NEET विवाद पर न्याय की मांग करते हुए एसआईओ ने सुप्रीम कोर्ट का रुख़...

NEET विवाद को लेकर एसआईओ ने सुप्रीम कोर्ट में एक जनहित याचिका दायर की है, जिसमें नीट की काउंसलिंग को रोकने और राष्ट्रीय परीक्षण एजेंसी (NTA) द्वारा आयोजित पूरी प्रक्रिया की एसआईटी जांच कराने की मांग की गई है।

फ़िलिस्तीन एक राष्ट्र के रूप में कैसे वजूद में आया?

फ़िलिस्तीन कोई ख़ाली पड़ी ज़मीन नहीं थी। यह एक समृद्ध और उपजाऊ पूर्वी भूमध्य सागरीय दुनिया का हिस्सा था जो उन्नीसवीं सदी में आधुनिकीकरण और राष्ट्रीयकरण की प्रक्रियाओं से गुज़र रहा था, जो एक आधुनिक समाज के रूप में बीसवीं सदी में प्रवेश करने की कगार पर था। ज़ायोनी आंदोलन द्वारा इसके उपनिवेशीकरण ने इस प्रक्रिया को वहां रहने वाले अधिकांश मूल लोगों के लिए एक आपदा में बदलकर रख दिया।

विश्व पर्यावरण दिवस: सभी को उठानी होगी पर्यावरण बचाने की ज़िम्मेदारी

बढ़ते औद्योगिकीकरण और आधुनिकता की चकाचौंध ने हमारी जीवन-शैली को काफ़ी बदल दिया है। मानव जीवन में हो रहे निरंतर बदलावों ने पर्यावरण को भी प्रभावित किया है। मानव जीवन हेतु आवश्यकताओं की पूर्ति के लिए प्राकृतिक संसाधनों का लगातार दोहन किया गया है, इसीलिए आज पूरी दुनिया के सामने पर्यावरण संकट पैदा हो गया है।

एग्ज़िट पोल्स: सिर्फ़ धंधा है या कुछ और इरादे भी हैं?

सही या ग़लत जो हो, नागरिकों का एक बड़ा हिस्सा यह मान रहा है कि इस बार बड़े पैमाने पर परिणामों में धांधली की जा सकती है। इस धांधली की पूर्वतैयारी के लिए एग्ज़िट पोल्स के जरिये वातावरण बनाया जा रहा है ताकि दीवार पर मोटे-मोटे हुरूफ़ में लिखी जनभावनाओं की इबारत से उलट फ़ैसला आने पर उसे ‘एग्ज़िट पोल्स ने भी तो यही कहा था’ कहकर गले उतारा जा सके।

क्या फ़िलिस्तीन एक ख़ाली ज़मीन थी? जानिए इज़राइल का बड़ा झूठ

सातवीं शताब्दी के मध्य से, फ़िलिस्तीन का इतिहास अरब और मुस्लिम दुनिया के साथ गहराई से जुड़ चुका था (मध्य कालीन युग में एक छोटे अंतराल के अपवाद के साथ, जब इस पर क्रुसेडर्स ने क़ब्ज़ा कर लिया था)। इस देश के उत्तर, पूर्व और दक्षिण के विभिन्न मुस्लिम साम्राज्य तथा राजवंश इस पर नियंत्रण करने की आकांक्षा रखते थे, क्योंकि यह मक्का और मदीना के बाद इस्लाम धर्म का दूसरा सबसे पवित्र स्थल था।

करण थापर-प्रशांत किशोर इंटरव्यू से मुसलमान क्या सीख सकते हैं?

यह देखिये कि अगर हिन्दू समाज ने प्रशांत किशोर पांडेय जैसा शख़्स पैदा किया तो उसी समाज ने करण थापर भी तो पैदा किया है। मुस्लिम समाज में क्या है? ये देखना है तो दिल्ली और अलीगढ़ के मुस्लिम विश्वविद्यालयों में देखिये। अगर आप ईमानदार और अंतर्दृष्टि वाले हैं तो आप एक सही नतीजा हासिल करने वाली तुलना कर पाएंगे।

व्हाइल वी वाच्ड: हमारे देखते-देखते एक पत्रकार की ज़िंदगी बदल गई

यह उस दौर की कहानी है जो ‘हमारे देखते-देखते’ बीत भी गया। उस दौर का पूर्व कथन भी जो हमारे देखते-देखते बीत रहा है। नए समय को देखते हुए यह एक पत्रकार के पूर्वाभास की कहानी भी लगती है।

राजनीतिक दलों के घोषणा पत्र और मुसलमान

संसद में मुसलमानों की हिस्सेदारी न के बराबर हो चुकी है। आगे भी इसके बढ़ने की संभावनाएं कम ही नज़र आती हैं। मौजूदा सत्तारूढ़ पार्टी तो मुसलमान उम्मीदवारों को टिकट भी नहीं देती है। देखा-देखी कुछ ऐसा माहौल बन गया है कि दूसरी राजनीतिक पार्टियां भी मुस्लिम उम्मीदवारों से बचने लगी हैं कि कहीं बहुसंख्यक तबक़ा उनसे नाराज़ न हो जाए और उनके जीतने की संभावना कम न हो जाए। ऐसे में सवाल उठता है कि मुसलमानों को अपने अधिकारों के संरक्षण के लिए क्या रास्ता अपनाना चाहिए?

एएमयू और जामिया, बीएचयू के समान आरक्षण मानदंडों का पालन क्यों नहीं कर सकते?

भाजपा, आरएसएस और उससे जुड़े संगठनों द्वारा समय-समय पर इस तरह के सवाल उठाए जाते रहे हैं कि इन दोनों विश्वविद्यालयों में अन्य शैक्षिक संस्थानों के समान आरक्षण नीति क्यों लागू नहीं होती? हाल ही में प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने एक चुनावी जनसभा में यह मुद्दा छेड़ा है। चुनाव के दौरान इस तरह की टिप्पणियां भाजपा द्वारा उसके विरोधी अल्पसंख्यक, पिछड़े वर्ग और अनुसूचित जाति के वोटों के विलय को रोकने के लिए एक हताश प्रयास प्रतीत होता है।

चमकीला सिर्फ़ नाच-गाना या कॉमेडी नहीं, एक पूरी ट्रेजेडी है

‘चमकीला’ की लोकप्रियता और दलित पहचान होने के नाते उसकी हत्या कर दी जाती है। हत्या की ख़बरें तो अख़बारों में छपती हैं लेकिन हत्यारों को सज़ा नहीं होती। एक कलाकार जो अपनी कम आयु में ही अंतरराष्ट्रीय स्तर पर लोकप्रिय होता है, उसको भारतीय समाज दलित होने के कारण हमेशा के लिए भुला देता है।