दूसरा रास्ता (लघुकथा)

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दूसरा रास्ता (लघुकथा)

सहीफ़ा ख़ान

दो मिनट पहले तक ख़ुशी में झूम रही सीमा अब दहशत में सुनसान सड़क पर अपनी ट्रॉफ़ी हाथ में लिए भाग रही थी। बस भागती ही जा रही थी और हर हांफ़ती-कांपती सांसों के साथ अपनी रफ़्तार बढ़ाने की नाकाम कोशिश में लगी थी। डर के मारे उसका दिल इतनी तेज़ी से धड़क रहा था कि अगर कोई शख़्स बग़ल से गुज़रे तो वह भी उसकी धड़कन साफ़ सुन सकता था।

कितना ख़ुश थी वह जब उसे बेस्ट आर्टिस्ट का अवॉर्ड मिला था। पूरा हॉल तालियों की गड़गड़ाहट से गूंज रहा था और प्रदर्शनी में लगी उसकी सभी पेंटिग्स मिनटों में बिक गई थीं। लेकिन दो मिनट पहले घटी उस घटना ने उसे सकते में डाल दिया।

हुआ यूं कि जब वह इठलाती हुई ट्रॉफ़ी लेकर ख़ुशी-ख़ुशी गैलरी से बाहर निकल रही थी, तभी उसे प्रदर्शनी आयोजित करने वाले आयोजक मिल गए। उन्होंने उसका हाथ पकड़कर पास के ही एक कमरे में घसीट लिया और उसके साथ अश्लील हरकत करने लगे। जब उसने विरोध किया तो उन्होंने उसका मुंह दबाकर दीवार की ओर पटकते हुए कहा कि “इतना घमंड किस बात का? ये जो इतनी तारीफ़ें तुमने बटोरी हैं, वो सिर्फ़ और सिर्फ़ मेरी वजह से। मुझे तुम पहले से ही बहुत पसंद थी और मैंने ही जूरी से कहकर तुम्हें अवॉर्ड दिलवाया है और सिर्फ़ इतना ही नहीं बल्कि तुम्हारी पेंटिग्स ख़रीदने वाले लोग भी मेरे ही थे।”

एक ही पल में सीमा के सारे सपने कांच के टुकड़ों की तरह ज़मीन पर बिखर गए। ख़ुद पर हो रहा गर्व चकनाचूर हो गया। इस अवॉर्ड के बाद मिला कॉन्फ़िडेंस और भविष्य की उम्मीद आंसुओं से धुंधली पड़ने लगी। किसी तरह से ख़ुद को छुड़ाकर जब वह वहां से भागने लगी तो पीछे से क़हक़हा लगाते हुए आयोजक की आवाज़ उसके कानों को सुनाई दी, “किसी को बताया तो कहीं मुंह दिखाने लायक़ नहीं बचोगी।”

उसे कुछ समझ नहीं आ रहा था। वह घनघोर काली रात में बस दौड़ती जा रही थी। दो रास्ते थे उसके सामने, एक यह कि वह सीधा घर चली जाए, किसी को कुछ ना बताए और वर्ल्ड बेस्ट आर्टिस्ट बनने का सपना बुनते हुए उस आयोजक की प्रताड़ना झेलती जाए। दूसरा कि वह सीधा पुलिस स्टेशन जाए और उस आदमी के ख़िलाफ़ शिकायत दर्ज कराए। पांच मिनट तक भागने के बाद उसने आसमान की ओर देखा। यूं तो काली घनघोर रात थी लेकिन कहीं से एक तारे की चमक दिखाई पड़ी और उसने उस चमक के धुंधलाने से पहले दूसरा रास्ता चुन लिया।

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