COVID-19! कोरोना महामारी के उपरांत आपदा प्रबंधन

इस्लाम के पैग़ंबर हज़रत युसूफ़ ने मिस्र में संकट का सामना करने के लिए दीर्घकालिक योजना के आधार पर एक सुधारवादी नीति पेश की थी और यह हमारे लिए वर्तमान स्थिति में भी उदाहरण बन सकती है।

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कोरोना महामारी के उपरांत आपदा प्रबंधन

(न्याय प्रणाली पर आधारित)

सरकार, उसकी नीतियों और राजनेताओं चाहे वे सत्ता पक्ष के हो या विपक्ष के, उनके ग़लत पक्षों की आलोचना करना गलत नहीं है। लोकतांत्रिक प्रणाली में, आलोचना हमेशा राज्य को कार्यकुशल बनाती है। आलोचना सिर्फ आलोचना के इरादे से करना भी ठीक नही है बल्कि हम आलोचना इस इरादे से करें कि वह राज्य को कुशल बनाने में हमारा सहयोग कर सके। विभिन्न दल सत्ता में आते-जाते रहते हैं लेकिन नीतियां, कृत्य और नियम उसी तरह जारी रहते हैं और जनता को प्रभावित करते हैं।

जैसा कि दुनिया के अधिकांश भाग में महामारी के कारण तालाबंदी है, ऐसी परिस्थितियां मानव इतिहास में नई नहीं हैं। इससे पहले भी हमने इस प्रकार की महामारियों का सामना किया है। कई राष्ट्र इन आपदाओं से बाहर आए हैं और अपने देश को बेहतर तरीके से विकसित किया है। लॉकडाउन के बाद खेती, कपड़ा, प्रौद्योगिकी, चिकित्सा के क्षेत्र आदि जैसे प्रत्येक सेक्टर में मंदी आने की पूरी संभावना है। व्यापक मंदी के इस संकट की संभावना को जानने और यह समझने के बाद कि इसका आम नागरिकों पर बड़ा प्रभाव पड़ सकता है, विशेषकर सरकारों व निजी हितधारकों को अपने हिस्से का योगदान देना चाहिए।

संकट से बचने के उपायों पर चर्चा से पहले यह जानना अत्यंत आवश्यक है कि आखिर ‘संकट’ है क्या?

इस तरह का संकट कैसे अपनी जगह बनाता है या फैलता है ? इसके बहुत आसानी से समझ आ जाने वाले कारण हैं जैसे:

संकट कैसे शुरू होता या पनपता है? प्रारंभिक चेतावनी के बाद भी राज्य और उसके हितधारकों की लापरवाही और सुस्ती के कारण या शुरुआती चरणों में संकट से निपटने में संसाधनों का उपयोग नहीं करने और नुकसान पहुंचाने से पहले प्राथमिकताओं को निर्धारित ना करने के कारण यह फैलता है और बड़े पैमाने पर नुकसान की भूमिका बनाता है।

संकट प्रबंधन

यह किसी व्यक्ति,संगठन,राज्य को महामारी जैसे संकट के समय बचाने की एक व्यवस्था है यह एक ऐसा तरीक़ा है जो संकट से जूझ रहे नागरिकों को इस संकट से निकालती है और विश्वसनीयता, निष्पक्षता और पारदर्शिता की गारंटी भी इस दौरान दी जाती है।

