मायावती, बसपा और आगामी लोकसभा चुनाव

चार बार यूपी की सत्ता संभालने वाली मायावती पिछले विधानसभा चुनाव में एक लंबी राजनीतिक पारी खेलने के बावजूद जुझारू खिलाड़ी की तरह बाज़ी पलटने में माहिर नहीं बन सकीं और न ही अपने परंपरागत वोट बैंक को बचा पाई।

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आगामी लेाकसभा चुनाव की तैयारियां राजनीतिक पार्टियों ने शुरु कर दी है और इसका शंखनाद गठबंधन से हो चुका है। उत्तर प्रदेश में सपा बसपा का मिलन आगामी चुनाव पर क्या प्रभाव डालेगा यह समय बतायेगा परन्तु इस गठबंधन से हलचल ज़रुर शुरु हो गई है । गठबंधन की घोषणा शुरु होते ही अखिलेश की मुश्किलें भी बढ़ने लगी है। अब देखना यह है की यह सपा-बसपा अपना गठबंधन धर्म कैसे निभाते है? अभी 38-38 सीटों पर चुनाव लड़ने की सहमति के साथ इनका भविष्य क्या होने वाला यह तो समय बताएगा लेकिन इस बुआ-भतीजे के मिलन ने एक बार फिर यह सच कर दिया कि राजनीति में सबकुछ चल सकता है और उत्तर प्रदेश की राजनीति में कोई महिला प्रेरणा स्त्रोत नहीं बन सकती।
इस गठबंधन ने भले ही भाजपा का समीकरण बिगाड़कर उसकी नींद उड़ा दी हो और उस पर अखिलेश के साथ मायावती चाहे जितनी खुशियां मना लें लेकिन राजनीति में महिला हिस्सेदारी पर एक प्रश्नचिन्ह अवश्य लग गया है। यूं तो उत्तर प्रदेश की राजनीति में महिलाओं की वैसे भी कोई सशक्त छवि या प्रबल दावेदारी नहीं दिखती है। एक मायावती ही थीं जिन्हें राजनीति में मज़बूत महिला भागीदारी का प्रतीक माना जाता था।

एक समय था जब उन्होंने निचले स्तर से ऊपर उठकर केवल प्रदेश ही नहीं केंद्र की सत्ता को भी एहसास दिला दिया था कि वह सत्ता संभालने की एक प्रमुख दावेदार हैं और यूपी में सख़्त प्रशासन व्यवस्था को लागू कर उन्होंने यह साबित भी कर दिया था लेकिन जिस प्रकार कल हुई प्रेस कांफेस में मायावती ने कहा कि वह प्रदेश की जनता के लिए गेस्टहाउस कांड भुला कर एक हो रही हैं। उससे उनकी राजनीतिक बेचारगी साफ झलकती है।
क्या वास्तव में वह एक महिला के रुप में उस कांड को भुला पायी होंगी? यदि वह सच में भूल चुकी हैं तो यह भी कोई दाद देने की बात नहीं हो सकती क्योंकि एक औरत जब अपनी इज़्ज़त पर बन गयी बात को भुला दे तो वह कोई साहस नहीं हो सकता हां राजनीतिक स्वार्थ के दृष्टिकोण से इसे साहस कह सकते हैं और यह राजनीति में कदम रखने वाली महिला को प्रभावित करने वाली बात तो नहीं हो सकती।

चार बार यूपी की सत्ता संभालने वाली मायावती पिछले विधानसभा चुनाव में एक लंबी राजनीतिक पारी खेलने के बावजूद जुझारू खिलाड़ी की तरह बाज़ी पलटने में माहिर नहीं बन सकीं और न ही अपने परंपरागत वोट बैंक को बचा पाई। बल्कि अविकसित बुद्धि का सबूत देते हुए सबसे ज़्यादा मुस्लिम प्रत्याशी को चुनाव में उतार अपनी प्रतिद्वन्दी पार्टी का फ़ायदा करा दिया। अब अपनी डूबती लुटिया को बचाने के लिए और बसपा को इतिहास बनने से रोकने के लिए सपा के साथ गठबंधन कर के ये साबित कर दिया कि वह महिलाओं के लिए न कभी प्रेरणा बन सकीं और न ही बन सकेंगी।

लेखिका : सहीफ़ा खान

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