करण थापर-प्रशांत किशोर इंटरव्यू से मुसलमान क्या सीख सकते हैं?

यह देखिये कि अगर हिन्दू समाज ने प्रशांत किशोर पांडेय जैसा शख़्स पैदा किया तो उसी समाज ने करण थापर भी तो पैदा किया है। मुस्लिम समाज में क्या है? ये देखना है तो दिल्ली और अलीगढ़ के मुस्लिम विश्वविद्यालयों में देखिये। अगर आप ईमानदार और अंतर्दृष्टि वाले हैं तो आप एक सही नतीजा हासिल करने वाली तुलना कर पाएंगे।

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करण थापर-प्रशांत किशोर इंटरव्यू से मुसलमान क्या सीख सकते हैं?

मोहम्मद सज्जाद

मशहूर पत्रकार और इंटरव्यू के ताल्लुक़ से दुनिया के बहुत मुश्किल पत्रकारों में से एक, करण थापर के साथ ‘दि वायर’ के लिए प्रशांत किशोर पांडेय के इंटरव्यू (22 मई 2024) में प्रशांत का तेवर भाजपा के प्रवक्ता की तरह था।

प्रशांत जब प्रधानमंत्री के मुस्लिम विरोधी भाषणों के बचाव में सोनिया गांधी के बयान (मौत के सौदागर) का हवाला देकर काम चलाने की नाकाम कोशिश कर रहे थे, तब वह अपने बदतरीन पक्षपात का प्रदर्शन भी कर रहे थे और शायद उनके व्यक्तित्व और विचारधारा के हवाले से यही ठोस सच्चाई है।

अच्छा हुआ, वह और स्पष्ट तौर पर बेनक़ाब हो गए। पिछले दिनों बिहार में उन्होंने बस एक काम पर ख़ुद को लगा रखा है – मुसलमानों को राजद और कांग्रेस से अलग करना और इस तरह भाजपा की जीत को आसान बनाना। शायद उन्होंने पूरी मुस्लिम आबादी को मासूम या बेवक़ूफ़ या बिकाऊ सामान समझ रखा है।

हो सकता है चुनाव के नतीजे के संबंध में उनकी ‘भविष्यवाणी’ या अनुमान सही हो जाए लेकिन उन्हें यह स्वीकार करना चाहिए था कि उनकी अटकलें अतीत में कुछ एक बार ग़लत भी साबित हुई हैं। लेकिन वह अपने ही ट्वीट से इन्कार हठधर्मी और बदतमीज़ी कर रहे थे।

हालांकि पेशेवराना पैमाने पर रख कर देखा जाए तो करण थापर भी किसी-किसी लम्हे अपना संतुलन खो रहे थे, लेकिन उन्होंने ख़ुद को संभाला। मुझे व्यक्तिगत तौर पर वह इंटरव्यू (21 मई 2024) ज़्यादा बेहतर लगा जिसमें कपिल सिब्बल ने एएनआई की पत्रकार स्मिता प्रकाश को अपने सटीक जवाबों से उस पत्रकार की कमज़ोरियों और उसके पक्षपात को बेनक़ाब कर दिया था।

बहरहाल, बेपनाह लालच और हवस के इस दौर में बदतरीन और बेईमान तरीक़ों से ही सही, जिसने भी दौलत और ताक़त हासिल कर ली, लोग उसे कामयाब समझने लगते हैं और उस जैसा बनने की कीचड़ में धंसने लगते हैं। आज के नौजवानों के एक हिस्से ने कुछ इसी तरह प्रशांत किशोर पांडेय को अपना रोल मॉडल बना रखा है।

