NEP2020 : 62 पन्नों की पॉलिसी दस्तावेज में मुस्लिम मदरसों के बारे में एक शब्द भी नहीं ?

“यह लेख नई शिक्षा नीति 2020 को लेकर मुस्लिम दृष्टिकोण को प्रस्तुत करता है. लेखक का कहना है कि मुस्लिम मदरसों की स्थिति चिंता का विषय है. इन 62 पन्नों की पॉलिसी दस्तावेज में मुस्लिम मदरसों के बारे में एक शब्द भी नहीं है. जब आश्रम और आश्रम शालाओं में बाल शिक्षा के बारे के पॉलिसी में बात की जा सकती है तो मदरसों की उपेक्षा क्यों की गई है? उच्च माध्यमिक स्तर पर दी जाने वाली विदेशी भाषाओं की सूची में अरबी को शामिल नहीं किया गया है. अरबी उन देशों की भाषा है जहां सर्वाधिक अप्रवासी भारतीय रहते हैं.”

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हाल ही में लागू की गई राष्ट्रीय शिक्षा नीति (NEP-2020) देश में नई शिक्षा प्रणाली का आगाज़ करने को तैयार है. इसमें निहित महत्व और दूरगामी प्रभावों के कारण इस पॉलिसी का अध्ययन करना हमारे लिए बेहद ज़रूरी है.

हमारे पहले शिक्षा मंत्री मौलाना अबुल कलाम आज़ाद ने “सबके लिए शिक्षा” और “सामाजिक बदलाव के लिए शिक्षा” के विचार की बुनियाद रखी थी.

हालांकि एक औपचारिक शिक्षा नीति की घोषणा पहली बार 1968 में की गई, लगभग बीस साल बाद.

दूसरी शिक्षा नीति प्रधानमंत्री राजीव गांधी द्वारा 1986 में लाई गई. लगभग 34 साल बाद बड़े पैमाने पर डेटा इकठ्ठा करने और रायशुमारी और तीन ड्राफ्ट संस्करणों के बाद अंतत: NEP-2020 मंत्रिमंडल द्वारा औपचारिक रूप से स्वीकृत कर ली गई और सार्वजनिक रूप से लागू करने के लिए लाई जा चुकी है. हमें राष्ट्रीय शिक्षा नीति-2020 को एक आलोचनात्मक नज़रिए से देखना चाहिए साथ ही साथ इसके सकारात्मक पक्षों की प्रशंसा भी करनी चाहिए.

यह पॉलिसी बहुत महत्वकांक्षी है क्योंकि इसका मकसद भारत को “विश्वगुरु” बनाना है. यह तभी मुमकिन होगा जब भारत के सभी नागरिकों के साथ साथ मुख्य हिस्सेदार जैसे कि छात्र, अध्यापक, माता-पिता, अपने प्रशासन और प्रबन्धन के साथ शिक्षा संस्थान व सरकार एकजुट होकर राष्ट्रीय शिक्षा नीति को लागू करने के लिए काम करे. सामाजिक समूह और अल्पसंख्यक राष्ट्रीय शिक्षा नीति द्वारा प्रभावित होंगे इसलिए उन्हें इसके द्वारा मिलने वाली चुनौतियों का सामना करने के लिए तैयार रहना होगा. अल्पसंख्यक सामाजिक वास्तविकता हैं जिन्हें हमारे संविधान द्वारा मान्यता दी गई है. मुस्लिम समुदाय उस अल्पसंख्यक वर्ग का एक बड़ा हिस्सा है.

जब हम राष्ट्रीय शिक्षा नीति-2020 को मुस्लिम नज़रिए के साथ देखते हैं तो इसमें कई सारी सकारात्मक बातों के साथ कुछ कमियां पाते हैं जो गंभीर चिंता का विषय है. हमें एक ज़िम्मेदार नागरिक होने के नाते इस पॉलिसी का अध्ययन करना चाहिए और दलित व ओबीसी जैसे दूसरे अल्पसंख्यक वर्गों के साथ सरकार व अधिकारियों से जुड़ने के तरीकों को तलाश करना चाहिए. अगर इसमें कुछ कमियां हैं तो उन्हें सही रूप में पहचान कर सरकार के समक्ष उचित सुझाव प्रस्तुत किए जाने चाहिए.

शिक्षा नीति-2020 को लेकर प्रमुख चिंता का विषय इसका गैर समावेशी दृष्टिकोण है. यह पॉलिसी प्राचीन भारत के उच्च शिक्षा के संस्थानों से प्रेरणा लेने तक ही खुद को सीमित करती हुई प्रतीत होती है. ऐसा लगता है कि मानो मध्यकालीन भारत में फले फूले शिक्षा संस्थानों को पूरी तरह से उपेक्षित छोड़ दिया गया है. मध्यकालीन युग में मुस्लिमो द्वारा स्थापित मदरसा प्रणाली में धार्मिक विषयों के साथ-साथ धर्मनिरपेक्ष विषयों जैसे कि तिब्ब (चिकित्सा) रियाज़ी (गणित) को लागू करने के लिए लॉर्ड मैकाले द्वारा भी बहुत प्रशंसा की गई है.