समाधान

  1. संरक्षणवादी होने के बजाय संसाधनों को साझा करना: इस संबंध में हमें इस्लाम के अंतिम दूत हज़रत मुहम्मद (सल्ल.) के जीवन के कई उदाहरणों से संकट प्रबंधन को स्पष्ट तरीके से समझने में मदद मिलेगी। ईश्वर की आज्ञाओं का पालन करने वाले व्यक्ति और उनके उल्लंघन करने वालों की तुलना में प्रतिबंधों का उदाहरण उन व्यक्तियों के उदाहरणों की तरह है जिन्होंने नाव में अपने स्थान को पाने के लिए बहुत कुछ किया। उन व्यक्तियों के उदाहरण की तरह, जिन्होंने नाव में अपनी सीटों के लिए बहुत कुछ आकर्षित किया। जब निचले हिस्से वालों को पानी की जरूरत पड़ी, तो उन्हें पानी लाने के लिए ऊपर जाना पड़ा, ( दूसरों को मुसीबत में डालकर) तो उन्होंने ख्याल किया कि क्यों न हम अपने हिस्से में पानी के लिए एक छेद कर दें और पानी पा लें बिना ऊपर वालों को बार बार परेशान किए, यदि ऊपरी हिस्से के लोग निचले हिस्से के लोगों की मदद करते हैं और उन्हें ऐसा करने से रोकते है तो नाव में सवार सब लोग सुरक्षित रहेंगे अन्यथा सब खत्म हो जाएगा। इस उदहारण से हम ये समझ सकते हैं के कोरोना जैसी महामारी के कारण चल रहे लॉकडाउन के दौरान हमें अपने पड़ोसियों,गरीबों, मजदूरों की सहायता करनी चाहिए।
  2. सीमित संसाधनों के साथ के साथ संकट से बचाव: इस्लाम के पैग़ंबर हज़रत युसूफ़ ने मिस्र में संकट का सामना करने के लिए दीर्घकालिक योजना के आधार पर एक सुधारवादी नीति पेश की थी और यह हमारे लिए वर्तमान स्थिति में भी उदाहरण बन सकती है। यह नीति चार आर्थिक संचालनों पर आधारित थी — 1. उत्पादन, 2. उपभोग, 3. बचत और 4. पुन: निवेश (बचत का हिस्सा)। उन्होंने प्रत्येक आर्थिक प्रक्रिया के उद्देश्यों, उनकी महत्ता, उनकी नीतियों तथा उनको लागू करने की योजना को बिना नैतिकता के ह्रास के साथ प्रस्तुत किया था।

मिस्र के राष्ट्रपति को पैग़ंबर यूसुफ़ द्वारा दी गयी समाधान की नीति के पीछे फलसफ़ा यह था, “सात बरस तक लगातार तुम लोग खेती-बाड़ी करते रहोगे। इस अवधि के दौरान जो फसलें आप काटो उनमें से बस थोड़ा सा हिस्सा, जो तुम्हारी ख़ुराक के कम आए, निकालो और शेष भाग को उसकी बालियों में ही रहने दो। फिर सात बरस बहुत कठिनाई भरे होंगे, उस ज़माने में वो सब अनाज खा लिया जाएगा जो तुम उस समय के लिए जमा करोगे अगर कुछ बचेगा तो बस वही जो तुमने बचा कर रखा था (अल-क़ुरआन)।

  • कृषि क्षेत्र का संरक्षण: भोजन हर व्यक्ति की बुनियादी जरूरत है और यह कई राज्यों में अर्थव्यवस्था की रीढ़ है। बड़ी काश्तकारी और खेती के अलावा, लॉकडाउन के कारण लोगों को निम्न स्तर पर घर आधारित खेती शुरू करने की आवश्यकता होती है, ऐसे में सब्जियां, फल, अनाज आदि की खेती हो सकती हैं। कई लोगों के पास उपजाऊ जमीन हो सकती है, खासकर गांवों में; इसका उपयोग खेती के लिए किया जा सकता है जो न केवल अल्पकालिक लक्ष्यों को पूरा करेगा बल्कि अर्थव्यवस्था में भी योगदान देगा। सोनिया गांधी ने भारत के प्रधानमंत्री को सुझाव दिया कि “कटाई के मौसम के चरम पर यह लॉकडाउन लागू हुआ है। कृषि फसल मार्च के अंत तक अधिकांश राज्यों में कटाई के लिए तैयार है। यद्यपि भारत की लगभग 60% आबादी आर्थिक रूप से कृषि पर निर्भर है अतः यह ज़रूरी है कि केंद्र सरकार MSP पर फसलों की कटाई और को सक्षम बनाने के लिए आवश्यक कदम उठाए। किसानों से सभी प्रकार की वसूली को छह महीने की अवधि के लिए निलंबित करने और ऋण अदायगी में उदारता व राहत देने पर विचार करने का भी यही सही समय है।
  1. लघु उद्योग का समर्थन: COVID-19 महामारी के कारण छोटे व्यवसायों को भी महत्वपूर्ण आर्थिक प्रभावों का सामना करना पड़ेगा। सरकार को यह सुनिश्चित करना चाहिए कि SIDBI द्वारा एसएमई के लिए उद्यमियों को पहले से अधिक अनुकूल शर्तों पर ऋण प्रदान करने जैसे कदम उठाए जिससे इसके प्रभाव को कम किया जाए। बड़ी फर्में भी अपने पैसे को चैनलाइज़ करने के लिए छोटे सप्लायर्स को राशि देकर बॉन्ड मार्केट से पैसा उगाही करने का एक उपयुक्त रास्ता खोज सकती हैं। -रघुराम राजन (पूर्व, आरबीआई गवर्नर)

