CAA, NRC, NPR पर उभरते प्रश्न और हमारी ज़िम्मेदारीयां!

जबकि CAA अपने आप में बहुत ही समस्याओं से भरा हुआ और संविधान के खिलाफ़ है। ऐसे में सरकार द्वारा CAA और NRC को एक साथ लाने की योजना और भी ख़तरनाक हो जाएगी। कोई स्पष्ट दिशा-निर्देश नहीं जारी किए गए हैं यानी यह मनमाने ढंग से किया जाना है जो‌ हमारे देश के बहुलतावादी समाज को तोड़ कर रख देगा और लोगों को उनके धर्म के आधार पर विभाजित करके उनकी नागरिकता हड़प कर लेगा।

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जिस दिन भाजपा सरकार की ओर से नागरिकता संशोधन क़ानून पास किया गया था, उसी दिन से पूरे देश में धर्म की बुनियाद पर देश की जनता को बाँटने की NRC-CAA-NPR प्रक्रिया को ख़ारिज करते हुए एक लोकतांत्रिक ढंग से मुखालफत शुरू हो गई थी। अभी तक इस क़ानून पर उठाए जा रहे सवालों के कारण जनता को इनकार, धमकी और धोखे का सामना करना पड़ा है। सरकार यह कहकर अपने आप को बचाती रही कि अभी देश भर में NRC लागू करने की कोई योजना नहीं है और CAA क़ानून तथा NPR का NRC से कोई ताल्लुक़ नहीं है। हालाँकि, नागरिकता क़ानून और इसके नियमों को ग़ौर से पढ़ने पर सच्चाई सामने आ जाती है।

सरकार का कहना है कि यह क़ानून (CAA) सताये गए शरणार्थियों के लिए लाया गया है। भारत का मौजूदा जो नागरिकता देने का क़ानून है वो जन्म, वंश, आवेदन (रजिस्ट्रेशन) आदि की बुनियाद पर नागरिकता देता है। इस क़ानून में बहुत-सी संभावनाएं हैं और ये काफ़ी है नागरिकता देने के लिए। दूसरे देशों में रह रहे प्रताड़ित शरणार्थियों के तर्क को शरणार्थियों को समायोजित करके, उन्हें क़ानूनी दर्जा देकर और भारतीय नागरिकता में उनके प्रवेश पर तेज़ी से नज़र रखने के लिए वर्तमान क़ानूनों में उचित बदलावों के ज़रिये प्रावधान करके निपटा जा सकता है। इसके लिए एक अलग भेदभावपूर्ण क़ानून की ज़रूरत नहीं है।

यहाँ क़ानूनी दस्तावेज़ों और प्रावधानों के आधार पर NPR और NRC के बारे में कुछ बुनियादी सवालों के जवाब दिए जा रहे हैं।

NRC क्या है? क्या इसका कोई संवैधानिक आधार है?

आसान शब्दों में NRC का मतलब देश के सभी नागरिकों की एक ऑफ़िशियल लिस्ट बनाना है। NRC का क़ानूनी आधार नागरिकता क़ानून की धारा 14A है, जिसे 2003 में एक क़ानून बनाया गया था, जब अटल बिहारी वाजपेयी की सरकार सत्ता में थी और लालकृष्ण आडवाणी देश के गृहमंत्री थे। इस धारा के तहत, सरकार सभी नागरिकों को ‘अनिवार्य रूप से’ पंजीकृत कर सकती है और पंजीकरण के बाद उन्हें एक राष्ट्रीय पहचान पत्र प्रदान कर सकती है। ऐसा करने के लिए सरकार भारतीय नागरिकों का एक राष्ट्रीय रजिस्टर (NRIC) तैयार कर सकती है। यह आमतौर पर NRC या ऑल इंडिया NRC के रूप में जाना जाता है।

NPR क्या है? क्या यह NRC से जुड़ा है? NPR कब लाया जाएगा?

एनपीआर यानी राष्ट्रीय जनसंख्या रजिस्टर। भारत में आम तौर पर निवासी, सभी व्यक्तियों की एक सूची, चाहे वे नागरिक हों या न हों। हालाँकि NPR की प्रक्रिया उसी विभाग के ज़रिये की जा रही है जो जनगणना करता है, लेकिन इसका क़ानूनी बुनियाद और मक़सद पूरी तरह से अलग है। भारत सरकार ने 31 जुलाई 2019 को एक अधिसूचना जारी करते हुए कहा था कि नागरिकता नियम 2003 के अनुसार अप्रैल से सितंबर 2020  के बीच NPR किया जाएगा। यह वही नियम हैं जिनके तहत NRC की प्रक्रिया अमल में लाई जाएगी। नागरिकता नियम 2003 के नियम 4 के तहत, NRC का पहला क़दम जनसंख्या रजिस्टर तैयार करने के लिए हर इलाक़े में घर-घर सूचना इकट्ठा करना है। सभी स्थानीय रजिस्टरों को मिलाकर एक उप-ज़िला, फिर ज़िला, फिर राज्य और फिर राष्ट्रीय जनसंख्या रजिस्टर बनाया जाएगा।

NRC को एनपीआर के ज़रिये कैसे तैयार किया जाएगा?

