धार्मिक पहचान का प्रदर्शन और उसके अर्थ!

हर ग़ैर-मुस्लिम को यह अधिकार है कि वह अपनी आस्था के अनुसार प्रार्थना करे, पूजा करे, नारे लगाए, भोजन और वस्त्र धारण करे, रस्म व रिवाज की पैरवी करे लेकिन अपनी दुआओं अपने नारों और अपनी पहचान को दूसरों पर थोपने और इस सिलसिले में ज़बरदस्ती करने का कोई हक़ उसे प्राप्त नहीं है...

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जामिया के छत्रों ने शशि थरूर के सामने लहराये पोस्टर

CAA और NRC व NPR के विरुद्ध जारी विरोध प्रदर्शन में एक प्रश्न इधर कुछ दिनों से प्रमुखता से उभर रहा है – “इस्लामी शिनाख़्त” के इज़हार और उस पर ज़िद का सवाल। इस पर विशेषकर युवाओं के बीच गरमागरम बहसें हो रही हैं और चरम एवं भिन्न रवैयों का प्रदर्शन भी हो रहा है।

मुसलमान इस देश का हिस्सा हैं और इस्लाम पर पूरी तरह अमल करते हुए और इस्लामी पहचान और इस्लामी व्यक्तित्व के साथ वह इस देश का हिस्सा रहना चाहते हैं। वह भारत के नागरिक हैं और दुनिया की कोई ताक़त उन्हें इस नागरिकता से और भारतीय नागरिक की पहचान से वंचित नहीं कर सकती। ठीक इसी तरह वह कलमा पढ़ने वाले मुसलमान हैं और विश्व की कोई शक्ति उन्हें इस्लामी पहचान और इस्लामी व्यक्तित्व से भी वंचित नहीं कर सकती  (इंशा-अल्लाह)। उनकी नागरिकता और देश से जुड़ाव को जो लोग चुनौती दे रहे हैं उनका वह भरपूर मुक़ाबला कर रहे हैं और करेंगे लेकिन उसके लिए उन्हें अपनी इस्लामी पहचान पर किसी भी प्रकार का खेद प्रकट करने की आवश्यकता नहीं है। दूसरे धर्मों की तरह इस्लाम इस देश का और यहाँ की विरासत का अहम हिस्सा है और इस्लाम पर क़ायम रहना हर मुसलमान का मौलिक, मानवीय तथा संवैधानिक अधिकार है। देश से वफ़ादारी और देशवासियों से सौहार्द्रपूर्ण सम्बंध का यह तक़ाज़ा हरगिज़ नहीं है कि वह अपने धर्म (दीन) और विश्वास (ईमान) से अलग हों या उस पर किसी तरह की के समझौते के लिए तैयार हों।

मुसलमान अपने वतन के भाईयों के उस अधिकार को स्वीकार करते हैं कि वह अपने धर्म और आस्था के अनुसार जीवन व्यतीत कर सकते हैं। इसी तरह यह अधिकार वह स्वयं भी रखते हैं। सौहार्दपूर्ण सम्बंध का उस अधिकार से वंचित होना नहीं है बल्कि उसका सम्मान है। हर ग़ैर-मुस्लिम को यह अधिकार है कि वह अपनी आस्था के अनुसार प्रार्थना करे, पूजा करे, नारे लगाए, भोजन और वस्त्र धारण करे, रस्म व रिवाज की पैरवी करे लेकिन अपनी दुआओं अपने नारों और अपनी पहचान को दूसरों पर थोपने और इस सिलसिले में ज़बरदस्ती करने का कोई हक़ उसे प्राप्त नहीं है और उसी तरह अपनी आस्था और रिवायत के मुताबिक़  जिंदगी गुजारने का हक़ हर मुसलमान को भी है और उसके लिए भी यह उचित नहीं है कि वह अपने कलमे, नारे या अपनी पहचान को दूसरों पर ज़बरदस्ती थोपे। न तो इस्लाम इसकी इजाज़त देता है और न ही आमतौर पर कोई मुसलमान इसका प्रयत्न करता है। लेकिन दुर्भाग्यवश मुसलमानों में भी ऐसे आसार नज़र आने लगे हैं कि वे वतनी भाईयों से बेहतर संबन्धों के लिए अपनी धार्मिक और वैचारिक पहचान पर गंभीरता से समझौते के लिए तैयार हो जाते हैं। बेहतर सम्बंध के लिए आपको अपने अक़ीदे से हटकर नारे लगाने पड़ें या खुद को हिंदू कहलाना पड़े तो यह अमल मज़हबी रवादारी(धार्मिक सहिष्णुता) को नहीं बल्कि अदम रवादारी (धार्मिक असहिष्णुता) को बढ़ावा देने का कारण बनता है। इस रवैये का अर्थ यह होगा कि  आपने यह स्वीकार कर लिया है कि इस देश में अपनी धार्मिक प्रतिष्ठा के साथ आप अपना जीवन नहीं गुज़ार सकते।