करण थापर ने प्रशांत से एक बेहद अहम सवाल नहीं पूछा क्योंकि वह सवाल इंटरव्यू के विषय से थोड़ा हट कर था। सवाल यह है कि हाल ही में बिहार में जनसुराज यात्रा के दौरान वो ज़्यादातर मुस्लिम बहुल क्षेत्रों में ही क्यों जा रहे थे? उनके लिए काम करने वालों में मुस्लिम नौजवानों की अच्छी ख़ासी तादाद है। कुछ नौजवान ऐसे भी हैं जो कुछ दिनों पहले तक तेजस्वी यादव के समर्थक थे और अब विधायक बनने की जल्दबाज़ी में हैं, चाहे ये काम प्रशांत किशोर ही के ज़रिये क्यों न हो जाये! उनमें से कुछ ऐसे मुस्लिम नौजवान भी हैं जिन्हें फ़ेसबुक पर कुछ लाइक्स मिल जाने की वजह से लगता है कि उनके अंदर विधायक और सांसद बनने की सारी योग्यताएं मौजूद हैं। शोहरत, ताक़त और दौलत पाने की जल्दबाज़ी और हवस ने उनके होश-ओ-हवास छीन रखे हैं। वे बावले हो चुके हैं। वे इस सच्चाई को स्वीकार ही नहीं कर पा रहे हैं कि भारत बदल चुका है। सत्ता में भाजपा रहे या न रहे, लेकिन भारत के मुसलमानों के ताल्लुक़ से पॉलिसी और नज़रिए में ‘क्रांतिकारी’ परिवर्तन आ चुका है। बाक़ी दूसरे अनेक क्षेत्रों में मुसलमानों का करियर होगा लेकिन संसद और विधानसभाओं में उनकी नुमाइंदगी अभी और भी कम होती रहेगी। लिहाज़ा, तुर्क और मुग़ल के घोड़े से उतर कर उस तरफ़ भी देखिये जिस तरफ़ घोड़े के चले जाने के बाद की जो उड़ती धूल होती है, वो दिखाई न दे रही हो। क़ुर्रतुलऐन हैदर (1927-2007) की एक उर्दू में लिखी कहानी का शीर्षक है ‘दरीं गर्द सवार-ए-बाशद’ (1981)। इस कहानी के संवादों को ग़ौर से पढ़िए, देर तक सिर धुनिये, और फिर बदले हुए ज़माने में शिक्षा और रोज़गार पर ध्यान केंद्रित कीजिये। पावर थिओलॉजी के तहत इस वक़्त सांसद और विधायक बनने का रोग पालियेगा तो आप पछताने लायक़ भी न रखे जाएंगे।

प्रशांत किशोर पांडेय ने बिहार के मुसलमानों को सियासी तौर पर गुमराह करने का ठेका ले रखा है। वो मुस्लिम नौजवानों को सत्ता दिलवाने की अफ़ीम पिला रहे हैं। दशकों से यही अफ़ीम हमारे नौजवानों को पिलाया जा रहा है, ख़ुद हमारे रहनुमाओं के ज़रिये। प्रशांत ने कथित तौर पर, आईआईटी और आईआईएम जैसे उच्च, प्रतिष्ठित शिक्षण संस्थाओं से डिग्रियां ले कर अपनी दुकान चमकाई लेकिन सुस्ती और जल्दबाज़ी के शिकार मुस्लिम नौजवान, बग़ैर उस स्तर की शिक्षा लिए ही शोहरत, दौलत और ताक़त हासिल करना चाहते हैं।

तक़रीबन ढाई दशकों से मुस्लिम विश्वविद्यालयों में पठन-पाठन, शोध और प्रकाशन से मेरा ताल्लुक़ है। बिहार और उत्तर प्रदेश के ही मुस्लिम नौजवानों से ज़्यादातर वास्ता पड़ता है। मुझे उनकी इच्छाओं और आकांक्षाओं, उनकी ख़ूबियों और ख़ामियों, कमज़ोरियों और उनकी मनोवैज्ञानिक स्थितियों का कुछ अंदाज़ा है। मैं उनकी प्राथमिकताओं से भी परिचित हूं। वाइस चांसलर बनने की होड़ में उनके शिक्षकों की ‘इंद्रेश परस्ताना सियासत’ ने इन नौजवानों को भी कमज़ोर बना डाला है। मुसलमानों की यूनिवर्सिटियों के अंदर अयोग्य शिक्षकों को ही पदों से नवाज़ा जा रहा है और उन पदों पर वे लम्बे समय तक क़ब्ज़ा जमाये बैठे रहते हैं। और इन शिक्षकों के चुने हुए प्रतिनिधि बेईमान ख़ामोशी इख़्तियार किये हुए हैं या उन्हीं लुटेरों के साथ सांठ-गांठ किये हुए हैं। सेमेस्टर और प्रवेश परीक्षाओं में बड़े पैमाने पर खुलेआम धांधली और लापरवाही की जा रही है और इन सब पर आपराधिक मौन सहमति दी जा रही है। लिहाज़ा इन विश्वविद्यालयों के छात्रों में भी शैक्षणिक योग्यता और प्रतिभा क्षमता के बढ़ने की तमन्ना लगभग शून्य पड़ जाती है और तिकड़मबाज़ी से पद हासिल करने की चालें सीखने पर पूरा ध्यान केंद्रित हो जाता है।