नागरिकता क़ानून के नियम 4 (3) के अनुसार, भारतीय नागरिकों का राष्ट्रीय रजिस्टर पहले स्थानीय स्तर पर एक स्थानीय रजिस्ट्रार द्वारा तैयार किया जाएगा। इसके लिए, स्थानीय रजिस्ट्रार, स्थानीय जनसंख्या रजिस्टर में हर एक व्यक्ति और परिवार की जानकारी की जाँच करेगा और ‘संदिग्ध नागरिकों’ की कैटेगरी बनाएगा, जिनसे अपनी नागरिकता का सुबूत देने के लिए कहा जाएगा। स्थानीय रजिस्ट्रार किस बुनियाद पर लोगों को ‘संदिग्ध नागरिक’ के रूप में चिह्नित करेंगे, नियमों में इसका कोई ज़िक्र नहीं मिलता है। नियम यह भी बताते हैं कि इस पूरी कवायद में स्थानीय रजिस्ट्रार को ‘एक या एक से अधिक व्यक्तियों’ के ज़रिये सहायता प्रदान की जा सकती है, लेकिन इन व्यक्तियों को चुनने के लिए किसी योग्यता या मानदंड का ज़िक्र भी नियमों में नहीं है।

CAA-NRC-NPR में समस्या क्या है?

CAA भारतीय संविधान के आर्टिकल 5, 10, 14 और 15 के ख़िलाफ़ है जिसमें सभी के लिए क़ानूनी बराबरी सुनिश्चित करने की बात की गई है और धर्म, नस्ल, जाति, लिंग, जन्मस्थान इत्यादि के आधार पर भेदभाव करने से रोका गया है। इस CAA क़ानून में कोई दिशा-निर्देश नहीं बताता कि कौन सा दस्तावेज़ नागरिकता साबित करेगा। सरकार ने भी कोई दिशा-निर्देश तैयार नहीं किये हैं और यह साफ़तौर नहीं बताया है कि कौन सा दस्तावेज़ निर्णायक रूप से नागरिकता साबित करेगा। जो लोग शहरी क्षेत्रों में रहते हैं और जागरूकता और पहुँच रखते हैं, उन्होंने अपने दस्तावेज़ तैयार किये हो सकते हैं, लेकिन ग्रामीण क्षेत्र के लोगों में जागरूकता और पहुँच की कमी है। इसी तरह, शिक्षित लोगों के पास दस्तावेज़ हो सकते हैं, लेकिन अशिक्षित लोगों को इससे नुक़्सान होगा। हालाँकि इसका ख़तरा सभी को होगा लेकिन ग़रीब और निरक्षर अधिक वंचित होंगे क्योंकि उनके पास दस्तावेज़ी प्रक्रिया के लिए जागरूकता, पहुँच और संसाधनों की कमी होगी और उन्हें विदेशी घोषित किए जाने पर न्यायिक मामलों में भी कठिनाई का सामना करना पड़ेगा। ऐसे देश में जहाँ डॉक्यूमेंटेशन के बारे में जागरूकता की अभी भी कमी है, जनसंख्या का बहुमत अभी भी अनपढ़ है, किसी भी दस्तावेज़ को पेश करना बिल्कुल नामुमकिन होगा।

जबकि CAA अपने आप में बहुत ही समस्याओं से भरा हुआ और संविधान के खिलाफ़ है। ऐसे में सरकार द्वारा CAA और NRC को एक साथ लाने की योजना और भी ख़तरनाक हो जाएगी। कोई स्पष्ट दिशा-निर्देश नहीं जारी किए गए हैं यानी यह मनमाने ढंग से किया जाना है जो‌ हमारे देश के बहुलतावादी समाज को तोड़ कर रख देगा और लोगों को उनके धर्म के आधार पर विभाजित करके उनकी नागरिकता हड़प कर लेगा।

हालाँकि NPR 1980 के दशक से जनगणना अभ्यास का हिस्सा रहा है, लेकिन जब इसे CAA-NRC के संदर्भ में देखा जाता है, तो कोई भी बहुत स्पष्ट रूप से देख सकता है कि NPR का फैसला NRC प्रक्रिया की शुरुआत है। चूंकि एनपीआर भारत में रहने वाले हर एक व्यक्ति के डेटा (जानकारी) इकट्ठा करेगा, इसलिए सरकार के लिए एनपीआर डेटा का उपयोग करके NRC प्रक्रिया शुरू करना और ‘संदिग्ध नागरिकों’ की सूची बनाना आसान होगा, जिन्हें नागरिकता साबित करने के लिए नोटिस दिया जा सकता है।

क्या होगा जब CAA-NRC-NPR को लागू किया जाएगा?

