अगर आपको मुफ़्त में कुछ मिल रहा है, तो प्रोडक्ट आप हैं!

एक आम इंसान का यह तर्क हो सकता है कि उसके पास छुपाने जैसा कुछ नहीं है या वह सोशल मीडिया पर जो कुछ भी करता है उसे कोई और जान ले तो उसे फ़र्क नहीं पड़ेगा लेकिन यह बात समझने की ज़रुरत है कि आपके पास छुपाने के लिए भले ही बहुत कुछ न हो लेकिन दिखाने के लिए बहुत कुछ है।

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इंटरनेट, 2 जी सोशल नेटवर्किंग, वेबसाइट्स इत्यादि वही शब्द हैं जिन्हें 20वीं सदी के अंत में हमारे सामाजिक परिवेश में जगह मिली। इसी श्रृंखला में अब “डेटा प्राइवेसी” (Data Privacy) नाम का एक और शब्द जुड़ गया है जो आजकल चर्चा का विषय बना हुआ है।

एक आम इंसान के लिए इसे समझना जितना जटिल हो सकता है उससे कहीं ज़्यादा जटिल इस डेटा को नियंत्रित करना है। 2020 में आई फ़ेसबुक की एक रिपोर्ट के मुताबिक हर 1 मिनट में फ़ेसबुक पर 1,36,000 फ़ोटो अपलोड होती हैं और लगभग 5,10,000 कमेंट्स पोस्ट होते हैं। इसे प्रोसेस करना और इसे स्टोर करना कितना पेचीदा हो सकता है इसका अंदाज़ा लगाना बहुत मुश्किल नहीं है।

आपके बारे में हर वो जानकारी या आकलन बजाये इसके कि वह उपयोगी है या व्यर्थ, आपका प्राइवेट डेटा कहलाता है। आपकी पैदाइश की जगह, उसका दिन, मोबाइल नंबर या ई-मेल, यहां तक कि आपकी पसंद-नापसंद भी आपका प्राइवेट डेटा है।

फ़ेसबुक और अन्य सोशल मीडिया माध्यमों का ग़लत इस्तेमाल हमेशा से ही चर्चित मुद्दा रहा है। अमरीकी चुनाव हो या रोहिंग्या मुसलमानों का नरसंहार, फ़ेसबुक को सीनेट से लेकर संयुक्त राष्ट्र में अपनी भूमिका और ग़ैर-ज़िम्मेदार रवैये के लिए खरी-खरी सुननी पड़ी है। सोशल मीडिया और इंटरनेट के ग़लत इस्तेमाल में “प्राइवेट डेटा की गोपनीयता” की बहस एक नया नुक्ता है जो की पिछले दशक के अंत में ही आम हुआ है। हाल ही में कुछ महीनों पहले साइबर सिक्योरिटी विशेषज्ञ एलन गाल ने ट्वीट कर इस बात का ख़ुलासा किया था कि लगभग 100 देशों के 53 करोड़ फ़ेसबुक यूज़र्स का मोबाइल नंबर, रिलेशनशिप स्टेटस, लोकेशन, फ़ेसबुक से जुड़ने की तारीख़ आदि जानकारियां वेबसाइट्स पर आसानी से उपलब्ध हैं। इन यूज़र्स में भारत के 60 लाख से ज़्यादा लोग शामिल हैं। ग़ौरतलब है कि यह वही डेटा है जो साल 2019 में भी लीक हो चुका है और जिसकी ख़रीद-फ़रोख़्त टेलीग्राम मेसेजिंग ऐप के ज़रिये पहले की जाती रही है, जिसके जवाब मे फ़ेसबुक ने अपनी इस ग़लती को सुधारने का दावा भी किया था लेकिन अब इस डेटा को कोई भी मुफ़्त में वेबसाइट्स के ज़रिये डाउनलोड कर सकता है।

डेटा प्राइवेसी ज़रूरी क्यों है?

इंटरनेट इस्तेमाल करने वाले एक आम इंसान का यह तर्क हो सकता है कि उसके पास छुपाने जैसा कुछ नहीं है या वह सोशल मीडिया पर जो कुछ भी करता है उसे कोई और जान ले तो उसे फ़र्क नहीं पड़ेगा लेकिन यह बात समझने की ज़रुरत है कि आपके पास छुपाने के लिए भले ही बहुत कुछ न हो लेकिन दिखाने के लिए बहुत कुछ है। आपके डेटा में दिलचस्पी रखने वाले आपके द्वारा किये जाने वाले सही और ग़लत में दिलचस्पी नहीं रखते बल्कि उनका मक़सद आपको जानने और समझने का है। आपकी पसंद-नापसंद को अपने मुनाफ़े के लिए इस्तेमाल करना और आपकी इच्छाओं को एल्गोरिदम के ज़रिये पहले से भांप कर अपने मुताबिक ढालने का है।