इसकी प्रतिक्रिया स्वरूप दूसरी पराकाष्ठा यह है कि समय-समय पर असंबन्धित नारों और “इस्लामी शिनाख़्त” का कृत्रिम (Artificial) और जज़्बाती तरीक़ों से ऐलान और अमल भी शुरू हो गया है। शिनाख़्त के ऐलान व इज़हार से संबंधित अपने युवा दोस्तों के जोश और जज़्बों की क़द्र करना चाहिए। वर्तमान समय में यह आत्मविश्वास और हौसलामंदी उम्मत के लिए क़ीमती सरमाया है लेकिन यह बात भी अच्छी तरह समझनी चाहिए कि आज असल लड़ाई किस बात की है? इस समय फ़ासीवादी ताक़त का तात्कालिक प्रहार हमारी “इस्लामी शिनाख़्त” पर नहीं बल्कि हमारी “भारतीय पहचान” पर है। साम्प्रदायिक शक्तियाँ चाहती हैं कि इस देश के मुसलमान बाक़ी भारतीयों से अलग-थलग हो जाएँ। हिंदू, सिख, ईसाई, जैन, बौद्ध,  पारसी भी इस देश के बेटे-बेटियाँ हैं और मुसलमान ‘ग़ैर’ हैं। इस ग़ैरियत (otherness) को पैदा करना उसे तरक़्क़ी देना और इसे मुल्क की सोच और मिजाज़ में पैवस्त कर देना साम्प्रदायिक शक्तियों  का सबसे प्रमुख एजेंडा है। वे चाहते हैं कि मुसलमानों की टोपियाँ, दाढ़ियाँ, उनके धार्मिक प्रतीक और उनके नारे हाइलाइट हों और हाइलाइट होने के साथ साथ ग़ैरियत, अजनबियत तथा देश से अलगाव की अलामतें बन जाएँ। इस वक्त सारा नैरेटिव यही है कि मुसलमान, उनकी अलामतें उनकी माँगें, उनके प्रदर्शन, उनके मराकिज़ सब कुछ ग़ैरियत की बल्कि दुश्मनी का प्रतीक है। वे हिंदुस्तान और उसकी वास्तविक धारा से भिन्न बल्कि विरोधाभासी धारा का प्रतिनिधित्व करते हैं और उनसे सम्बंध और उनके साथ हमदर्दी एक जुर्म और बग़ावत है।

इस स्थिति से निपटने का तरीक़ा यह है कि हमें अपनी इस्लामी शिनाख़्त के लिए किसी शर्मिंदगी का शिकार न हों और न ही इसे छिपाने की कोशिश करें लेकिन इसको उभारने के ऐसे तरीक़े कदापि प्रयोग में न लाएँ जिससे सांप्रदायिक शक्तियों के छिपे उद्देश्य पूरे हों और हमको देश की मुख्यधारा से अलग-थलग करने वाले हों।

इस समय बड़ी ज़रूरत यह है कि हम देश के आम लोगों को ख़ुद से क़रीब करें, साझा-मूल्यों की उनकी भावना को मज़बूत करें और इस धारणा को बल दें कि हम भी भारत के नागरिक हैं और उनके भाई हैं। जिस तरह क़ुरआन ने नबियों को अपनी क़ौम के लोगों का भाई कहा है, वैसे ही यहाँ रहने वाले सभी लोगों में यह भावना प्रबल होनी चाहिए कि मुसलमान भी उनके भाई हैं और मातृभूमि व मुल्क के संबंध में उनके अपने हैं। जबकि हमारे लिए यह महत्वपूर्ण है कि हम एक क़दम आगे बढ़ें और अपने देश को गले लगाएं वहीं यह भी आवश्यक है कि सांप्रदायिक भावनाओं को भड़काने वाले तथा दूरी पैदा करने वाले अमल से बचें।