किसानों, छोटे विक्रेताओं, व्यापारियों और उद्योगपतियों को सभी संभावित बांडों (जैसे लाभ और हानि के आधार पर, शेयर धारकों को) के साथ ब्याज-मुक्त ऋण देना महामारी के उपरांत अल्पावधि में ही अर्थव्यवस्था को स्थिर करने में बड़ी राहत होगी ।

  1. उपलब्ध संसाधनों का समुचित उपयोग: खर्चों में कटौती, COVID-19 के खिलाफ लड़ने के लिए आवश्यक धनराशि को एकत्र करने का बड़ा साधन और समय की महत्वपूर्ण आवश्यकता है। इस संबंध में,
  • लॉकडाउन अवधि के दौरान विभिन्न घटनाओं, केंद्र व राज्य मंत्रिमंडल के मंत्रियों के लिए आवंटित यात्रा व्यय (अंतर्राज्यीय, देश और विदेश यात्राओं में) को कोरोना महामारी से लड़ने में ख़र्च किया जाए।
  • सड़क के किनारे केंद्र व राज्य सरकारों की योजनाओं के प्रचार के लिए लगने वाले होर्डिंग्स-विज्ञापनों पर ख़र्च किए जा रहे फंड को तत्काल प्रभाव से रोका जाना चाहिए क्योंकि जनता सड़कों पर नहीं है।
  • केंद्र व राज्य सरकारों तथा पीएसयू द्वारा कम से कम दो साल की अवधि के लिए मीडिया विज्ञापनों (इलेक्ट्रॉनिक, प्रिंट और सोशल मीडिया) पर पूर्णतया प्रतिबंध लगना चाहिए।
  • परीक्षाओं के संचालन पर व्यय होने वाली धनराशि को अधिकृत निजी स्कूलों को भेजा ताकि वो संस्थान बदले में अगले शैक्षणिक वर्ष के लिए छात्रों से 30% फीस कम वसूलें।
  1. एक गाँव को गोद लें: यदि प्रत्येक एमएलए/एमएलसी, सांसद (राज्यसभा और लोकसभा दोनों), उद्योगपति/व्यवसायी, सेलिब्रिटी (फिल्म और खेल) और गैर सरकारी संगठन कम से कम तीन साल के लिए एक गाँव को गोद लेते हैं, तो देश भर के कम से कम 15,000 गाँवों/क्षेत्रों का विकास किया जा सकता है और यह शेष दुनिया के एक महान उदाहरण हो सकता है।

इसी तरह विभिन्न विभाग सभी संभावित तरीकों से संकट से निपटने के उपाय कर सकते हैं। इसमें कोई संदेह नहीं है कि स्वास्थ्य क्षेत्र प्राथमिकता है और इसे छोड़ा नहीं जाना चाहिए, हर संभव समर्थन और आवश्यकताओं की पूर्ति किया जाना चाहिए। आईए! संकट की इस घड़ी में एक-दूसरे का समर्थन करने के लिए आगे आएं, ताकि आने वाली पीढ़ियों को शांतिपूर्ण, नफरत मुक्त और न्याय की व्यवस्था प्रदान की जा सके।

सय्यद अज़हरुद्दीन

Email: [email protected] | Twitter: @SyedAzhars | Website: Imazhar.com

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