2016 में हुए अमरीकी राष्ट्रपति चुनाव में भी फ़ेसबुक अपनी पॉलिसियों को लेकर विवादों में रहा जिसके परिणामस्वरूप ख़ुद मार्क ज़ुकरबर्ग को अमरीकी सीनेट में आकर सफ़ाई पेश करनी पड़ी। फ़ेसबुक पर यह आरोप था कि उसने तक़रीबन 150 कम्पनियों को फ़ेसबुक इस्तेमाल करने वाले लोगों का प्राइवेट डेटा बेचा। रिपब्लिकन पार्टी के उम्मीदवार डोनाल्ड ट्रम्प पर यह आरोप लगा कि उन्होंने पॉलिटिकल कंसल्टिंग फ़र्म कैंब्रिज अनेलिटिका को नियुक्त कर मतदाताओं को रिझाने और उन्हें अपने पक्ष में लाने के लिए प्रोपेगैंडा के लिए फ़ेसबुक का इस्तेमाल किया। कैंब्रिज अनेलिटिका ने राष्ट्रपति चुनाव के लिए तक़रीबन 9 करोड़ लोगों के प्राइवेट डेटा को हार्वेस्ट किया जिसको बाद में फ़ेसबुक ने स्वीकार भी किया। 2016 चुनाव में डोनाल्ड ट्रम्प की जीत इस बात की पुष्टि करती है कि यह तरीक़ा किस हद तक लोगों पर असर करके परिणाम को प्रभावित कर सकता है।

भारतीय कंपनियां भी डेटा बेचने की दौड़ में आगे

एक और चौंकाने वाली घटना जो डेटा की गोपनीयता के सिलसिले में हमें देखने को मिलती है वो है गुरुग्राम में स्थित डिजिटल भुगतान करने वाली कंपनी मोबिक्विक की। इस कंपनी की सेवाओं का इस्तेमाल करने वाले लगभग 10 करोड़ लोग अपने निजी डेटा की गोपनीयता खो चुके हैं। हालांकि यह डेटा पहले ही लीक हो चुका था लेकिन मामले पर चर्चा तब शुरू हुई जब यह डेटा डार्कवेब पर बिकने के लिए आया। इस डेटा का लीक होना एक बहुत बड़ा सवालिया निशान खड़ा करता है कि जो कंपनी लोगों को डिजिटल पैसे के लेनदेन की सेवा मुहैया करा रही है वो उनके डेटा के साथ इतनी लापरवाह कैसे हो सकती है? यह इतना आसान है कि अब कोई भी शख़्स कुछ चुनिंदा वेबसाइट्स पर जाकर इस डेटा को हासिल कर सकता है।

डेटा नियंत्रण की ज़िम्मेदारी किसकी?

जिस टेक्नोलॉजी से हम जुड़े हुए हैं उसके दुष्परिणामों को नियंत्रित करना तो दूर, लोग अभी इसी कशमकश में हैं कि उसका इस्तेमाल किस तरह किया जाए! इतिहास इस बात का गवाह है कि इंसान आविष्कार करने में जितना सफल रहा है उससे कहीं ज़्यादा उसे इस्तेमाल करने में असफल। जहां एक तरफ़ यह बहस भी शुरू हो रही है कि क्या आपका डेटा महज़ एक जानकारी है या आपकी प्रॉपर्टी जिसे ख़रीदा या बेचा जा सकता है, वहीं एक तरफ़ पर्सनल डेटा प्रोटेक्शन बिल भारतीय संसद में 2019 से पेंडिंग है। सवाल अब भी बरक़रार है कि क्या यह बिल पर्सनल डेटा की गोपनीयता को उच्चतम न्यायालय के पुट्टुस्वामी बनाम भारतीय संघ 2017 में लिए गए फ़ैसले के मुताबिक़ होगा जिसमें नागरिक की जानकारी की गोपनीयता को उसका मौलिक अधिकार स्वीकार किया गया है।

नये आईटी नियम और गोपनीयता

नये आईटी नियमों का पालन करते हुए गूगल, फ़ेसबुक और इंस्टाग्राम ने हाल ही में अपनी पहली अनुपालन रिपोर्ट सरकार को सौंप दी है। इस रिपोर्ट के मुताबिक़ फ़ेसबुक ने भारत में 15 मई से 15 जून‌ 2021 के बीच 10 उल्लंघन श्रेणियों में तीन करोड़ से अधिक सामग्रियों पर ‘कार्रवाई’ की। वहीं इंस्टाग्राम ने इस दौरान नौ श्रेणियों में उसके प्लेटफ़ॉर्म पर डाली गई 20 लाख सामग्रियों के ख़िलाफ़ कार्रवाई की है।

नये आईटी नियमों को जहां अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता के लिए एक ख़तरे के रूप में देखा जा रहा है और ट्विटर तथा सरकार के बीच विवाद बरक़रार है, व्हाट्सएप्प जिस पर फ़ेसबुक मालिकाना हक़ रखता है, नये आईटी नियमों के ख़िलाफ़ दिल्ली हाइकोर्ट में केस दायर कर चुका है। व्हाट्सएप्प की इस याचिका का आधार उच्चतम न्यायालय के पुट्टुस्वामी बनाम भारतीय संघ 2017 का वही फ़ैसला है जिसमे जानकारी की गोपनीयता को नागरिकों का मौलिक अधिकार बताया गया है।

