क्या यहूदी एक बेघर क़ौम थे? जानिए इज़राइल के इस दावे का सच

ज़ायोनवाद दरअस्ल, एक यहूदी परियोजना बनने से पहले एक ईसाई उपनिवेशवादी परियोजना थी। इसके स्पष्ट प्रतीक विक्टोरियन ब्रिटेन में 1820 के दशक से ही दिखाई देने लगे थे। एक शक्तिशाली धार्मिक और साम्राज्यवादी आंदोलन उभरा जो फ़िलिस्तीन में यहूदियों की वापसी को एक रणनीतिक योजना के केंद्र में रख कर इसे ईसाई साम्राज्य का भाग बनाना चाहता था। उन्नीसवीं शताब्दी में यह भावना ब्रिटेन में और भी लोकप्रिय हुई और आधिकारिक साम्राज्यवादी नीति पर काफ़ी प्रभावित हुई।

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इज़राइल के दस झूठ – अध्याय 2

इलान पापे

(छात्र विमर्श अपने पाठकों के लिए प्रसिद्ध इतिहासकार Ilan Pappé की किताब Ten Myths About Israel का हिन्दी अनुवाद प्रस्तुत कर रहा है। पढ़िए इस किताब के दूसरे अध्याय ‘यहूदी एक बेघर क़ौम थे’ का अनुवाद।)

दूसरा झूठ: यहूदी एक बेघर क़ौम थे

पिछले अध्याय में प्रस्तुत दावे कि फ़िलिस्तीन एक ऐसा देश था जहां कोई आबादी नहीं थी, उसके साथ-साथ यह दावा भी किया जाता है कि यहूदी एक ऐसी क़ौम थी जिनका कोई देश नहीं था।

लेकिन क्या उपनिवेशवादी यहूदी एक ‘क़ौम’ थे? हालिया शोध इस बारे में सालों पहले से व्यक्त किए जाते रहे संदेहों को मज़बूत करते हैं। इस नाज़ुक दृष्टिकोण की सामान्य विषयवस्तु का ख़ुलासा श्लोमो सैंड (Shlomo Sand) की किताब ‘यहूदी जाति की खोज (The Invention of the Jewish People)’ में बेहतर तरीक़े से प्रस्तुत किया गया है। सैंड बताते हैं कि ईसाई दुनिया, अपने हित में और आधुनिक इतिहास के एक विशेष मोड़ पर, इस विचार का समर्थन करती रही है कि यहूदी एक क़ौम हैं जिन्हें एक न एक दिन अपनी पवित्र भूमि पर वापस जाना चाहिए। इस कहानी में यह वापसी समय के अंत की दिव्य योजना का हिस्सा होगी और इसके साथ ही ईसा मसीह का पुनर्जीवन और आगमन होगा।

सोलहवीं शताब्दी से आरंभ होने वाले ‘सुधार आंदोलन’ के धार्मिक उथल-पुथल ने विशेष रूप से प्रोटेस्टेंटों की इस मान्यता को मज़बूती प्रदान की कि सदी के अंत और यहूदियों के धर्म परिवर्तन और उनके फ़िलिस्तीन वापसी के बीच सीधा संबंध है। सत्रहवीं शताब्दी के एक अंग्रेज़ पादरी थॉमस ब्राइटमैन ने ये धारणाएं इस प्रकार स्थापित कीं, “क्या वे फिर से यरूशलेम लौटेंगे? इससे अधिक निश्चित कुछ भी नहीं है। पैग़ंबर सभी जगह इसकी पुष्टि करते हैं और इसके बारे में बात करते हैं।” ब्राइटमैन केवल एक दैवीय वादे के पूरा होने की आशा नहीं कर रहे थे; वे और उनके बाद के बहुत से लोगों की इच्छा थी कि यहूदी या तो ईसाई धर्म स्वीकार कर लें या यूरोप को पूरी तरह छोड़ दें। सौ साल बाद एक जर्मन धार्मिक और प्राकृतिक दर्शनशास्त्री हेनरी ओल्डेनबर्ग ने लिखा, “यदि इन बदलावों के बीच जिसके लिए इंसानी कर्म जवाबदेह हैं, अवसर प्रस्तुत हों, …. [यहूदी] फिर से अपना साम्राज्य स्थापित कर सकते हैं, और … भगवान उन्हें दूसरी बार चुन सकते हैं।” ऑस्ट्रो-हंगेरियन फ़ील्ड मार्शल चार्ल्स जोसेफ़ (Charles-Joseph of Lign), ने आठवीं सदी के दूसरे हिस्से में लिखा:

