एक फांसी – जॉर्ज ऑरवेल

‘एनिमल फ़ार्म’ और ‘नाइंटीन एटी फ़ोर’ जैसी कृतियों के प्रसिद्ध लेखक जॉर्ज ऑरवेल 1922 से 1927 के बीच ब्रिटिश पुलिस के अधिकारी के रूप में बर्मा में रहे थे। उन्हीं दिनों के अनुभवों पर लिखा उनका यह लेख ‘ए हैंगिंग’ पहली बार 1931 में एक ब्रिटिश पत्रिका ‘द एडेल्फ़ी’ में छपा था। हालांकि ऑरवेल ने कभी नहीं बताया कि यह अनुभव किस शख़्स की फांसी पर है। उनसे जब कभी पूछा गया तो उन्होंने इसे बस एक कहानी बताया।

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एक फांसी

जॉर्ज ऑरवेल

ये बर्मा में, बारिश से तरबतर, एक सुबह थी। टिन की पतली सी पन्नी जैसी कमज़ोर रोशनी, जेल की ऊंची दीवारों से होती हुई अहाते में पहुंच रही थी। हम काल कोठरियों के बाहर इंतज़ार कर रहे थे। ये सामने की तरफ़ से दोहरी सलाख़ों से घिरे शेड्स थे – छोटे जानवरों के पिंजरों जैसे। हर कोठरी क़रीब दस गुना दस फुट की थी और एक सोने के तख़्त और पानी के घड़े के अलावा पूरी तरह ख़ाली थी। कुछ में कुछ भूरे ख़ामोश लोग भीतरी सलाख़ों से लगकर, कंबल से लिपटे, उकड़ूं बैठे हुए थे। ये सज़ायाफ़्ता लोग थे जिन्हें दो-एक हफ़्तों में फांसी दी जानी थी।

एक क़ैदी को उसकी कोठरी से बाहर लाया गया। वह एक हिंदू था, एक कमज़ोर, दुबला-पतला सा शख़्स, जिसका सिर मुंडा हुआ था और आंखें धुंधली तरल थीं। उसकी बड़ी मोटी और फैली हुई मूंछें उसके जिस्म के हिसाब से बेतुके ढंग से काफ़ी बड़ी लग रही थीं, फिल्मों में किसी हास्य किरदार की मूंछों जैसी। छह लंबे-चौड़े भारतीय वार्डर उसकी सुरक्षा में लगे थे और उसे फांसी के तख़्ते के लिए तैयार कर रहे थे। उनमें से दो राइफ़लें और तनी हुई संगीनें लिए बग़ल में खड़े हो गए और बाक़ी ने उसे हथकड़ी लगाई। हथकड़ी में एक ज़ंजीर डाली और उसे अपनी बेल्ट से कस लिया, और उसकी बांहों को कस कर उसके बग़ल में बांध दिया। वे उससे बिल्कुल चिपक से गए और उनके हाथ हर वक़्त उस पर थे, एक सावधान, सहेजती हुई पकड़ के साथ, जैसे हर वक़्त यह पक्का करने के लिए महसूस कर रहे हों कि वह था। कुछ इस तरह जैसे लोग मछली को संभाल रहे हों जो ज़िंदा है और अब भी उछल कर पानी में जा सकती है। लेकिन वह शांत, निर्विरोध खड़ा था, अपनी बांहें रस्सियों पर बेजान ढंग से टिकाए हुए, जैसे जो कुछ हो रहा हो, उस पर क़तई उसका ध्यान न हो।

आठ बजे, और भीगी हवा में काफ़ी पतली एक तुरही की आवाज़ दूर के बैरकों से तिरती हुई आई। जेल सुपरिटेंडेंट ने, जो हम सबसे कुछ अलग होकर खड़ा था और चिड़चिड़े ढंग से अपनी स्टिक बजरी पर मार रहा था, आवाज़ के साथ ही सिर उठाया। वह एक फ़ौजी डॉक्टर था जिसकी धूसर मूंछें टूथब्रश जैसी थीं और आवाज़ खरखरी थी। ‘भगवान के लिए जल्दी करो फ़्रांसिस’, उसने चिड़चिड़ाते हुए कहा। ‘इस शख़्स को अब तक ख़त्म हो जाना चाहिए था। तुम अब तक तैयार नहीं हुए?’

