उपेक्षित समुदाय और इतिहास लेखन

भारतीय उपमहाद्वीप में इतिहास लेखन का विश्लेषण करते समय पता चलता है कि औपनिवेशिक दृष्टिकोण भारतीय इतिहासकारों की विभिन्न धाराओं पर गहरा प्रभाव डालता है । औपनिवेशिक शक्तियों और आज तक की शासन करने वाली शक्तियों के बीच प्रभुत्व के संघर्ष के बाद से इसका एक लंबा इतिहास है। इस मौके पर मूलभूत प्रश्न उठता है कि "भारतीय इतिहास को सामाजिक व राजनीतिक परिदृश्य में प्रभुत्व और आधिपत्य के कलाकारों द्वारा किस प्रकार देखा गया ?

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इतिहास जैसा कि जाना जाता है , अतीत के बारे में संग्रहित किया गया ज्ञान अथवा जानकारी है ।अतीत स्पष्ट रूप से इस अर्थ में ऐतिहासिक है कि वर्तमान उसे विशिष्टता और वैधता की दृष्टि से देखता है । इस प्रकार इतिहास लेखन अतीत की घटनाओं को पूरी निष्पक्षता और वर्तमान प्रसांगिकता के साथ वर्तमान में प्रस्तुत करना है । आधुनिकता के संवाद ने अपनी निष्पक्षता एवं सकारात्मकता के माध्यम से सत्ता क्षेत्र के तहत अतीत की विरासत को संजोते हुए , इतिहास लेखन पर काफ़ी हद तक प्रभाव डाला है । सत्ता और ज्ञान के आंतरिक संबंधों ज्ञान को बहुतायत को जन्म दिया है जो कि औपनिवेशिक शक्तियों और शाही अभिजात वर्ग के लिये लाभदायक सिद्ध हुआ है। इसलिये, ज्ञान का उत्पादन, जीवित औपनिवेशिक इतिहास की कीमत पर, अभिजात वर्ग की उद्यमिता बन गया। औपनिवेशिक शक्ति संरचना ने ओरेंटलिस्म के स्पष्ट उद्देश्यों और अन्य को समझने के साथ यूरो-केंद्रित ज्ञान वाद की ऐनक के तले अपने विषयों के इतिहास तैयार करने के कई प्रयास किये। जैसा कि एडवर्ड सईद कहता है “हर ज्ञान एक व्याख्या है” । बीसवीं शताब्दी के विद्वानों ने ज्ञान के क्षेत्र में सत्ता और अधिपत्य की पद्धिति को सामने लाने की कोशिश की ।
भारतीय उपमहाद्वीप में इतिहास लेखन का विश्लेषण करते समय पता चलता है कि औपनिवेशिक दृष्टिकोण भारतीय इतिहासकारों की विभिन्न धाराओं पर गहरा प्रभाव डालता है । औपनिवेशिक शक्तियों और आज तक की शासन करने वाली शक्तियों के बीच प्रभुत्व के संघर्ष के बाद से इसका एक लंबा इतिहास है। इस मौके पर मूलभूत प्रश्न उठता है कि “भारतीय इतिहास को सामाजिक व राजनीतिक परिदृश्य में प्रभुत्व और आधिपत्य के कलाकारों द्वारा किस प्रकार देखा गया ?
“व्यापक स्तर पर हम इन दृष्टिकोणों को भारतीय इतिहास के तीन पहलुओं में ढूँढ़ सकते :-

  1. औपनिवेशिक आधिपत्य के बाद से शक्ति अभिजात वर्ग का राजनीतिक प्रभुत्व
  2. हाशिये पर पड़े समुदायों के विविध इतिहास की उपेक्षा और
  3. लोगों की जीवित बहुलवादी इतिहास का शोषण/उपेक्षा

इन तीन पहलुओं के माध्यम से जटिल व् महत्वपूर्ण ऐतिहासिक घटनाओं का एक बड़ा हिस्सा मुख्यधारा इतिहास लेखन से अलग कर दिया गया और इतिहास शास्त्र सत्ता को बरक़रार रखने हेतु एक प्रचार माध्यम बन गया।
इन दृष्टिकोणों ने औपनिवेशिक संघर्ष की अवधि के दौरान भारतीय इतिहास की विवादस्पद वाचन बढ़ाने में काफ़ी योगदान दिया और यह विभिन्न विचारधारात्मक दृष्टिकोण रखने वाले इतिहासकारों के लेखन में आज भी मौजूद है ।
स्वतंत्र भारत के इस युग में हम भारतीय अतीत की एतिहासिकता के आसपास उभरते विभिन्न संवादों को देख रहे है, विशेष रूप से राजनीतिक हिंदुत्व की ओर से। मौजूदा परिदृश्य इतिहास और इतिहास लेखन के दायरे में अन्तर्निहित स्पष्ट परिप्रेक्षय के साथ भारतीय इतिहास के स्वभाव के विरुद्ध खड़े होने के लिये मजबूर करता है। लंबे समय तक बाक़ी रहने वाले कुछ ऐतिहासिक सन्दर्भों को चुनौती दी गयी है और अन्य सत्तारूढ़ शासनों के हाथों में प्रतिमान परिवर्तनों। के माध्यम से गुजरते है । पौराणिक कथाओं और काल्पनिक कहानियों के साथ एतिहासिक तथ्यों को पुनः पेश किया जाने के प्रयास होते हैं । इतिहास और इतिहास की पाठ्यपुस्तकों के पाठ्यक्रम में मध्यकालीन भारत के इतिहास से सम्बंधित बहुत सी झूठी जानकारियां व ग़लत धारणाएं फैलाई गयी हैं जबकि प्राचीन भारत के एक काल्पनिक ‘स्वर्णिम युग’ को खूब बढ़ा चढ़ा कर पेश किया गया है। इसे केवल गंभीर अकादमिक प्रयासों के साथ साथ जवाबी विवरण के वैकल्पिक दृष्टिकोण विकसित करके ही पुनःनिर्मित किया जा सकता है । इस दिशा में किये जाने वाले प्रयासों को, हाशिये पर पड़े समुदायों के विविध इतिहास को आगे बढ़ाने व लोगों के समेकित/बहुलवादी इतिहास को स्वीकार करने के लिए हिंदुत्व एजेंडे के राजनीतिक व जागरूक शैक्षणिक परिपेक्ष के माध्यम को समझ कर इतिहास से संबंध बनाना चाहिये।

हिंदुत्व एजेंडे को पोषित करने वाले प्रोपगण्डे से निपटने के लिये भारतीय इतिहास लेखन की विभिन्न धाराओं में होने वाली असंगतता का एहसास हमें इतना प्रेरित करना चाहिये कि हम भारत भारत के हाशिये पर पड़े समुदायों जैसे मुसलमान, दलित, आदिवासी, ईसाई एवं अन्य अल्पसंख्यक वर्गों के ऐतिहासिक संघर्ष को जानने व उस तक पहुँचने की कोशिश करें। स्थानीय लोगों व उनके समूहों के विविध जीवित इतिहास का विश्लेषण इतिहास के दायरे में करके सामने लाया जा सकता है । ऐसे लोगों एवं समूहों का इतिहास उनके अस्तित्व के सामाजिक, आर्थिक, शैक्षणिक मॉडलों से समृद्ध होना चाहिए। कला, वास्तुकला, साहित्य व अन्य सांस्कृतिक क्षेत्रों में उनका योगदान उनके दैनिक जीवन को बेहतर बनाने के संघर्ष का एक हिस्सा है।

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