पुस्तक समीक्षा : द फ्री वॉइस

आज हमारे सामने सबसे बड़ा चिंता का विषय जनता को यह याद दिलाना है कि देश की असली शक्ति जनता में है न कि सरकार के पास. जनता सरकार की गुलाम नहीं है, बल्कि सरकार देश की जनता के प्रति उत्तरदायी है. सरकारें दैवीय नहीं होती, जनता का यह अधिकार है कि सरकार से सवाल करे.

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किताब को कम से कम दो बार पढ़ा जाना चाहिए. इसके दो कारण हैं, पहला ये कि भारत मे महँगाई और पकौड़ा रोज़गार के इस दौर में आम जनता के लिए किताब महंगी है. इसलिए पैसा वसूली के लिए दो बार पढ़िए.

दूसरे, किताब है बहुत महत्वपूर्ण. हालांकि इसमे ऐसा कुछ नया नहीं लिखा गया है जो कि किसी को मालूम ना हो. इसमें जो लिखा है वह हर एक जागरूक व्यक्ति ने महसूस किया है और हर एक निडर बोलने वाला कही ना कही, कभी ना कभी बोलता रहा है. लेकिन उसका लिखा जाना ही अहम है. अब यह बातें एक प्रमाण बन चुकी हैं, अब ये ऐसा तथ्य बन चुकी हैं जिन्हे नकारा नहीं जा सकता. आज जो कुछ देश के हालात हैं ये अगर बरक़रार रहे और हमारा देश नाज़ी जर्मनी बनने की राह पर चलता रहा, तो जब कभी भविष्य मे यह नाज़ी राज खत्म होगा और लोग अचानक सपने से निकल कर होश में आएंगे और यह सोचना शुरू करेंगे कि गलती कहा हुई थी, क्या था जो रोका नहीं गया, तब यह किताब आज के इतिहास की तरह पढ़ी जाएगी. और, प्राकृतिक है कि लोग इस विषय पर पी एच डी करेंगे.

पुस्तक मूलतः नौ निबंधों का संग्रह है जो वर्तमान सरकार आने के बाद अलग अलग समय पर लिखे जाते रहे हैं. इनमें से अधिकतर लेखों मे प्रसंग की समानता होने के बावजूद कुछ एक लेख थोड़ा हट कर भी हैं जिनकी आवश्यकता पुस्तक मे महसूस नहीं होती. इन नौ लेखो मे पुस्तक का पहला अध्याय ‘Speaking Out’ पुस्तक का परिचय भी है और विषय वस्तु के हिसाब से काफी महत्वपूर्ण भी.

जस्टिस लोया की मृत्यु के समय जो भय और चुप्पी अखबारों और न्यूज़ चँनलो पर दिखी, वह भारत की आम जनता से लेकर इंसाफ की लड़ाई लड़ने वालो तक की नसों में बर्फ बनने के लिए काफी थी. पुस्तक में शुरू से अंत तक इस भय की परिकल्पना बनी रहती है. देश में हो रही घटनाओ और उन घटनाओ के आगे- पीछे के हालात को देखिये तो ये अंदाज़ा करना मुश्किल नहीं कि देश लोकतंत्र के बजाये भयतंत्र बनता जा रहा है.

यह भय किसी बाहरी शत्रु का नहीं है, यह भय अपने ही देश की सरकार का है, अपने ही आस पड़ोस में रहने वाले देशबंधुओं का है. आज हमारे शहर-गली-मुहल्लों में किसी भी कोने पर एक हिंसक भीड़ किसी को निशाना बना सकती है, कोई भी बाइक सवार किसी गौरी लंकेश को उसके घर के बाहर गोलियों से छलनी कर सकता है. किसी के घर में घुस कर फ्रिज की तलाशी ली जा सकती है, किसी को भी देशद्रोही कह कर जेल भेजा जा सकता है. गाय के नाम पर आम जन की भीड़ बिना डरे हत्याएं कर सकती है. हमारा लोकतंत्र भीड़तंत्र बनने के कगार पर आ चुका है.

इस डर की मानसिकता को फैलाया कैसे गया, आई टी सेल और सोशल मीडिया का दुरूपयोग कर देश के माहौल को बिगाड़ने, ऐतिहासिक तथ्यों से छेड़-चाड करने, सही को गलत और गलत को सही करने में जो भूमिका रही, इसका एक विस्तृत परिचय पुस्तक में मौजूद है. लेखक का विचार यह भी है की यह सिर्फ आई टी सेल तक सीमित नहीं है बल्कि आम जनता की एक बड़ी आबादी इस मानसिकता से ग्रसित है जहां सत्य से महत्वपूर्ण अपने लोगो (धर्म, समूह, पार्टी ) को सही साबित करना होता है.

फेक न्यूज़ किसे कहते हैं, क्यों फैलाई जाती है, कैसे बनायीं जाती है, जनमानस की मानसिकता को फेक न्यूज़ कैसे बदलती है, और हमें किस तरह फेक न्यूज़ के माध्यम से एक रोबोटिक जनरेशन में बदला जा रहा है, ‘The Robo-Republic And Building Of New Democracy’ अध्याय में विश्लेषित है.  आम जन की एक बड़ा भाग इन झूठी खबरों और अफवाहों पर आँख बंद करके विश्वास करने लगी है. स्थिति यह है कि सच्ची खबरों को झूठी और फेक खबर को सच्चा सिद्ध करने की पूरी कोशिश जारी है. कमाल यह है कि जनता इन झूठी ख़बरों पर विश्वास भी करती है.

आज हमारे सामने सबसे बड़ा चिंता का विषय जनता को यह याद दिलाना है कि देश की असली शक्ति जनता में है न कि सरकार के पास. जनता सरकार की गुलाम नहीं है, बल्कि सरकार देश की जनता के प्रति उत्तरदायी है. सरकारें दैवीय नहीं होती, जनता का यह अधिकार है कि सरकार से सवाल करे. और यह सिर्फ अधिकार नहीं अपितु एक लोकतंत्र में जनता का कर्तव्य है. ‘Being The People’ में लोकतंत्र में जनमानस के अधिकारों और ज़िम्मेदारियों की चर्चा की गई है.

रवीश कुमार ने इस पुस्तक के माध्यम से, आम जन में आ रही इन तब्दीलियों को बहुत ही गहराई से उकेरा है, भीड़ की मानसिकता, भय की राजनीति, अंध-भक्ति, और सरकार को पूज्यनीय मानने वाली प्रवृत्ति का गहरा और सटीक अध्ययन इस पुस्तक में उपलब्ध है. यह किसी ऐसे व्यक्ति के लिए ही संभव था जिसकी पैनी नज़र देश में हो रही गतिविधियों पर बराबर बनी रहती हो, जो आम जन के बीच रहता हो और लोकतंत्र के ढांचे में भागीदार भी हो, इन सबके साथ वह साहसी हो, जिसे यह पता हो कि डर से बचने का सिर्फ एक ही रास्ता होता है; उस डर से लड़ जाना. और रवीश कुमार ने अपनी इस पुस्तक के माध्यम से यह कर दिखाया.

यह पुस्तक हिंदी से अनूदित है. आश्चर्य की बात है कि तीन लोगो ने मिलकर अनुवाद किया है फिर भी ना सिर्फ अनुवाद संतोषप्रद नहीं है, बल्कि कई जगह भाषा की त्रुटिया भी हैं. शायद देश की वर्तमान अवस्था के मद्देनज़र जल्दबाज़ी से काम लिया गया है.

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