बीहड़ में बागी होते हैं, डकैत मिलते हैं पार्लियामेंट में-इरफान खान!

उनकी आंखें जितना बोलती थी, उनकी वास्तविक डायलॉग डिलीवरी उतने ही कमाल की थी। अपने उलझे हुये बालों के जरिये फ़िल्म ‘हिन्दी मीडियम’ की कहानी से किसको इत्तेफाक नहीं होगा कि आज भी हासिये पर धकेले एक आम भारतीय शिक्षा का अधिकार कानून होते हुये भी अनपढ़ है। राजनीति के अनपढ़ नेता आज ‘मदारी’ बन बैठा है।

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शाहिद सुमन

“बीहड़ में बागी होते हैं, डकैत मिलते हैं पार्लियामेंट में” मशहूर फिल्मी डायलोग इरफान खान बॉलीवूड की चुनिन्दा फ़िल्म ‘पान सिंह तोमर’ का सबसे पसंदीदा डायलोग में से एक है। चंबल के मशहूर डाकू बलवंत सिंह के जीवन पर आधारित फ़िल्म है, इस फ़िल्म की कहानी में एक फौजी एथलीट को उसके आस-पास के सामाजिक, राजनीतिक और आर्थिक हालात ने किस तरह चंबल के बीहड़ की राह पकड़ी, ये अपने आप में एक ऐसी जीवंत कहानी है जो आज भी मुश्किल हालात में संभव होती हुई दिखाई देती है। खैर यहाँ हम इस फ़िल्म का कोई समीक्षा लिखने के मूड में नहीं हूँ। आज इरफान खान के देहांतकाश की सूचना ने बरबस ये डायलोग याद कराया और मुझे जीवंत कर गया। एक डायलोग जो चंबल के बीहड़ों में जन्म लेता है और किस तरह हमारी तरफ अपराधबोध कराता है। बलवंत सिंह कोई खानदानी और पेशेवर डाकू नहीं था एक साधारण परिवार में हमारी ही तरह जन्मा और हमारे द्वारा उत्पन्न सामाजिक और राजनीतिक परिस्थितियों ने जंगली बीहड़ों में शामिल कर दिया। ऐसा लगता है मानो अब इरफान खान के जीवन का तो अंत हो गया लेकिन अपने साथ पान सिंह तोमर की रेखाचित्र को अनंत कर गए। वो अब हमेशा भारतीय समाज में घर गया। इस समय की भारत की राजनीतिक सच्चाई यही है कि देश कि संसद को छोड़कर सभी बाग़ी है।

इरफान की बॉलीवूड एलबम से फ़िल्म ‘पीकू’ का एक मशहूर डायलॉग था- “डेथ और शिट किसी को, कहीं भी, कभी भी आ सकती है.” आज 54 वर्ष की उम्र में बॉलीवुड के बेताज बादशाह का निधन हो गया, कैंसर से पीड़ित थे और मंगलवार को उनकी तबीयत अचानक खराब हो गई जिसके बाद उन्हें मुंबई के कोकिलाबेन धीरूभाई अंबानी अस्पताल में भर्ती कराया गया था। इसी अस्पताल में इन्होंने जीवन की आखिरी सांस ली इस तरह इरफान खान मृत्यु के अनंतकाल की इस सच्चाई को स्वीकारते हुये अपने मालिक-ए-हक़ीक़ी से जा मिले।

इरफान खान ने अपनी फिल्मों के जरिए लोगों को हंसाया और रुलाया। अपने किरदारों के जरिए उन्होंने दर्शकों को भावनाओं के गहरे सागर में गोते लगवाए। उनकी आंखें जितना बोलती थी, उनकी वास्तविक डायलॉग डिलीवरी उतने ही कमाल की थी। अपने उलझे हुये बालों के जरिये फ़िल्म ‘हिन्दी मीडियम’ की कहानी से किसको इत्तेफाक नहीं होगा कि आज भी हासिये पर धकेले एक आम भारतीय शिक्षा का अधिकार कानून होते हुये भी अनपढ़ है। राजनीति के अनपढ़ नेता आज ‘मदारी’ बन बैठा है। जिसकी डुगडुगी पर हम भारतीय जमुरा के किरदार में ‘जी उस्ताद, जी उस्ताद…’ का रट्टामार संघर्ष कर रहे हैं। ये एक “तुम मेरी दुनिया छीनोगे, मैं तुम्हारी दुनिया में घुस जाउंगा” मदारी फ़िल्म डायलोग है। यहीं से एक बाग़ी और डाकू का फर्क मिट जाता है और सबको एक मौके की तलाश होती है, फिर एक बाग़ी ही डाकू है और एक डाकू भी बाग़ी हो जाता है।