इतिहास के महत्वपूर्ण हिस्सों को जानबूझकर छोड़ा जाना, नीति बनाने वालों की मानसिकता में व्याप्त बारीक पूर्वाग्रह को दर्शाता है. उन के लिए मुस्लिम और ब्रिटिश शासकों के आने के बाद का भारत का इतिहास दागदार है और उसमें कुछ भी सार्थक नहीं है. इस नीति में आज़ादी के बाद शिक्षा के क्षेत्र में भारत द्वारा की गई शानदार प्रगति का भी कोई ज़िक्र नहीं है. अलीगढ़ मुस्लिम विश्वविद्यालय, जामिया मिल्लिया इस्लामिया, बनारस हिन्दू विश्वविद्यालय और जवाहर लाल नेहरू विश्वविद्यालय के योगदान का कोई ज़िक्र नहीं है.

चिंता का दूसरा विषय यह है कि पूरे दस्तावेज में कहीं भी अल्पसंख्यक शब्द का प्रयोग भी नहीं किया गया है. बहुत विशेष होने के कारण राष्ट्रीय शिक्षा नीति-2020 में इसका उल्लेख केवल एक बार (सेक्शन 6.2.4.) में किया गया है जो इसके विभिन्न प्रकार की परिभाषाओं और मूलमंत्र के व्यापक उपयोग जो आधुनिक शिक्षा साहित्य और विचार-विमर्श की शब्दावली बनाते हैं में केवल इसका उल्लेख है.

सच्चर रिपोर्ट के अनुसार ‘उच्च शिक्षा में मुसलमानों का सकल नामांकन अनुपात (Gross Enrolment Ratio) केवल 4.4 प्रतिशत है. यदि नई शिक्षा नीति इस अनुपात को वर्तमान राष्ट्रीय स्तर से 26 प्रतिशत से 50 प्रतिशत तक ऊपर लाना चाहती है तो यह नीति उन भारतीय मुस्लिम जो कि अल्पसंख्यक आबादी का 14 प्रतिशत हिस्सा हैं, को नजरंदाज करने का जोखिम नहीं उठा सकती.

नई शिक्षा नीति रचनात्मकता, तार्किक सोच और समावेशी दृष्टिकोण के बारे में बात करती है. यह वर्तमान राजनीतिक माहौल में बहुत विरोधाभासी लगता है जबकि विरोधी स्वरों, प्रश्न पूछे जाने के अधिकारों को कुचला जा रहा हो और बहुसंख्यकवाद को बढ़ावा दिया जा रहा हो. संविधान के आर्टिकल 30 में प्रतिष्ठित अल्पसंख्यक शिक्षण संस्थानों के अधिकारों पर इस पॉलिसी के मौन को लेकर भी अल्पसंख्यक चिंतित हैं. यह पॉलिसी छात्रों और अध्यापकों को विविधता का सम्मान करने के लिए उन्हें संवेदनशील बनाने पर ज़ोर देती है जबकि राजनीति को एक राष्ट्र, एक राष्ट्रभाषा या एक राष्ट्र-एक संस्कृति के मार्ग पर धकेला जा रहा है.

तीसरा चिंता का विषय शिक्षा नीति द्वारा एजुकेशन सिस्टम का केंद्रीकरण करने की ओर अत्यधिक झुकाव है, यह स्वाभाविक परिणाम के के रूप में हमारी संघीय राजनीति को कमज़ोर करेगा. यह अल्पसंख्यकों और अल्पसंख्यक शिक्षण संस्थानों पर भी असर डालेगा. प्रवेश प्रक्रिया के दौरान सीटों के आरक्षण और अल्पसंख्यकों को दी जाने वाली शिक्षा सम्बन्धित दूसरी रियायतों को लेकर भारत में अलग-अलग राज्यों की अलग-अलग पॉलिसी हैं. यह भी स्पष्ट नहीं है कि राष्ट्रीय शिक्षा नीति-2020 चीजों को कैसे बदलेगा और मुस्लिमों ने केंद्र के अल्पसंख्यकों के प्रति ट्रैक रिकॉर्ड के आधार पर आशंकाओं को उचित ठहराया है. फंड के आवंटन, शिक्षा के मापदंडों, दूसरी शिक्षा संस्थाओं में कमज़ोर शिक्षा संस्थाओं का एकीकरण और नए शिक्षण परिसरों के लिए स्थान और सुविधाओं को लेकर भी चिंता बनी हुई है.