असम NRC सबसे बेहतर मिसाल है यह समझने के लिए कि CAA-NRC-NPR को लागू करने पर क्या होगा। नागरिकों की एक बहुत बड़ी संख्या (जिनमें सिर्फ़ मुसलमान नहीं हैं) के पास दस्तावेज़ न होने के कारण संदिग्ध क़रार दिया जाएगा। जैसा कि हमने असम में देखा कि NRC लिस्ट से बाहर किए गए लोगों में 60-70 प्रतिशत लोग ग़ैर-मुस्लिम थे। यह बताता है कि यह प्रक्रिया न सिर्फ़ मुसलमानों के लिए बल्कि सभी लोगों के लिए समस्या खड़ी करेगी क्योंकि दस्तावेज़ न दिखा पाने की सूरत में आपको NRC लिस्ट से बाहर कर दिया जाएगा, यानी किसी भी समुदाय का कोई भी व्यक्ति इससे प्रभावित हो सकता है।

जब एक व्यक्ति को अवैध घोषित कर दिया जाएगा, तो उसकी नागरिकता ख़त्म करके सभी अधिकार छीन लिए जाएंगे। उनकी संपत्तियां (जायदाद) ज़ब्त करके उनकी नौकरियों को भी छीना जाएगा। वे अपने किसी भी अधिकार को इस्तेमाल नहीं कर सकेंगे और न‌ ही राज्य से सुरक्षा और अदालत से न्याय मांग सकेंगे। कोई भी, किसी भी तरह से उनका शोषण करने व उनको सताने के लिए आज़ाद होगा।

असम की तरह इस NRC प्रक्रिया से एक पूरी ब्लैक मार्केट इकोनॉमी उभर कर सामने आएगी, जिसमें NRC और CAA के प्रभारी अधिकारी लोगों का नाम शामिल करने के लिए रिश्वत में बड़ी रक़म लेने लगेंगे। इसी तरह ताक़त का ग़लत इस्तेमाल इस तरह भी हो सकता है कि लोग आपसी रंजिश के चलते एक-दूसरे पर आरोप-प्रत्यारोप शुरू कर दें या राज्य ख़ुद या राजनीतिक दल लोगों को चिन्हित करके उनके ख़िलाफ़ आरोप लगाना शुरू कर दे।

क्या CAA उन लोगों को नागरिकता देगा‌ जो NRC से बाहर किए जाएंगे?

एक और भ्रम जो बनाया गया है वह यह है कि वे ग़ैर-मुस्लिम जो NRC के ज़रिये अपनी नागरिकता खो देंगे, वे CAA के ज़रिये अपनी नागरिकता प्राप्त कर सकेंगे, जो कि पूरी तरह सच नहीं है। CAA में एक‌ और जटिल पहलू यह है कि यह केवल अफ़ग़ानिस्तान, बांग्लादेश और पाकिस्तान के शरणार्थियों की बात करता है। लोगों को यह साबित करना होगा कि वे इन तीन देशों में से किसी एक देश और हिन्दू, ईसाई, सिख, जैन, बौद्ध या पारसी समुदाय से संबंध रखते हैं। जब संदिग्ध नागरिकों को चिन्हित किया जाएगा, उस वक़्त जो इन तीन देशों में से किसी भी देश से ताल्लुक़ नहीं रखते होंगे, उन्हें भी अवैध घोषित करके नागरिकता ले ली जाएगी।

मिसाल के तौर पर यदि महाराष्ट्र या आंध्र प्रदेश या तमिलनाडु में रहने वाला कोई ग़ैर-मुस्लिम व्यक्ति दस्तावेज़ न दिखा पाने की स्थिति में संदिग्ध क़रार दिया जाता है और सीएए में उसे नागरिकता देने का प्रावधान है, इसके बावजूद वह यह साबित नहीं कर सकेगा कि उसका ताल्लुक़ इन तीनों देशों में से किसी देश से है क्योंकि महाराष्ट्र, आंध्र प्रदेश या तमिलनाडु का इन देशों से कोई सम्बन्ध नहीं है। यानी वे भी मुसलमानों की तरह उसी दुविधा में फंस जाएंगे और उनकी भी नागरिकता, संपत्तियां और सभी अधिकार छीन लिए जाएंगे।

स्थानीय नागरिकता रजिस्टर से बाहर किए गए लोगों का क्या होगा?

