आरक्षण की असल अवधारणा और आर्थिक पिछड़ों का 10% आरक्षण : एक समीक्षा

‌हमारे यहां हिंदुस्तान में जब भी Reservation का लफ़्ज़ बोला जाता है तो इसमें अक्सर लोग confusion का शिकार रहते हैं. हमारे यहां jobs के बारे में या poverty के बारे में जब भी चर्चा होती है तो एक बात यह कही जाती है कि Reservation हमारे jobs को खा रहा है.

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‌आरक्षण की जो सुविधा भारत में दी गई है उसको संवैधानिक भाषा में कहा जाता है Affirmative Action, और यह Affirmative Action उनलोगों को दिया जाता है जो historically backward हो और उनके साथ ऐतिहासिक तौर पर भेदभाव किया गया हो, तो इस तरह से एक group of people  ख़ासतौर से उसमें जो जाति हैं, ज़ात- बिरादरी की बुनियाद पर किसी एक ख़ास जात के साथ अगर भेदभाव हुआ है तो उनके लिए संविधान में Reservation की सुविधा दी गई है. लेकिन संविधान लिखे जाने से पहले भी इस तरह के provisions मुख्तलिफ ज़मानों में रहे हैं और सिर्फ हिंदुस्तान में ही नहीं बल्कि हिंदुस्तान के बाहर भी कई मुल्कों में social backward ग्रुप्स के लिए इस तरह के provisions रखे गए हैं.  ख़ास तौर से उन social backward ग्रुप्स के लिए जिसमें ऐतिहासिक तौर पर किसी के साथ भेदभाव हुआ हो. यह Reservation की सुविधा jobs में, education में और ख़ासतौर से political representation में दी गई है.