सफ़ेद ड्रिल सूट और सुनहरा चश्मा पहने, मोटे मुख्य जेलर, फ़्रांसिस ने, जो द्रविड़ था, अपना काला हाथ लहराया। ‘यस्स सर, यस्स सर’, वह भड़भड़ाया, ‘सब कुछ संतोषजनक ढंग से तैयार है। जल्लाद इंतज़ार कर रहा है। हम बस शुरू करेंगे।‘

‘ठीक है, तो जल्दी करो।‘ क़ैदियों को तब तक नाश्ता नहीं मिल सकता, जब तक काम ख़त्म नहीं होता।‘ 

हम तख़्ते की तरफ़ चल पड़े। दो वार्डर, अपनी राइफ़लें झुकाए, क़ैदी के दोनों तरफ़ चल रहे थे – दो उससे बिल्कुल लग कर चल रहे थे – उसे बाज़ुओं और कंधों से इस तरह पकड़े हुए, जैसे उसे सहारा भी दे रहे हों, धकिया भी रहे हों। बाक़ी हम सब, मैजिस्ट्रेट और दूसरे, उसके पीछे चल रहे थे। अचानक, जब हम क़रीब 10 यार्ड चले ही थे, ये जुलूस बिना किसी हुक़्म या चेतावनी के अचानक रुक गया। एक डरावनी सी चीज़ हुई थी – भगवान जाने, कहां से एक कुत्ता अहाते में प्रगट हुआ। वो लगातार भौंकता हुआ, हमारी तरफ़ छलांग लगाता आया, और अपने पूरे जिस्म को लहाराता हुआ हमारे सामने उछलने लगा, जैसे इतने सारे इंसानों को साथ पाकर ख़ुशी से मतवाला हो उठा हो। ये एक बड़ा झबरा कुत्ता था, आधा एयरडेल, आधा सड़कछाप। कुछ लम्हे के लिए, ये हमारे पास उछलता रहा, और फिर, जब तक कोई उसे रोक पाता, उसने क़ैदी की तरफ छलांग लगा दी थी और कूद कर उसका चेहरा चाटने की कोशिश कर रहा था। हर कोई हतप्रभ खड़ा रहा, इस क़दर हैरान कि किसी ने कुत्ते को पकड़ने की भी कोशिश नहीं की।

‘किसने इस कमबख़्त जानवर को भीतर आने दिया?’, सुपरिटेंडेंट ने ग़ुस्से से पूछा। ‘कोई उसे पकड़ो।’

इस क़ाफ़िले से अलग खड़ा, एक वार्डर, कुछ बेतरतीबी में कुत्ते के पीछे भागा, लेकिन वह नाचता रहा और उसकी पहुंच के बाहर भागता रहा, जैसे सब-कुछ को खेल के हिस्से के तौर पर ले रहा हो। एक युवा यूरेशियन जेलर ने मुट्ठी भर बजरी उठाई और कुत्ते को मारकर भगाने की कोशिश की, लेकिन वह पत्थरों को चकमा देता हुआ फिर हमारे पीछे आ गया। उसका भौंकना जेल की दीवारों से टकरा कर गूंज रहा था। दो वार्डरों की पकड़ से बंधा क़ैदी इन सबको बिना किसी दिलचस्पी के देख रहा था, जैसे यह भी फांसी पर लटकाने से जुड़ी एक और औपचारिकता हो। कुछ मिनट बाद ही, कोई कुत्ते को पकड़ने में कामयाब हुआ। फिर हमने अपना रुमाल उसके कॉलर में बांधा और फिर चल पड़े। कुत्ता अब भी घिसट और किकिया रहा था।