नारों में भावनात्मक तत्व विशेष रूप से मजबूत होता है। वर्तमान स्थिति में, नारों पर विशेष ध्यान देने की आवश्यकता है। नारे ऐसे हों जो इस समय वास्तविक समस्या से संबंधित हों। नारे न तो हमारी मान्यताओं, परंपराओं और मूल्यों के विरोधाभासी हों, और न तो ऐसे हों कि जिससे दूसरे संप्रदाय के लोगों के जज़्बात भड़क जाएँ। बल्कि नारे ऐसे हों कि जो मुसलमानों को यहाँ के सभी संप्रदाय के लोगों को जोड़ने में सक्षम हों और उन मानवीय मूल्यों की तरजुमानी करने वाले हों जो विभिन्न धर्मों के पारस्परिक संबन्धों को प्रगाढ़ बनाने का सबब बनते हों तथा जो भारत के संविधान में उल्लिखित हैं।

जहां तक ​​धार्मिक और “इस्लामिक शिनाख़्त” के नारों का सवाल है, अल्लाहु-अकबर का नारा तो इस ब्रह्मांड के पालनहार (रब) की बड़ाई का ऐलान है। इसमें क्या दिक़्क़त हो सकती है? इसका ताल्लुक़ तो हमारे अक़ीदे और हमारे ईमान से है। तकबीर-ए-मुसलसल एक मुसलमान की ज़िम्मेदारी और उसका कर्तव्य है। लेकिन देश के इतिहास में इन नारों का इस तरह से शोषण किया गया है कि एक आम ग़ैर-मुस्लिम के लिए यह सांप्रदायिक टकराव के अवसर पर बुलंद किया जाने वाला युद्धघोष है। “ला-इलाह इल-लल्लाह” तो इस्लाम की दावत का आधार है। लेकिन देश का जनमानस इसे पाकिस्तानी आंदोलन से जोड़कर देखता है। दुर्भाग्य से, मुसलमानों ने इस संदेश को समझाने के प्रयास बहुत कम किए हैं कि जिसकी यह भावना प्रतिनिधित्व करती है। इसलिए, लोगों को समझने और गंभीर निमंत्रण के बजाय जब ये शब्द नारे के रूप में उठाए जाते हैं, तो वे संप्रदायिक भावना को भड़काने वाले बन जाते हैं। ग़ुस्सा पैदा किया जाता है, असमानता की भावना को प्रबल किया जाता है। धारणा यह फैलाई जाती है कि मुसलमान आम भारतीयों से अलग हैं। इस समय, यह आवश्यक है कि “ला-इलाह इल-लल्लाह” और “अल्लाहु-अकबर” जैसे शब्द तथा इस्लामी प्रतीक इस्लाम की तरफ़ आमंत्रण तथा गहन संवाद का विषय बनें, न कि भावनात्मक नारों का। वे ऐसे लोगों को जोड़ने वाले, उनके दिल और दिमाग़ को अपील करने वाले शब्द बनें, क़ौमपरस्ती तथा सांप्रदायिक भावना के प्रतीक न बनें। इन शब्दों को दीर्घकालिक और धैर्य से दावती कम करने का आधार होना चाहिए, न कि राजनीतिक संघर्ष के भयावह माहौल में राजनीतिक पहचान का स्रोत।

इस तरह के अभियान हमें अवसर प्रदान करते हैं कि हम क़ुरआन और सुन्नत के संदेश को गंभीरता से प्रस्तुत करें। इस्लाम की मानवीय शिक्षाओं को लोगों के बीच उजागर कीजिये। लोगों को बताएं कि इस्लाम कैसे शोषण व उत्पीड़न को ख़त्म करता है, सभी मनुष्यों को स्वतंत्रता और समानता देता है, मनुष्यों के बीच भाईचारा और प्रेम पैदा करता है। इस तथ्य को व्यक्त करें कि सभी इंसान एक ईश्वर के बनाए हुये हैं तथा उसके सेवक हैं। हालात के अनुसार अपने सिद्धांतों और मूल्यों पर इस तरह ध्यान आकर्षित करें कि आम भारतीयों में इन मूल्यों के प्रति सम्मान की भावना हो। यदि आप इस्लामी शिनाख़्त के इज़हार की शुद्ध भावना की ओर मुड़ते हैं, तो ये शब्द दूसरों को उकसाने या भड़काने से आपको रोकेंगे। और एक दायी (इस्लाम की दावत देने वाला) के रूप में भी अपनी भूमिका निभाएंगे। वास्तव में, इस्लामी शिनाख़्त केवल एक राष्ट्रीय या सांप्रदायिक पहचान नहीं है, बल्कि एक वैचारिक, दावती और नैतिक शिनाख़्त भी है।

सआदतुल्लाह हुसैनी (राष्ट्रीय अध्यक्ष, जमात-ए-इस्लामी हिन्द)

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