ग्राउंड रिपोर्ट : BHU में मुस्लिम होने के कारण नौकरी छोड़ने पर मजबूर बगरू के फिरोज खान

ग्राउंड रिपोर्ट जनमानस राजस्थान के पत्रकार अवधेश पारीक और उनकी टीम ने फ़िरोज़ खान के गांव जयपुर स्थित बगरू में जाकर की है।

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हमारे देश की बुनियाद भारतीय संविधान के हर पन्ने के एक-एक शब्द में दर्ज है, एक संवैधानिक देश होने के नाते यहां हर एक नागरिक को समान अधिकार मिले हैं तो हर किसी को समान अवसर की आजादी है। लेकिन जब संवैधानिक बराबरी की धज्जियां देश के एक ऐसे विश्वविद्यालय में उड़ाई जाए जिसकी हवा में बौद्धिकता पसरे होने का दावा किया जाता है तो सवाल उठना लाजमी है।

जी हां, हम बात कर रहे हैं काशी हिंदू विश्वविद्यालय यानि बीएचयू जो इन दिनों सुर्खियों में है, वजह यह है कि वहां के छात्र एक प्रोफेसर की नियुक्ति का इसलिए विरोध कर रहे हैं क्योंकि वह मुस्लिम समुदाय से है।

दरअसल बीएचयू के “संस्कृत विद्या धर्म विज्ञान संकाय जिसमें प्राचीन शास्त्रों, संस्कृत साहित्य, ज्योतिष और वेदों की पढ़ाई करवाई जाती है, में जयपुर के बगरू के रहने वाले फिरोज खान की असिस्टेंट प्रोफेसर पद पर नियुक्ति 5 नवंबर, 2019 को हुई.

जिसके बाद से विभाग के कुछ छात्र पिछले 10 दिनों से धरने पर बैठे हैं। छात्रों ने इस नियुक्ति को यूजीसी या विश्वविद्यालय के नियम नहीं बल्कि महामना मदन मोहन मालवीय के नियमों के खिलाफ बताया।

जनमानस राजस्थान की टीम पहुंची फिरोज खान के गांव बगरू

जयपुर से महज 30 किलोमीटर दूर सड़क के रास्ते जब हम बगरू पहुंचे तो वहां बस स्टैंड पर ही मकान पूछते ही लोगों ने घर का रास्ता बता दिया। घर पहुंचे तो देखा वहां मीडिया का मजमा लगा है. पत्रकारों की भीड़ घर की दीवारों से फिरोज खान और उनके पिता रमजान खान को खोज रही थी।

फिरोज खान का घर
फिरोज खान और उनके पिता से हमारी बात नहीं हो पाई, उन्होंने ऐसे माहौल में मीडिया से पूरी तरह दूरी बना रखी है।

फिरोज खान के छोटे भाई शकील खान इस पूरे मामले पर कहते हैं, “हमारे परिवार वालों को तो यह समझ नहीं आ रहा कि यह विरोध क्यों हो रहा है. हम गांव में इतने सालों से रह रहे हैं लेकिन कभी मुस्लिम होने का एहसास नहीं हुआ, लेकिन अब मेरे भाई के साथ जो हो रहा है वो वाकई बहुत दुखद है”।

वहीं बगरू के रहने वाले कुछ लोकल का इस पूरे मामले पर कहना है कि, फिरोज और उनका परिवार सालों से यहां रह रहा है, इनके पिता रमजान हर हिंदू कार्यक्रम और मंदिरों में आते-जाते रहते हैं, सभी मिलजुल कर रहते हैं. हमें कभी नहीं सोचा कि ये मुस्लिम हैं।

फिरोज के पिता रोज जाते हैं गौशाला

फिरोज खान के पिता रमजान खान को गांव में सभी “मुन्ना मास्टर” के नाम से जानते हैं. उन्होंने भी संस्कृत में ग्रेजुएशन (शास्त्री) किया हुआ है. वो मंदिरों में भजन-कीर्तन गाने जाते हैं और हारमोनियम भी बजाते हैं. वहीं रोज एक चक्कर गांव की गौशाला का लगाते हैं।

बगरू की चैतन्यधाम रामदेव गौशाला संभालने वाले बनवारी लाल शर्मा इस पूरे मामले पर कहते हैं कि, “यहां का माहौल बीएचयू में जो हो रहा है उससे एकदम अलग है। रमजान खान रोज यहां आते हैं और गायों की सेवा करते हैं”।

जनमानस की टीम उस स्कूल भी पहुंची जहां फिरोज खान ने संस्कृत की शुरूआती शिक्षा हासिल की. वहां जाने पर पता चला गांव के राजकीय वरिष्ठ उपाध्याय संस्कृत विद्यालय से प्रोफेसर फिरोज खान ने 5वीं क्लास से संस्कृत पढ़ना शुरू किया।

वहीं जयपुर के राष्ट्रीय संस्कृत शिक्षा संस्थान से एमए और पीएचडी की पढ़ाई पूरी की। फिरोज को संस्कृत दिवस (14 अगस्त) पर राज्य स्तरीय संस्कृत युवा प्रतिभा सम्मान से भी नवाजा जा चुका है।

कुछ दिन पहले जब मामले ने तूल पकड़ा तब फिरोज के पिता रमजान खान ने मीडिया से बात की थी. उस दौरान उनका कहना था कि, “जब मुझे पता चला कि मेरे बेटे की नियुक्ति प्रतिष्ठित विश्वविद्यालय में हुई है तो मुझे बेहद खुशी हुई. अब छात्रों का विरोध प्रदर्शन काफी दुर्भाग्यपूर्ण है. मैं प्रदर्शनकारी छात्रों से अपील करता हूं कि वह मेरे बेटे को एक मौका दें और जानें कि वह किस तरह के बैकग्राउंड से आता है.”

अपनी बात में आगे जोड़ते हुए रमजान कहते हैं, “मेरा बेटा संस्कृत सीखना चाहता था, इसलिए मैंने उसका स्कूल में एडमिशन कराया. जिसके बाद उसने संस्कृत में ही सारी पढ़ाई की और बीएचयू में नियुक्ति हासिल की”।

क्या कहते हैं बीएचयू के वाइस चांसलर ?

इस पूरे विवाद पर बीएचयू प्रशासन शुरू से ही फिरोज खान के साथ है. वहां के वाइस चांसलर जस्टिस गिरधर माल्वीय का कहना है कि, छात्रों का यह कदम गलत है. BHU के संस्थापक, मदन मोहन मालवीय की सोच व्यापक थी. यदि वह आज होते तो इस नियुक्ति का समर्थन ही करते।

इसके अलावा बीएचयू के चीफ प्रॉक्टर ओपी राय ने कहा कि फिरोज खान की नियुक्ति में विश्वविद्यालय ने सभी नियमों का पालन किया गया है। फैसला वापस लेने का कोई सवाल नहीं उठता है।

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