इस अभिनेता ने डाइरेक्टर मिरा नायर द्वारा निर्देशित 1988 में एक इंटरनेशनल फ़िल्म ‘सलाम बॉम्बे’ में एक छोटे से किरदार के साथ अपने फ़िल्मी सफर की शुरुआत की। इस फ़िल्म में खान एक सड़क छाप लड़के की छोटी भूमिका अर्थात नाम मात्र निभाई। उस वक़्त भी इस फ़िल्म को अकादमी पुरस्कार के लिए नामित किया गया था। जबकि इस फ़िल्म में मिरा ने लीड रोल देने का वादा किया था लेकिन इरफान के छोटे कद उस भूमिका के लिए फिट नहीं बैठ रहे थे। मिरा नायर के निर्देशन में 2006 में फ़िल्म ‘Namesake’ में पहली बार इरफान ने मुख्य अभिनेता के रूप में भूमिका निभाई। हालांकि इस दौरान इन्होंने छोटी-मोटी टेलीविज़न के स्क्रीन पर अपनी अदाकारी के जलवे बिखेरते रहे। फ़िल्म ‘Namesake’ ने अमेरिका के दर्शकों पर खान के अदाकारी का अमिट छाप छोड़ा और देखते ही देखते इस अभिनेता ने दुनिया के लोगों की नजरों को अपनी तरफ आकर्षित कर लिया। यह फ़िल्म इनके फ़िल्मी केरियार के लिए वरदान साबित हुआ। इसके बाद कभी इरफान ने अपने पूरे फ़िल्मी केरियर में पीछे मुड़कर नहीं देखा। इसके बाद अन्य अंतरराष्ट्रीय मशहूर A Mighty Heart (2009), Slumdog Millionaire (2009), In Treatment (2010), the life-altering The Life Of Pi (2012), Jurassic World (2015), Inferno (2018) जैसी फ़िल्मों ने दुनिया के दरवाज़े इरफ़ान के लिए खोल दिये।

सलम डॉग मिलेनियर और लाइफ ऑफ पाई जिसे हमने इसके चर्चे सुनकर देखने की कोशिश की। सलम डॉग मिलेनियर में एक अङ्ग्रेज़ी भाषा में 2008 में बनी ब्रिटिश फ़िल्म है। निर्देशक डेन्नी बॉयल ने सह-निर्देशक लवलीन टंडन के साथ मिलकर इसका फिल्मांकन किया है। कॉमनवेल्थ पुरस्कार द्वारा सम्मानित किताब ‘क्यू एंड ए’ पर आधारित है। इस फ़िल्म ने 81वीं ऑस्कर पुरस्कार समारोह में कुल 8 पुरस्कार अपने नाम किया। इस फ़िल्म में इरफान एक पुलिस इंस्पेक्टर की भूमिका में हैं। इस फ़िल्म की कहानी की शुरुआत मुंबई के एक पुलिस इंस्पेक्टर(इरफान खान) से शुरुआत होती है। पूरी फ़िल्म की कहानी मुंबई के धारावी के झुग्गी-झौपड़ी में रहने वाले जमाल की निजी ज़िंदगी पर आधारित है। इस फ़िल्म को देखकर झुग्गी-झौपड़ी में रहने वाले लोगों की पेशानी पर उगते जीवन रेखाओं को पढ़ सकते हैं। किस तरह जीवन के इतने विस्थापन सह कर भी अपने आप को आलीशान बंगले के सामने कूड़े के ढ़ेर पर स्थापित रखते हैं। विस्थापन की दर्दभरी ये कहानी आज गाँव से लेकर शहर तक एक जैसी है। हम अपने गांवों में भी जमाल जैसे सेंकड़ों सलम डॉग देखें हैं, जो जमाल की तरह खुश किस्मत नहीं हैं और न ही वो जमाल जैसी हिम्मत रखते हैं कि वे किसी जिम्मेदार द्वारा पुछे गए सवालों का जवाब उनपर बीती घटनाओं के मुताबिक हो।