“मेरा विश्वास है कि एक यहूदी घुल-मिल नहीं सकता है, और हमेशा, वह जहां भी हो, राष्ट्र के भीतर एक राष्ट्र का गठन करेगा। मेरी राय में सबसे सरल चीज़ यह होगी कि हम उन्हें उनकी मूल भूमि, जहां से उन्हें निकाला गया था, वापस भेज दें। जैसा कि इस अंतिम पाठ से स्पष्ट है, यह ज़ाहिर है कि यह ज़ायोनवाद के इन सृजनात्मक विचारों और एक अधिक पुराने यहूदी-द्वेष के बीच एक स्पष्ट संबंध था।”

प्रसिद्ध फ़्रांसीसी लेखक और राजनीतिज्ञ फ़्रांसिस-रेने डे शाटोब्रियांड (François-René de Chateaubriand) ने लगभग उसी समय लिखा था कि यहूदी “यहूदा (Judea) के वैध मालिक” थे। उसने नेपोलियन बोनापार्ट को प्रभावित किया, जो उन्नीसवीं सदी की शुरुआत में फ़िलिस्तीन के यहूदी समुदाय व देश के अन्य निवासियों की मदद से मध्य पूर्व पर क़ब्ज़ा करने की उम्मीद कर रहा था। उसने उनसे ‘फ़िलिस्तीन वापसी’ और एक राज्य की स्थापना का वादा किया। इस प्रकार हम देख सकते हैं कि, ज़ायोनवाद दरअस्ल, एक यहूदी परियोजना बनने से पहले एक ईसाई उपनिवेशवादी परियोजना थी।

अंधविश्वास और पौराणिक विश्वासों के वास्तविक उपनिवेशवादी कार्यक्रम में बदलने के स्पष्ट प्रतीक विक्टोरियन ब्रिटेन में 1820 के दशक से ही दिखाई देने लगे थे। एक शक्तिशाली धार्मिक और साम्राज्यवादी आंदोलन उभरा जो फ़िलिस्तीन में यहूदियों की वापसी को एक रणनीतिक योजना के केंद्र में रख कर इसे ईसाई साम्राज्य का भाग बनाना चाहता था। उन्नीसवीं शताब्दी में यह भावना ब्रिटेन में और भी लोकप्रिय हुई और आधिकारिक साम्राज्यवादी नीति पर काफ़ी प्रभावित हुई। “फ़िलिस्तीन की मिट्टी … केवल अपने निर्वासित बच्चों की वापसी का इंतज़ार कर रही है, और कृषि क्षमताओं के समानुपातिक उपयोग के साथ उद्योग के प्रयोग से एक बार फिर वह सार्वभौमिक आनंदमयता फूटेगी जो सुलेमान के दिनों में कभी थी।”, यह लिखा था स्कॉटिश रईस और सैन्य कमांडर जॉन लिंडसे ने। इस भावना को अंग्रेज़ दार्शनिक डेविड हार्टली ने भी दोहराया, जिन्होंने लिखा, “संभावित है कि यहूदी फ़िलिस्तीन में पुनर्स्थापित होंगे।”

यह प्रक्रिया तब तक पूरी तरह से सफल नहीं हो सकी जब तक इसे संयुक्त राज्य अमेरिका का समर्थन नहीं मिला। वहां भी यहूदी क़ौम के वापस फ़िलिस्तीन लौटने और एक ‘ज़ायोन’ बनाने के हक़दार होने एवं यहूदी राष्ट्र के विचार का समर्थन करने का इतिहास था। यूरोप में प्रोटेस्टेंट जिन विचारों को व्यक्त करते थे, वे लगभग उसी रूप में अटलांटिक के पार भी प्रकट हुए। अमेरिकी राष्ट्रपति, जॉन एडम्स (1735–1826), ने कहा, “मैं वास्तव में चाहता हूं कि यहूदी फिर से एक स्वतंत्र राष्ट्र के रूप में यहूदा में बसें।”