तख़्ते से हम 40 यार्ड की दूरी पर थे। मुझे अपने सामने से गुज़रते क़ैदी की नंगी भूरी पीठ दिखाई पड़ी। वह अपने  बंधे हुए बाज़ुओं के साथ, कुछ कठिनाई से चल रहा था, मगर बिल्कुल स्थिर, उस भारतीय की डोलती हुई चाल से, जो कभी घुटने सीधे नहीं करता। हर क़दम पर उसकी मांस-पेशियां क़ायदे से उठ-बैठ रही थीं, सिर पर उसके बालों की लट ऊपर-नीचे नाच रही थी, गीली बजरी पर उसके क़दमों के निशान बन रहे थे। और अचानक, दो लोगों के दोनों बाज़ू पकड़े होने के बावजूद, उसने, रास्ते में पड़े एक पत्थर से बचने के लिए, कुछ तिरछे होकर क़दम रखे।

यह दिलचस्प है, लेकिन इस लम्हे तक, मैंने क़तई महसूस नहीं किया था कि एक स्वस्थ, सचेत इंसान को ख़त्म करने का क्या मतलब होता है। जब मैंने क़ैदी को एक पत्थर से बचने के लिए क़दम मोड़ते देखा, तब मैंने वह रहस्य देखा, एक जीवन को बीच में काट डालने का वह अकथनीय कुकृत्य, जब वह पूरे ज्वार पर हो। वह शख़्स मर नहीं रहा था, वह ज़िंदा था जैसे हम सब ज़िंदा थे। उसके जिस्म के सारे अंग काम कर रहे थे, आंतें खाना पचा रही थीं, त्वचा ख़ुद को नई कर रही थी, नाख़ून उग रहे थे, ऊतक बन रहे थे – सब एक संजीदा नादानी में अपने काम में लगे हुए थे। उसके नाख़ून तब भी बढ़ रहे होंगे, जब वह तख़्ते पर खड़ा होगा, जब वह हवा के बीच झूल रहा होगा, बस एक सेकेंड के दसवें हिस्से तक जीने के लिए। उसकी आंखें पीली बजरी और धूसर दीवारें देख रही थीं और उसका दिमाग़ अब भी याद कर रहा था, अनुमान लगा रहा था, तर्क कर रहा था – पत्थरों को लेकर भी तर्क कर रहा था। वह और हम साथ चल रहे इंसानों का एक जत्था थे, एक ही दुनिया को देखते हुए, सुनते हुए, महसूस करते हुए, और दो मिनट में, एक अनायास झटके से, हम में से एक चला जाएगा – एक मस्तिष्क कम हो जाएगा, एक दुनिया कम हो जाएगी।

फांसी का तख़्ता एक छोटे से गलियारे में बना था – जेलख़ाने के मुख्य अहाते से अलग – और लंबी, कंटीली घास से पटा पड़ा था। तीन तरफ़ से ईंटें लगाकर एक शेड जैसा बनाया गया था जिस पर पटरा लगा हुआ था, और उसके ऊपर दो शहतीरें थीं जिनके बीच एक बल्ली पड़ी थी और उससे रस्सी झूल रही थी। जल्लाद एक धूसर बालों वाला मुजरिम ही था जिसने जेल की सफ़ेद पोशाक पहन रखी थी, और अपने तख़्ते के पास इंतज़ार कर रहा था। हमारे पहुंचते ही, उसने ग़ुलामों की तरह झुककर हमारा अभिवादन किया। फ़्रांसिस के एक इशारे पर, दो वार्डरों ने क़ैदी को और कसकर पकड़ा और उसे कुछ धकियाते हुए, कुछ बढ़ाते हुए फांसी के तख़्ते के पास ले गए और उसे खींच खांच कर सीढ़ी पर चढ़ाने लगे। इसके बाद जल्लाद चढ़ा और उसने क़ैदी के गले में रस्सी डाल दी।

हम पांच यार्ड दूर, खड़े इंतज़ार कर रहे थे। वार्डरों ने फांसी के चारों तरफ़ एक घेरे जैसा बना रखा था। और तभी, जैसे ही, फंदा कसा, क़ैदी ने अपने ईश्वर को पुकारना शुरू किया। यह राम, राम, राम! की ऊंची और निरंतर पुकार थी – न किसी प्रार्थना की तरह आतुर या घबराई हुई और न ही किसी मदद की पुकार जैसी, लेकिन स्थिर, लयात्मक, जैसे कोई घंटी बज रही हो। कुत्ता अपनी किकियाहट के साथ इसे जैसे प्रत्युत्तर दे रहा था। फांसी के तख़्ते के पास ही खड़े जल्लाद ने आटे की बोरी की तरह की एक छोटी-सी कपड़े की बोरी निकाली और उससे क़ैदी का चेहरा ढक दिया। लेकिन कपड़े में दबी हुई आवाज़ अब भी क़ायम थी – ‘राम! राम! राम! राम!’

