‘आग और अंधकार’ कविता

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‘आग और अंधकार’

एक दिन जब सुबह हुई, राजा अंधा हो गया
दिन चढ़ा, सूरज निकला, पर राजा की आंख अंधेरी
उसको कुछ भी नज़र ना आया
वैद्य, मंत्री, सेना, बनिया,
सबने ख़ुद को मूर्ख जताया
ना राजा को धूर्त बताया।

राजा ने आदेश दिया, आग जलाओ रात घनी है
और अंधकार में शत्रु छिपे हैं।
और फिर
राजा के मंत्री ने ग़रीब की बस्ती जला दी
बनिया ने किसान के खेतों में आग लगा दी
जंगल, नदी, पहाड़, पशु, सब अग्नि के नाम हुए।
इतनी अग्नि, इतना उजियारा
पर राजा को होश ना आया।

और आग,‌ और आग, राजा महल में चिल्लाया
फिर क्या था,
जज साहब ने क़ानून जलाया,
विद्वानों ने इतिहास जलाया,
एक मूर्ख ने मीनार जलायी,
दूसरे ने दुकान जलायी,
सास-ससुर ने बहू जलायी,
ग़रीब बाप ने सन्तान जलायी,

और सबसे अंत में
डरी हुई प्रेमिकाओं ने जला दिए सारे प्रेम पत्र।

– उसामा हमीद

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