इस आंदोलन के प्रचारकों से लेकर विचारों के इतिहास की एक रेखा सीधे उन लोगों तक पहुंचती है, जिनके पास फ़िलिस्तीन के भाग्य को बदलने की शक्ति थी। उनमें सबसे प्रमुख थे लॉर्ड शाफ़्ट्सबरी (1801–1885), एक प्रमुख ब्रिटिश राजनीतिज्ञ और सुधारक, जो फ़िलिस्तीन में एक यहूदी देश के लिए सक्रिय अभियान चला रहे थे। फ़िलिस्तीन में ब्रिटिश उपस्थिति के समर्थन में उनके तर्क धार्मिक और रणनीतिक दोनों थे।

जैसा कि मैं अब प्रस्तुत करने वाला हूं, धार्मिक उत्साह और सुधारात्मक जोश का यह ख़तरनाक मिश्रण उन्नीसवीं सदी के मध्य में शाफ़्ट्सबरी के प्रयासों से शुरू होकर 1917 में बालफ़ोर घोषणा तक जाने वाला था। शाफ़्ट्सबरी को यह महसूस हुआ कि केवल यहूदियों के वापसी का समर्थन करना ही काफ़ी नहीं होगा, बल्कि उन्हें उनके प्रारंभिक उपनिवेश में ब्रिटेन द्वारा सक्रिय रूप से सहायता प्रदान करनी होगी। उन्होंने ज़ोर दिया कि एक ऐसा एक गठबंधन बनना चाहिए, जिसमें यहूदियों को ओटोमन फ़िलिस्तीन की यात्रा के लिए सहायता सामग्री प्रदान की जाए। उन्होंने यरुशलेम में स्थित एंजेलिकल बिशप्रिक सेंटर और कैथेड्रल को इस परियोजना के लिए प्रारंभिक वित्तीय सहायता प्रदान करने के लिए मनाने में सफलता प्राप्त कर ली। यह संभवतः मुमकिन नहीं हुआ होता यदि शाफ़्ट्सबरी ने अपने ससुर, ब्रिटेन के विदेश मंत्री और भविष्य के प्रधानमंत्री, लॉर्ड पामर्स्टन को इस मक़सद में शामिल करने में सफलता प्राप्त नहीं की होती। 1 अगस्त, 1838 को शाफ़्ट्सबरी ने अपनी डायरी में दर्ज किया:

“पामर्स्टन के साथ खाना खाया। खाने के बाद उनके साथ अकेला रुका रहा। मैंने अपनी योजनाओं को सामने रखा, जो उन्हें पसंद आईं। उन्होंने सवाल पूछे और फ़ौरन इस पर विचार करने का वादा किया [यह कार्यक्रम यहूदियों को फ़िलिस्तीन में वापस लाने और उस पर क़ब्ज़ा करवाने के लिए था]। प्रकृति का ढंग भी कितना अद्वितीय है। यदि इंसानी तरीक़े  से मापा जाए, तो यह अनोखा है। पामर्स्टन को ईश्वर ने पहले ही चुन रखा था कि वे उनके पुराने लोगों के लिए भलाई का ज़रिया बनें, उनकी विरासत को सम्मानित करें और उनके भाग्य को माने बिना उनके अधिकारों को स्वीकार करें। ऐसा लगता है कि वे अभी और भी काम करेंगे। हालांकि, उनका इरादा सद्भावनापूर्ण होने के बावजूद, पूरी तरह मज़बूत नहीं था। मुझे राजनीतिक, आर्थिक और वाणिज्यिक रूप से तर्क देना पड़ा। वे अपने गुरु की तरह यरुशलेम के लिए रोते नहीं हैं, न ही प्रार्थना करते हैं कि अब, अंत में, वह (धरती) अपने सुंदर वस्त्र पहनने वाली है।”