सत्यापन या वेरिफ़िकेशन प्रक्रिया के बाद स्थानीय नागरिकता रजिस्टर से बाहर रखे गए लोगों के लिए अपील के दो चरण होंगे; पहला उप-ज़िला या तहसील स्तर पर और दूसरा ज़िला स्तर पर। जिन लोगों को भारतीय नागरिकों के अंतिम राष्ट्रीय रजिस्टर से बाहर रखा जाएगा, उन लोगों के लिए नियमों का ज़िक्र नहीं किया गया है लेकिन हमें याद रखना चाहिए कि यह केवल एक आधिकारिक प्रकिया है और क़ानूनी प्रक्रिया के बिना किसी भी भारतीय की नागरिकता को नहीं छीना जा सकता है। हालाँकि, NRC की पूरी कवायद सभी नागरिकों के लिए ज़बरदस्त कठिनाईयां पैदा करेगी, जिन्हें यह सुनिश्चित करने के लिए एक पूरी प्रक्रिया से गुज़रना होगा कि उनके मूल नागरिकता अधिकार सुरक्षित हैं। जिन लोगों को इस प्रक्रिया से बाहर रखा जाएगा, उन्हें अपने केस और अपीलों को लेकर और भी कठिन क़ानूनी प्रक्रिया से गुज़रना होगा।

NRC की प्रक्रिया में चिंतित करने वाला एक और पहलू निष्पक्षता और पारदर्शिता की कमी है। जैसा कि हमने ऊपर ज़िक्र किया कि स्थानीय स्तर के सरकारी अधिकारी जो स्थानीय रजिस्ट्रार के रूप में कार्य करेंगे, उन्हें लोगों को ‘संदिग्ध नागरिकों’ के रूप में चिह्नित करने की शक्ति दे दी गई है, यहाँ तक ​​कि उन आधारों को स्पष्ट किए बिना, जिसकी बुनियाद पर लोगों की जानकारी की जाँच की जाएगी। स्थानीय स्तर से लेकर ज़िला स्तर तक, सरकारी अधिकारियों को यह निर्णय लेने के लिए भारी शक्ति दे दी गई है कि किस व्यक्ति को अपनी नागरिकता का प्रमाण देने के लिए इधर-उधर भागना पड़ेगा।

हमें क्या करना चाहिए?

सबसे पहले हमें धर्मनिरपेक्ष भारत के नागरिक होते हुए ऐसे हर क़ानून का विरोध करना चाहिए जो नागरिकों को धर्म, भाषा, लिंग के आधार पर विभाजित करता हो, क्योंकि यह भारत के धर्मनिरपेक्ष, बहुलतावादी और समावेशी भावना के ख़िलाफ़ है जिसे संविधान की प्रस्तावना में दर्शाया गया है।

चूंकि CAA-NRC-NPR संविधान के और धर्मनिरपेक्ष और बहुलतावादी भारत के विचार के ख़िलाफ़ है इसीलिए हम सब को एक साथ आकर लोकतांत्रिक तरीक़े से, विरोध करने के अपने संवैधानिक अधिकार का इस्तेमाल करते हुए सरकार से इस क़ानून को वापस लेने एनपीआर और NRC को रद्द करने की मांग करनी चाहिए। हमारे इस प्रयास और संघर्ष से निम्नलिखित नतीजे निकलने चाहिए (और उससे पहले हमें पीछे नहीं हटना चाहिए)…

  1. सीएए को पूरी तरह से रद्द करने के लिए संसद पर दबाव बनाया जाए।
  2. सुप्रीम कोर्ट में CAA की संवैधानिक वैधता को चुनौती दी जाए और NRC-NPR पर रोक‌ लगाने की मांग की जाए।
  3. सिविल नाफ़रमानी के तौर पर NRC का बहिष्कार किया जाना चाहिए।
  4. राज्य सरकारों पर दबाव बनाना चाहिए कि वे अपने-अपने राज्यों में NPR की प्रक्रिया पर रोक लगाएं। याद रहे, एनपीआर ही NRC का पहला चरण है, और सभी पार्टियां और सरकारें जो NRC का विरोध कर रही हैं, उन्हें यह घोषणा करनी चाहिए कि वे अपने राज्यों में एनपीआर प्रक्रिया का भी संचालन नहीं करेंगे।

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