साथ बांद्रा में भी बड़ी तादाद में मजदूरों ने बाहर निकलकर सरकार से लगातार अपने घर जाने कि व्यवस्था का मांग कर रहे हैं। इस तरह कि डिमांड सोश्ल मीडिया के माध्यम से और भी मजदूर घर भेजने की मांग कर रहे हैं।
अमेरिका जैसे समृध्द देश में अबतक डेढ़ करोड़ लोगों ने बेरोजगारी भत्ता के लिए ऑनलाइन अप्लाई किया है। रिजर्व बेंक और अंतर्राष्ट्रीय मजदूर संगठन ने कहा है कि भारत में असंगठित क्षेत्रों में काम करने वाले लोगों कि संख्या दुनिया के देशों में सबसे ज्यादा भारत, नाइजीरिया और ब्राज़ील में प्रभावित होंगे। लॉक डाउन के ठीक पहले भारत में 40 करोड़ लोग कल-कारखानों में काम करते हैं। इन फेक्टरियों में लॉक डाउन के बाद 3.4 करोड़ ही बचे हैं। बाकी लगभग 36 करोड़ लोगों को अपने कामों से हाथ धोना पड़ा है ये लोग अपने घरों में बैठे हैं या अचानक लॉक डाउन की वजह से शहरों में जहां-तहां फंसे हैं। लोग इस वक़्त खर्च नहीं कर रहे हैं, उत्पादन बंद है। ग्रामीण से लेकर शहरी अर्थव्यवस्था पूरी तरह से धारासाही हो चुका है। ऐसे में सरकार को टीवी पर बिलियन ट्रिलियन संख्या का मेकअप लगाकर गाल बजाने से नहीं होगा, बल्कि उत्पादन से लेकर डिस्ट्रिब्यूशन तक के शृंखला को ठीक करना होगा। बाजार और आम लोगों में पैसे के विकेन्द्रीकरण के चेन को और मजबूत करना होगा। अनाजों से भरे गोदामों को खोलकर जमाखोरी से बचाना होगा ताकि लोग कम से कम अपनी भूख मिटा सके।
इसके अलावा सरकार ने लॉक डाउन को 3 मई तक जारी रखने के लिए घोषणा हो चुकी है। सरकार तमाम योजनाओं से संबन्धित वेबसाइटों को एक बार विजिट कीजिये देश कि जनता के कई सवाल अधर में पड़े दिखाई देंगे जिसका सरकार के अधकरियों के पास कोई जवाब नहीं है। सरकार और उसके अधिकारी मीडिया के स्क्रीन पर घोषणाओं में जूटे हैं। स्वास्थ्य, भूख और बेरोजगारी की समस्या एक साथ खड़ी है। देश की समस्याओं के संप्रदायिकरण से भी बचाना है। हमें सरकार के सही फैसले के साथ हमेशा खड़े रहना है, लेकिन जो वाजिब सवाल है उसे मजबूती के साथ उठाना भी है।

 

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