जल्लाद नीचे उतर आया था, और लिवर थामे, तैयार था। लगा कि कई मिनट गुज़र गए हैं। क़ैदी के गले से निकलती स्थिर और दबी हुई आवाज़ ‘राम! राम! राम! राम!’ एक पल के लिए भी नहीं लड़खड़ाई थी। अपना सिर बिल्कुल छाती तक झुकाए, सुपरिटेंडेंट, अपनी स्टिक से धीरे-धीरे ज़मीन को ठकठका रहा था। शायद वह पुकारों को गिन रहा था, शायद क़ैदी को एक नियत संख्या तक पुकारने की इजाज़त देते हुए – पचास, या शायद सौ तक। हर किसी का रंग बदल चुका था। भारतीय ख़राब कॉफ़ी की तरह धूसर पड़ गए थे, और एक-दो संगीनें कांप रही थीं। हम तख़्ते पर लटके, सिर ढंके आदमी को देख रहे थे और उसकी पुकारों को सुन रहे थे, हर पुकार ज़िंदगी का एक और लम्हा थी; हम सबके दिमाग़ में एक ही ख़याल था – ओह, इसे जल्दी मारो, ख़त्म करो, यह अरुचिकर आवाज़ रोको!

अचानक सुपरिटेंडेंट ने फ़ैसला कर लिया। अपना सिर उठाते हुए, उसने अपनी स्टिक चुस्ती से हिलाई। ‘चलो!’, वह लगभग उग्रता के साथ चिल्लाया।

एक झनझनाती हुई आवाज़ हुई, और फिर मुर्दा चुप्पी। कैदी ग़ायब हो गया था, और रस्सी अपने आप में झूल रही थी। मैंने कुत्ते को छोड़ दिया, और वह फ़ौरन छलांग लगाता हुआ, तख़्ते के पीछे पहुंच गया; लेकिन वहां पहुंच कर वह कुछ पहले रुक गया, भूंकने लगा और फिर गलियारे के एक कोने में दौड़ता चला गया, जहां घास के बीच खड़ा होकर हमें, भयभीत देखने लगा। हम फांसी के तख़्ते के पास पहुंच कर शव का निरीक्षण करने लगे। उसके अंगूठे बिल्कुल नीचे की तरफ़ थे और वह झूल रहा था, बिल्कुल धीरे-धीरे घूमते हुए, किसी पत्थर की तरह मृत।

सुपरिटेंडेंट ने अपनी स्टिक उठाई और उसके ख़ाली जिस्म को कोंच कर देखा; वह कुछ डोलने लगा। ‘वह बिल्कुल दुरुस्त है,’ सुपरिटेंडेंट ने कहा। फांसी के तख़्ते से पीछे हटते हुए, उसने गहरी सांस ली। बिल्कुल अचानक, उसके चेहरे से चिड़चिड़ाहट ग़ायब हो गई थी। उसने अपनी कलाई घड़ी पर नज़र डाली। ‘आठ बजकर आठ मिनट। चलो! आज की सुबह के लिए इतना ही। भगवान का शुक्र है।’

वार्डरों ने संगीन हटाई और चलने लगे। अपने साथ हुई बदसुलूकी के प्रति सजग और मायूस पड़ा कुत्ता उनके पीछे खिसक लिया। हम फांसी वाले गलियारे के बाहर निकले, अपने वक़्त का इंतज़ार कर रहे क़ैदियों वाली काल कोठरियों को पार करते हुए, जेल के बड़े और केंद्रीय अहाते में चले आए। लाठियों से लैस अपने वार्डरों के आदेश पर मुजरिम अपना नाश्ता ले रहे थे। वे एक लंबी क़तार में बैठे हुए थे, हर आदमी के हाथ में टिन का एक भगौना था, जबकि बाल्टी लिए दो वार्डर एक-एक कर सबके भगौने में चावल डालते हुए आगे बढ़ रहे थे। फांसी के बाद यह सब कुछ बड़ा ख़ुशनुमा और सहज दृश्य लग रहा था। काम ख़त्म हो जाने के बाद की एक बड़ी सी राहत हम सबमें चली आई थी। गाने का, ही ही करने का, दौड़ पड़ने का मन कर रहा था। अचानक हम सब आपस में ख़ुशी-ख़ुशी बतियाने लगे थे।