इरफान की चर्चित फिल्मों में से एक ‘लाइफ ऑफ पाई’ भी रही है। इस फ़िल्म का निर्देशन मशहूर ताईवानी फ़िल्ममेकर Ang Lee ने किया था। इस फ़िल्म ने गोल्डेन ग्लोब अवार्ड भी जीता। एक जीवंत कहावत आपने भी सुनी होंगी “जो अपनी मदद के लिए स्वंय को तैयार नहीं करेगा तो खुदा भी उसे बेसहारा छोड़ देता है”। इस फ़िल्म की कहानी में मानव के संघर्षशील जीवन को दिखाया गया है। कहानी- लाइफ ऑफ पाई एक साधारण लड़के अब्दुल पाई पटेल की कहानी है जो कि अपने पिता संतोष पटेल के साथ पॉंडीचेरी में रहता है। पॉंडीचेरी में उसके पिता का एक जू है। एक दिन पाई के पिता अपने बिजनेस को और बढ़ाने के लिए शहर से बाहर जाने का फैसला करते हैं। वो लोग पानी के रास्ते से अपने जू के जानवरों को लेकर कनाडा की ओर जाते हैं। लेकिन रास्ते में एक समुद्री तूफान में फंसकर उनका जहाज पलट जाता है और एक लाइफ बोट में सिर्फ पाई और उसके जू के चार जानवर बचते हैं जिनमें बंगाली शेर पार्कर, जेब्रा, लकड़बग्गा और वनमानुष हैं। धीरे धीरे समय व्यतीत होता जाता है और शेर को छोड़कर तीनों जानवर भी मर जाते हैं। अंत में सिर्फ पाई और पार्कर शेर बचते हैं। इसी के साथ फ़िल्म कई समाज की जीवंत कहानियों का सीख देकर दृश्य शांति को प्राप्त हो जाता है। आज भी लाइफ ऑफ पाई जैसी अनेकों कहानियाँ देश में बरसात के समय में पानी के ओवर फ्लो के कारण नदी किनारे बांध टूट जाने के कारण पैदा होती हैं। इन्हीं जीवंत कहानियों को इरफान ने रुपहले पर्दे पर फिल्माया है।

आज के समय में जहां एक तरफ कश्मीर को एक भोगोलिक टुकड़े के तौर पर प्रचारित किया जाता है, कश्मीरी और कश्मीरियत की बात करना सरकारी गुनाह माना जाता है इसके अलावा कश्मीरियों को भारत और खुद कश्मीर के लिए अभिशाप समझा जाता हो। उसी दौरान 2014 में विशाल भारद्वाज के निर्देशन में क्राइम ड्रामा फ़िल्म की पटकथा को सिनेमा स्क्रीन पर लाया गया। इस फ़िल्म में करश्मीरी और कश्मीरियत के यथार्थ को बारीकी के साथ समझाने की कोशिश की गई। इस फ़िल्म की कहानी ‘हैदर’ नामी किरदार के इर्द गिर्द घूमता है। इसके पिता जो की डॉक्टर हैं, को पुलिस एक आतंकी के ऑपरेशन करने के कारण अरेस्टकर गायब कर देती है और हैदर एक पढ़ा लिखा आधुनिक क़िस्म का एक लड़का है, जो अपने अलीगढ़ मुस्लिम यूनिवर्सिटी से आकार अपने गुमशुदा बाप को यहाँ-वहाँ ढूँढने की की कोशिश करता है। इसी दौरान हैदर की मुलाक़ात रूहदार(इरफान खान) से होती है और रूहदार उसे उसके पिता की कहानी सुनता है। इस तरह  कश्मीरी के संघर्ष की पूरी कहानी पर्दे पर विचरण करने लगती है। फिल्म ‘हैदर’ में उनके द्वारा निभाए गए किरदार ‘रूहदार’ ने भी खूब वाहवाही बटोरी थी। उसी किरदार के एक बेहतरीन डायलॉग की कुछ बेहतरीन लाइनें, ‘मैं था… मैं हूं… और मैं ही रहूंगा…’ आज भी खूब याद की जाती हैं। दिल को छु जाने वाला ये डायलोग कश्मीर और कश्मीरियत को पहचान की तरफ एक मजबूत इशारा था। जिसे सिर्फ इरफान और उसके किरदार ने जी लिया। बाकी सरकार तो कलतक जगह-जगह डिटेन्शन केंपों में कश्मीरियों को डाला जाता था, आज तो पूरा कश्मीर ही डिटेन्शन कैंप है।

खैर इरफान जाते-जाते भारतवासियों के लिए बहुत कुछ देकर चले गये। ये अलग बात है हम उसके जीते जी उनके फिल्मों द्वरा उठाए गये मुद्दे समझ ही नहीं पाये या हमने समझकर नासमझी का मुजाहिरा किया है। हमने मुद्दों की समीक्षाएं तो बहुत की हैं लेकिन आज भी हिन्दी और इंगलिश मीडियम की मार जनता में मनभेद के साथ-साथ मतभेद भी पैदा कर रहा है। भारत अपने भविष्य के खोज में इधर-उधर आज भी आधुनिकता के मार्गों पर पैदल भटकता फिर रहा है। जबकि उससे बहुत दूर कहीं इंडिया का अनग्रेजी मीडियम अपने भविष्य के सितारे लूट-खसोट रहा है।

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