एक कामयाब पत्रकार, करण थापर (हिन्दू) ने एक कामयाब इलेक्शन मैनेजर प्रशांत किशोर पांडेय (हिन्दू) को अपने सवालों से बेनक़ाब कर दिया। उसकी भगवा वैचारिकी को सरेआम खोल कर रख दिया। उसकी सभी वैचारिक बेईमानियों को दुनिया के सामने लाकर रख दिया। ठीक उसी तरह, कितने मुस्लिम पत्रकार हैं जो मौक़ापरस्त, ‘इंद्रेश’परस्त, ‘भागवत’परस्त, ‘मोदी’परस्त, ‘योगी’परस्त मुसलमानों और सांप्रदायिक मुसलमान नेताओं और प्रोफ़ेसरों को बेनक़ाब करने की हिम्मत, नीयत और जज़्बा रखते हैं? एक बार इस बात पर भी आत्म मंथन करियेगा।

मुस्लिम बुद्धिजीवियों, पत्रकारों, शोधकर्ताओं और नेता बनने की आरज़ू रखने वाले सेवारत और सेवानिवृत्त मुस्लिम अफ़सरों ने ऐसे लेख और ऐसी किताबें तो लिख डालीं जिनमें हिन्दू सांप्रदायिक शक्तियों के मुस्लिम विरोधी कारनामों के दस्तावेज़ हैं, लेकिन ख़ुद मुसलमानों ने मुसलमानों के ख़िलाफ़ जो ज़ुल्म किये हैं और कर रहे हैं उनका दस्तावेज़ीकरण कौन बहादुर और ईमानदार मुसलमान तैयार करेगा?

अलीगढ़ मुस्लिम यूनिवर्सिटी और जामिया मिल्लिया इस्लामिया के प्रशासन के अंदर, दाख़िले और बहाली की सतह पर, यूनिवर्सिटी की ज़मीनें क़ब्ज़ा करने की सतह पर, क़ौम को बेच कर पद हासिल करने की सतह पर, जो कुछ भी हो रहा है उसे बेनक़ाब करने की हिम्मत ख़ुद मुसलमानों के अंदर क्यों नहीं है? मुसलमानों के अंदर इतनी नैतिक गिरावट क्यों है? एएमयू के अंदर शिक्षकों के नुमाइंदे इस भ्रष्टाचार पर ख़ामोश क्यों हैं? हम हिंदुओं से चाहते हैं कि वे मोदी को कम-से-कम तीसरी बार सत्ता न दें, लेकिन मुस्लिम यूनिवर्सिटियों के अंदर जो प्रोफ़ेसर किसी पद पर दसियों सालों से क़ब्ज़ा किए बैठे हैं, वे उसी पर जमे रहें!

हिंदुओं की एक अच्छी तादाद हिंदू सांप्रदायिकता से आज भी लड़ रही है लेकिन मुसलमानों की नैतिक गिरावट का सबूत चाहिए तो दोनों मुस्लिम यूनिवर्सिटियों के अंदर पदाधिकारियों और चुने हुए नुमाइंदों का किरदार देखिए। कौन मुसलमान किस‌ मुसलमान के यहां लंच, डिनर, हाई टी वग़ैरह की मार्फ़त किस सियासी पार्टी के लिए वोट मांगता फिर रहा है? इन कार्यक्रमों की वीडियो क्लिप्स और तस्वीरें देखिये, उनमें मौजूद मुस्लिम प्रोफ़ेसरों की बेहयाई देखिये और हिंदू बुद्धिजीवियों की हिंदू सांप्रदायिक शक्तियों के ख़िलाफ़ जद्दोजहद देखिए। भगवा सियासत की हिमायत करने वाले मुस्लिम प्रोफ़ेसरों को मिलने वाले मुस्लिम प्रोफ़ेसरों के वोटों की तादाद देखिये और इस सब का ईमानदारी के साथ विश्लेषण कीजिये।

संक्षेप में कहूं तो यह देखिये कि अगर हिन्दू समाज ने प्रशांत किशोर पांडेय जैसा शख़्स पैदा किया तो उसी समाज ने करण थापर भी तो पैदा किया है। मुस्लिम समाज में क्या है? ये देखना है तो दिल्ली और अलीगढ़ के मुस्लिम विश्वविद्यालयों में देखिये। अगर आप ईमानदार और अंतर्दृष्टि वाले हैं तो आप एक सही नतीजा हासिल करने वाली तुलना कर पाएंगे। वरना हमारी क़ौम में मुनाफ़िक़ों, मक्कारों और मौक़ापरस्तों का जो बोलबाला है, उसे न देख पाने का झूठ ख़ुद से बोलते रहिये।

आत्म मूल्यांकन की बात करने से क़ौम को मिर्ची लगती है। फिर भी यह लिख रहा हूं। आगे आप की मर्ज़ी! और आपके बेईमान और मक्कार बुद्धिजीवियों और रहनुमाओं की मर्ज़ी!

हिन्दी अनुवाद: रेयाज़ अहमद

(क़िंदील ऑनलाइन से साभार)

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