हम जिस तरह आए थे, उसे देखकर हमारे साथ चल रहे यूरेशियाई लड़के ने जानी हुई मुस्कुराहट के साथ सिर हिलाया – ‘आपको पता है सर, हमारा दोस्त, (उसकी मुराद मृत शख़्स से थी), जब उसे पता चला कि उसकी अर्ज़ी ख़ारिज हो गई है, तो उसने कोठरी के फ़र्श पर पेशाब कर दिया। डर के मारे। एक सिगरेट तो लीजिए सर! मेरी ये चांदी की डिबिया आपको पसंद नहीं आई? बक्से वाले से लिया है, पूरे अढाई रूपये में। शानदार यूरोपियन स्टाइल का है।’

कई लोग हंसने लगे – किस बात पर, किसी को पता नहीं था।

फ़्रांसिस सुपरिटेंडेंट के साथ बक-बक करता हुआ चल रहा था। ‘तो सर, सब्ब पूरे संतोष के साथ निबट गया। सब्ब ख़त्तम – खटाक। बस इसी तरह। लेकिन हर दफ़ा ऐसा नहीं होता है – अरे नहीं! मैंने ऐसे-ऐसे मामले देखे हैं, जब डॉक्टर को तख़्ते के नीचे जाकर क़ैदी के पांव खींचने पड़े हैं ताकि मौत पक्की हो। एकदम वाहियात!’

‘ऐंठते हुए, नहीं? वो बुरा होता है।’, सुपरिटेडेंट ने कहा।

“अरे सर, सब्बसे बुरा तो तब होता है जब वे बेक़ाबू हो जाते हैं। एक आदमी, मुझे याद है, जब हम उसे लेने पहुंचे तो वो अपनी बाड़ों की सलाख़ों से चिपक गया। आप भरोसा नहीं करेंगे सर, कि उसको हटाने में छह वार्डर लगे, तीन-तीन लोग उसकी एक-एक टांग खींच रहे थे। हमने उसे समझाया। ‘मेरे यार’, हमने कहा, ‘सोचो, तुम हमारे लिए कितनी तकलीफ़ और परेशानी पैदा कर रहे हो!’ लेकिन नहीं, वह सुन ही नहीं रहा था। अरे, वो इतना बदमाश था।”

मैंने पाया कि मैं बहुत ज़ोर से हंस रहा था। हर कोई हंस रहा था। यहां तक कि सुपरिटेंडेंट भी कुछ संयम के साथ हंस रहा था। ‘चलो, चलो, तुम सब आओ और हम एक ड्रिंक लें’, उसने बड़े मिलनसार अंदाज़ में कहा। ‘मेरी कार में व्हिस्की की एक बोतल है। इससे हम काम चला सकते हैं।’

हम जेल के बड़े फाटक से निकल कर, सड़क पर आ गए। ‘उसकी टांग खींच रहे थे!’ अचानक एक बर्मी मजिस्ट्रेट ज़ोर से बोला और ठहाका लगाकर हंसने लगा। हम सब फिर से हंसने लगे। उस वक़्त फ़्रांसिस का क़िस्सा बहुत ज़्यादा दिलचस्प लग रहा था। हम सबने एक साथ ड्रिंक ली – यूरोपीयन भी, देसी भी – बिल्कुल दोस्ताना ढंग से। मरा हुआ आदमी सौ यार्ड दूर था।

हिंदी अनुवाद: प्रियदर्शन

‘जनसत्ता’ में प्रकाशित

1 COMMENT

  1. बहुत अच्छा लगा पढ़ कर! उम्दा लेख, उम्दा लेखक, और बहुत ध्यान से तर्जुमा-निगार ने तर्जुमा किया है।

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