‌हमारे यहां हिंदुस्तान में जब भी Reservation का लफ़्ज़ बोला जाता है तो इसमें अक्सर लोग confusion का शिकार रहते हैं. हमारे यहां jobs के बारे में या poverty के बारे में जब भी चर्चा होती है तो एक बात यह कही जाती है कि Reservation हमारे jobs को खा रहा है. लेकिन अगर हम बहुत ही मोटे-मोटे अल्फ़ाज़ में समझना चाहें तो हम देखेंगे कि हिंदुस्तान में 96% informal jobs  हैं. बाकि बचते हैं 4% formal jobs, उन 4% में भी सिर्फ 2% government उपलब्ध कराती है और 2% private sectors में होते हैं. हिंदुस्तान में जो Reservation का क़ानून है उसमें ख़ास बात यह है कि private sectors में कोई आरक्षण नहीं है, मीडिया में कोई आरक्षण नहीं है,  judicial services में कोई Reservation नहीं है, तो इस तरह से देखा जाए तो Reservation का जो असर पड़ता है government jobs पर वह महज़ 1% असर पड़ता है. यह बात कहना कोई बहुत ज़्यादा तर्क अपने अंदर नहीं रखती है कि हिंदुस्तान की गरीबी या पिछड़ेपन की जो असल वजह है वह Reservation है. Reservation एक बहुत ही Noble चीज़ है ख़ास तौर से उन तबक़ात के लिए होती है जिनके साथ ऐतिहासिक तौर पर नाइंसाफी हुई हो, उनको uplift करने के लिए, उनको समाज में बराबरी का हिस्सा दिलाने के लिए यह Reservation की policy एख्तियार की जाती है. तो फिर ग़रीबी क्यों यह एक सवाल पैदा हुआ, ग़रीबी के तो बहुत सारे causes हो सकते हैं और इसका सबसे बड़ा कारण यह है कि हमारी government की policy क्योंकि पूंजीवादी व्यवस्था (capitalism) का जो पूरा जाल बिछा है, समाज में और हिंदुस्तान में जो इसके असरात पड़ते हैं उससे ग़रीबी बढ़ती है और भी इससे government की नीयत, corruption उन सब का असर हमारे देश की economy पर पड़ता है और ग़रीबी के percentage में हमेशा इज़ाफ़ा होता रहता है. ग़रीबी दूर करने के लिए जब भी बात की जाती है तो उसके लिए कई पौलिसियाँ अपनाईं जाती हैं. दूसरा यह कि ‘ग़रीब’ जब बार-बार बोलते हैं तो ऐसा नहीं है कि ग़रीबी का ताल्लुक़ किसी ख़ास cast किसी ख़ास group से हो. असमानता का ताल्लुक़ cast से हो सकता है लेकिन ग़रीबी का ताल्लुक़ कभी भी किसी ख़ास group से नहीं रहता है, और जब ग़रीबी को दूर करने के लिए  policy बनती है तो उसका जो निफ़ाज़ होता है वह तमाम तबक़ात पर होता है,उससे कोई अछूता नहीं रहता है, तो जब यह बात की जाती है कि ग़रीबी है तो इसका मतलब पहली बात तो यह है कि वह किसी ख़ास group का नहीं है. दूसरा यह है कि सरकार की नीयत ही उसमें दरअसल बहुत ज़्यादा मददगार होती है.  सरकार मनरेगा चालू करती है. मनरेगा में budget कम करती है या इस तरह से दूसरी पालिसी होती है उनको कम करती है, इसलिए यह कहना कि economically backward जो लोग हैं उनके लिए Reservation लाइए, यह दरअसल Reservation का जो constitution provision है उसी के ख़िलाफ़ है. अब इसमें जो यह बिल पास किया गया है कि ग़रीबी को दूर करने के लिए जो ग़रीब लोग हैं उनको Reservation दिया जाए, 10% कोटा दिया जाए, तो उसकी जो बुनियादी बात है वह दरअसल बहुत ज़्यादा भ्रमित करने वाली है. आप देखेंगे कि खुद तेंदुलकर कमेटी ने जब ग़रीबी को मापने का पैमाना बनाया तो उन्होंने कहा कि 27रू जो daily गाँव में कमाता है और 31रू शहर में कमाता है तो उसको ग़रीब माना जाएगा. लेकिन इस वाले बिल में 8 लाख का criteria माना गया है. 8 लाख yearly income का मतलब यह है कि अगर इसको हर दिन पर निकाला जाए तो वह 2222रू per day income होगी तो इसका मतलब क्या है कि ग़रीबी रेखा जो सरकार की ख़ुद की कमेटी के आँकड़े हैं उनसे अगर शहर का निकाला जाए तो 71 गुना और गाँव का निकाला जाए तो 82 गुना ज़्यादा है. तो एक तरफ तो आप ग़रीबी का पैमाना ‘यह’ मान रहे हों और दूसरी तरफ Reservation के लिए जब ग़रीबी का पैमाना आया तो ‘इस’ तरह से आ रहा है. इसमें जो problem है वह यह कि हमारी जो 92% आबादी है एक अनुमान के मुताबिक़ वह 8 लाख से नीचे है तो इसका मतलब यह है कि यह एक ख़ास क़िस्म के privileged लोगों को Reservation देने की बात कही जा रही है. दूसरा, इसका constitutional पहलू जब हम बात करें तो पहली बात तो ऐसा नहीं है कि यह मोदी सरकार की पहली बात है, इससे पहले भी 1992 में खुद नरसिम्हा राव सरकार में यह फैसला लिया गया था और इसके बाद Supreme Court ने इंदिरा साहनी वाले केस में उसे Null and Void कर दिया उसमें आप देख सकते हैं कि कोर्ट ने कहा था कि कभी भी Reservation जो हो सकता है वह आर्थिक आधार पर नहीं हो सकता है. इसका एक ही आधार हो सकता है वह यह कि ऐतिहासिक तौर पर कोई group of people discriminated हो और उसके causes और consequences यानी लगातार उस भेदभाव के असरात उस समाज पर पड़ते हों. तीसरा अहम संवेधानिक नुक्ता इस सिलसिले में बयान किया था वह यह कि 50% वाली बात यानी Reservation का ताल्लुक़ 50% से है, अब अगर 10% और मज़ीद इसमें add करना चाहें तो इसका मतलब यह होगा कि वह जो 50% से ज़्यादा होगी तो उसको कहा जाता है कि यह reverse discrimination है, इस लिए बीच की राह 50% है. और इसमें भी 1992 का जो जजमेंट है उसमें यह बात कही गई है कि 50% से ज़्यादा आप किसी को नहीं दे सकते तो इस तरह से यह जो बिल लाया गया है. वह खुद constitution की आत्मा के, social justice की आत्मा के, भारतीय संविधान का right to equality का जो आइडिया है, उसके सरासर खिलाफ है.

 

लेखक : मुसद्दिक मुबीन पूर्व संपादक, छात्र विमर्श
Transcript : Samar Firdaus, Jharkhand

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