पहले क़दम के रूप में, शाफ़्ट्सबरी ने पामर्स्टन को मनाया कि वह अपने पुनर्स्थापनावादी मित्र (फ़िलिस्तीन में यहूदियों की पुनर्स्थापना में विश्वास रखने वाले) विलियम यंग को पहले ब्रिटिश उप-काउंसिल के रूप में यरुशलेम में नियुक्त करें। इसके साथ ही वे अपनी डायरी में लिखते हैं: “यह कितनी अद्भुत घटना है! ईश्वर के लोगों का प्राचीन शहर, राष्ट्रों के बीच अपना स्थान लेने जा रहा है; और इंग्लैंड वह पहला ग़ैर-यहूदी राज्य है जो उनके ‘उत्पीड़न’ को रोक रहा है।” एक वर्ष बाद, 1839 में, शाफ़्ट्सबरी ने ‘लंदन क्वार्टरली रिव्यू’ के लिए एक तीस पन्ने का लेख लिखा, जिसका शीर्षक था ‘राज्य और यहूदियों की पुनर्स्थापना’, जिसमें उन्होंने ईश्वर के चुनिंदा लोगों के लिए एक नए युग का पूर्वानुमान प्रस्तुत किया। उन्होंने लिखा कि:

“यहूदियों को और अधिक संख्या में वापस लौटने और दोबारा यहूदा और गलीली के खेतीहर मालिक बनने के लिए प्रोत्साहित किया जाना चाहिए … हालांकि मान्य है कि वे अकड़बाज़, काले हृदय वाले लोग हैं, और नैतिक पतन, हठ व गॉस्पल के प्रति अज्ञानता में डूबे हुए हैं, लेकिन [वे] मोक्ष के योग्य ही नहीं, बल्कि ईसाई धर्म की मुक्ति की आशा के लिए आवश्यक भी हैं।”

शाफ़्ट्सबरी की पामर्स्टन के साथ सौम्य गुटबंदी सफल साबित हुई। धार्मिक कारणों से अधिक राजनीतिक लाभों के लिए, पामर्स्टन भी यहूदी पुनर्स्थापन के पक्षधर बन गए। उनकी सोच में आने वाले अन्य कारकों में एक कारक यह था कि ‘यहूदी गिरते हुए ओटोमन साम्राज्य के पतन में उपयोगी हो सकते हैं, जिससे क्षेत्र में ब्रिटिश विदेश नीति का मुख्य उद्देश्य पूरा हो सकेगा।’

पामर्स्टन ने 11 अगस्त, 1840 को इस्तांबुल में ब्रिटिश राजदूत को एक पत्र लिखा, जिसमें उन्होंने यह बताया कि किस प्रकार यहूदियों को फ़िलिस्तीन में वापसी की अनुमति देने से ओटोमन साम्राज्य और ब्रिटेन दोनों को साझा लाभ होगा। विडंबना यह थी कि यहूदियों की पुनर्स्थापना को, यथास्थिति बनाए रखने और ओटोमन साम्राज्य को विघटन से बचाने का महत्वपूर्ण साधन माना जा रहा था। पामर्स्टन ने लिखा:

“वर्तमान समय में यूरोप में बिखरे हुए यहूदियों के बीच एक मज़बूत धारणा पायी जाती है कि वह समय नज़दीक है जब उनकी क़ौम फ़िलिस्तीन वापसी करेगी ... सुल्तान के लिए यह महत्वपूर्ण होगा कि वे यहूदियों को फ़िलिस्तीन वापसी करने और वहां बसने के लिए प्रोत्साहित करें क्योंकि जो संपत्ति वे अपने साथ लाएंगे, वह सुल्तान के शासन के संसाधनों को बढ़ा देगी; और यदि यहूदी, सुल्तान के संरक्षण के तहत और आमंत्रण के साथ, वापसी करते हैं, तो वे मुहम्मद अली या उसके उत्तराधिकारी की, भविष्य में किसी भी बुरी योजनाओं पर नियंत्रण रखेंगे ... मैं आप महामहिम को मज़बूती से सलाह देता हूं कि आप [तुर्की सरकार] को सलाह दें कि वे यूरोप के यहूदियों को फ़िलिस्तीन वापसी करने के लिए हर न्यायोचित प्रोत्साहन दें।”