अन्य बड़ी चिंता मुस्लिम मदरसों के हालात को लेकर है. इन 62 पन्नों की पॉलिसी दस्तावेज पर मुस्लिम मदरसों के बारे में एक शब्द भी नहीं है. जब आश्रमों और आश्रम शालाओं में बाल शिक्षा के बारे के पॉलिसी में बात की जा सकती है तो मदरसों की उपेक्षा क्यों की गई है? उच्च माध्यमिक स्तर पर दी जाने वाली विदेशी भाषाओं की सूची में अरबी को शामिल नहीं किया गया है. अरबी उन देशों की भाषा है जहां सर्वाधिक अप्रवासी भारतीय रहते हैं. अरबी भाषा बोलने वाले देशों से हमारे सांस्कृतिक, व्यावसायिक और कूटनीतिक सम्बन्ध हैं. राष्ट्रीय शिक्षा नीति-2020 शिक्षण संस्थानों को फंड करने में लोक कल्याण की भावना की बात करती है. यदि फंडिंग कॉरपोरेट सीएसआर के ज़रिए आयेगा तो यह शिक्षा के व्यवसायीकरण और दुरपयोग की आशंकाओं को और बढ़ाएगा.

शिक्षण स्वयसेवकों में वैचारिक पूर्वाग्रहों को कम करने के लिए भी कोई कारगर उपाय नहीं है जो कि हमारी बहुलतावादी, सामंजस्यपूर्ण और बहुसांस्कृतिक माहौल को नुकसान पहुंचाएगा. उच्च माध्यमिक कक्षाओं के लिए लाया गया अनिवार्य स्किल डेवलपमेंट मॉडल जरूरतमंद और कमज़ोर छात्रों की ड्रॉपआउट दर को बढ़ाएगा विशेष रूप से अल्पसंख्यक छात्र अपने उच्च प्रोफेशनल एजुकेशन प्राप्त करने के सपनों को छोड़ कर व्यावसायिक ज्ञान के साथ रोजगार की तलाश करेंगे.

मुसलमानों के पास राष्ट्रीय शिक्षा नीति के सम्बन्ध में करने का काम क्या है. पहला काम है इस दस्तावेज़ की अच्छी तरह से जांच करना और इसके ज़रिए अल्पसंख्यक समुदाय के समक्ष सामना की जाने वाली चुनौतियों और अवसरों पर डिबेट करना. शैक्षिक विशेषज्ञों की सुविधाओं को उपयोग में लाकर एक सकारात्मक नज़रिया अपनाते हुए अपनी चिंताओं और आशंकाओं पर मुसलमानों को सरकार के साथ जुड़ना चाहिए. मुसलमानों को पाठ्यक्रम निर्धारण, फंडिंग और शिक्षाशास्त्र जैसे विभिन्न मुद्दों पर अपनी सिफारिशें प्रस्तुत करनी चाहिए.

मुस्लिम समुदाय को छोटे से छोटे लेवल पर जाकर मुस्लिम प्रबन्धन वाले स्कूलों और कॉलेजों के साथ बातचीत करने के लिए बड़े पैमाने पर शिक्षा स्वयंसेवकों को तैयार करना चाहिए, जो उपलब्ध नवीनतम संसाधनों का उपयोग करके शिक्षा के मानक को बेहतर बनाने का प्रयास करेंगे. साथ ही दूसरे अल्पसंख्यक वर्गो विशेष रूप से ईसाई वर्ग को साथ लेकर सरकार के साथ बातचीत होनी चाहिए.

सरकार से यह सवाल पूछा जाना चाहिए कि अल्पसंख्यकों और मदरसों के लिए आरक्षण के मुद्दे पर राष्ट्रीय शिक्षा नीति चुप क्यों हैं. टॉप 100 ग्लोबल यूनिवर्सिटीज जो भारत में अपना कैंपस बनाएंगी क्या वो भारत के अल्पसंख्यक, सामाजिक और आर्थिक रूप से वंचित तबकों के लिए सकारात्मक क़दम उठाएंगी? क्या सामाजिक न्याय का लक्ष्य इसके बिना प्राप्त किया जा सकता है?

मुसलमानों को अब अपना ध्यान संस्थानों के लिए ऊंची इमारतें बनाने से हटाकर शिक्षण संस्थानों की ‘सॉफ्ट पावर’ यानी शिक्षकों और उनके शिक्षण कौशल पर केंद्रित करना चाहिए जैसे शिक्षा और शिक्षा तकनीक पर. मुस्लिम समुदाय को ट्रेनिंग कार्यक्रमों को लगातार और स्थाई रूप से चलाना चाहिए. राष्ट्रीय शिक्षा नीति-2020 मुस्लिमों के लिए दोधारी तलवार की तरह है. इसे अपने लिए उपयोगी बनाने के लिए दृढ़ संकल्पित होना पड़ेगा. ज़ाहिर है उनका भविष्य दांव पर है.

-सैयद तनवीर अहमद 

(लेखक एक शिक्षाविद् हैं और केंद्रीय शिक्षा बोर्ड, जमाअत इस्लामी हिन्द के डायरेक्टर हैं )

(हुमा अहमद द्वारा अंग्रेज़ी से हिंदी में रूपांतरित )

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