मोहामेत अली, जिसे आमतौर पर मुहम्मद अली के नाम से जाना जाता है, मिस्र का गवर्नर था, जो उन्नीसवीं शताब्दी के पूर्वार्द्ध में ओटोमन साम्राज्य से अलग हो गया था। जब पामर्स्टन इस्तांबुल में अपने राजदूत को यह पत्र लिख रहे थे, तो यह लगभग एक दशक के बाद था जबकि मिस्र का शासक सुल्तान को लगभग अपदस्थ कर चुका था। यह विचार कि फ़िलिस्तीन को निर्यात की जाने वाली यहूदी संपत्ति संभावित आंतरिक और बाहरी दुश्मनों से ओटोमन साम्राज्य को मज़बूत करेगी, यह दर्शाता है कि ज़ायोनवाद, यहूदी-द्वेष, ब्रिटिश साम्राज्यवाद और धर्म से कैसे जुड़ा था।

लॉर्ड पामर्स्टन द्वारा पत्र भेजे जाने के कुछ दिनों बाद, ‘द टाइम्स’ के एक मुख्य लेख में ‘यहूदियों को उनके पूर्वजों की भूमि पर बसाने’ की योजना का आह्वान किया गया, जिसमें दावा किया गया कि यह ‘गंभीर राजनीतिक विचार’ के तहत था और इस योजना को बनाने के लिए शाफ़्ट्सबरी के प्रयासों की सराहना की गई, जिसके बारे में तर्क दिया गया कि, वह ‘व्यावहारिक और राजनैतिक’ था। लेडी पामर्स्टन ने भी अपने पति का समर्थन किया। उन्होंने एक मित्र को लिखा: “हमारे पक्ष में कट्टरपंथी और धार्मिक तत्व हैं, और आप जानते हैं कि इस देश में उनके कितने समर्थक हैं। वे पूरी तरह से दृढ़ हैं कि यरूशलेम और संपूर्ण फ़िलिस्तीन को यहूदियों को लौटने के लिए आरक्षित रखा जाएगा; यहूदियों को पुनर्स्थापित करने की यही उनकी एकमात्र इच्छा है।” इसी प्रकार अर्ल (एक अंग्रेज़ी रैंक) ऑफ़ शाफ़्ट्सबरी का वर्णन इस प्रकार किया गया: “उन्नीसवीं सदी में ईसाई ज़ायोनवाद के अग्रणी प्रस्तावक और फ़िलिस्तीन में यहूदियों के लिए एक मातृभूमि स्थापित करने का रास्ता तैयार करने का प्रयास करने वाले क़द के पहले राजनेता।”

पुनर्स्थापन के इस विचार के प्रति ब्रिटिश सरकार के इस उत्साह को सही ढंग से प्रोटो-ज़ायोनवाद कहा जाना चाहिए। हालांकि, हमें उन्नीसवीं सदी के इस रुझान की समकालीन विचारधारा के अध्ययन में सतर्क रहना चाहिए, फिर भी इसमें वे सभी तत्व मौजूद थे जो इन विचारों को भविष्य में मूल फ़िलिस्तीन आबादी के मूलाधिकारों को मिटा देने व नकार देने हेतु इस्तेमाल किए जाने के लिए ज़रूरी थे। निःसंदेह ऐसे चर्च और पादरी भी थे जो स्थानीय फ़िलिस्तीनियों के साथ थे। उनमें से उल्लेखनीय जॉर्ज फ़्रांसिस पोपम ब्लिथ थे जो चर्च ऑफ़ इंग्लैंड के पादरी थे, जिन्होंने कुछ अन्य उच्च स्तरीय चर्च एंग्लिकन सहयोगियों के साथ मिलकर फ़िलिस्तीनियों की आकांक्षाओं और अधिकारों के प्रति मज़बूत सहानुभूति का माहौल बनाया। 1887 में ब्लिथ ने सेंट जॉर्ज कॉलेज की स्थापना की, जो शायद आज भी पूर्वी यरूशलेम के सबसे अच्छे हाई स्कूलों में से एक है (इसमें स्थानीय संभ्रांत वर्ग के बच्चे पढ़ते थे, जो बीसवीं सदी के पहले भाग में फ़िलिस्तीन की राजनीति में महत्वपूर्ण भूमिका निभाने वाले थे)। हालांकि, सत्ता फिर भी उन लोगों के पास रही जो यहूदी मुद्दे का समर्थन कर रहे थे और जो बाद में ज़ायोनवादी उद्देश्य बन गया।

जारी…

हिन्दी अनुवाद: उसामा हमीद

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