व्हाट्सएप्प मानता है कि नए आईटी नियम नागरिकों की गोपनीयता के अधिकार का उल्लंघन करते है। व्हाट्सएप्प का कहना है कि वह यूज़र्स की गोपनीयता बनाये रखने के लिए एन्ड टू एन्ड एन्क्रिप्शन प्रणाली का इस्तेमाल करता है जिसके मुताबिक़ वह यूज़र्स द्वारा साझा किये गए मैसेज, फ़ोटो, वीडियो आदि को नहीं देख सकता है। नये आईटी नियम उसके इस तरीक़े के ख़िलाफ़ हैं और इससे व्हाट्सएप्प काफ़ी हद तक असुरक्षित हो जायगा जिसका ख़ामियाज़ा आम नागरिकों को भुगतना पड़ेगा।

क्या है उपाय?

अगर आप वाक़ई अपने डेटा के लिए चिंतित हैं तो आपको चाहिए कि आप अपना डेटा किसी वेबसाइट या सोशल मीडिया पर साझा ही न करें और अगर आप सोशल मीडिया पर हैं और उसका ज़्यादा इस्तेमाल नहीं करते हैं तो बेहतर है कि आप उसे डिलीट कर दें। लेकिन अगर सोशल मीडिया आपके लिए बहुत ज़रूरी है तो आप कुछ उपाय कर सकते हैं। अगर आपको लगता है कि आपका डेटा भी लीक हो गया है तो आप haveibeenpwned.com नाम की इस वेबसाइट पर जा कर देख सकते हैं कि आपका अकाउंट इस वेबसाइट पर उपलब्ध लिस्ट में है या नहीं! पाये जाने पर आप उस अकाउंट का पासवर्ड बदल दें और two factor authentication को चालू कर दें।

पासवर्ड

जब सवाल गोपनीयता का हो तो आपका पासवर्ड बहुत महत्वपूर्ण इकाई है। आम तौर पर हम जो पासवर्ड इस्तेमाल करते हैं उनका कुछ-न-कुछ मतलब होता है लेकिन इन पासवर्ड्स को तोड़ना बहुत आसान होता है। आपका पासवर्ड उन अंकों और शब्दों का संयोजन होना चाहिए जिन्हें जोड़ने पर कोई मतलब न निकलता हो। अगर आपने अपनी जन्मतिथि या मोबाइल नंबर को अपने पासवर्ड में इस्तेमाल कर रखा है तो उसे तुरंत बदल दें। आप अपने लिए मज़बूत पासवर्ड बनाने के लिए 1Password या LastPass जैसे एप्प्स का इस्तेमाल कर सकते है।

बदल दीजिये अपना सर्च-इंजन और ब्राउज़र

जब भी हमें इंटरनेट पर किसी वेबसाइट पर जाना होता है तो हम ज़्यादातर Google और Chrome ब्राउज़र का इस्तेमाल करते है। यह ब्राउज़र इस्तेमाल करने के लिए आसान तो है लेकिन इस पर जो कुछ भी आप करते हैं उसे Cache डेटा के रूप में Google तीसरी पार्टी को बेच सकता है जिसका इस्तेमाल यह कंपनी आपको अपनी सेवा और प्रोडक्ट का विज्ञापन दिखा कर करती है। इसीलिए जब भी आप अमेज़न की वेबसाइट पर कोई प्रोडक्ट देखते हैं तो फ़ेसबुक और यूट्यूब पर उसके विज्ञापन स्वत: आपके पास आने लगते है। आप अपना ब्राउज़र Brave Browser या Safari Browser और सर्च इंजन को Duck Duck Go या Qwant से बदल कर इस समस्या से बहुत हद तक बच सकते हैं।

डेटा की गोपनीयता अभी भी एक बहुत पेचीदा मसला है। आम इंसान और सरकार को अभी सिर्फ़ इसे समझने के लिए ही वक़्त दरकार है। इसे नियंत्रित करना, इसके दुरुपयोग को रोकने के लिए मज़बूत क़ानून और रणनीति बनाना अभी बहुत मुश्किल है। जब तक इस पर कोई ठोस क़दम नहीं उठाया जाता, आप अपने आपको और अपने दोस्तों और परिवार को इसके बारे में जागरूक कर सकते हैं और इंटरनेट के इस्तेमाल में की गई अभी तक की लापरवाही में सुधार की कोशिश कर सकते हैं और यह विचार कर सकते है कि जिन सोशल मीडिया वेबसाइट्स का इस्तेमाल आप मुफ़्त में कर रहे हैं तो क्या आपको वाकई कुछ मुफ़्त में मिल रहा है या आपको बदले में कुछ देना पड़ रहा है?

– बिलाल मुहम्मद

(लेखक पत्रकारिता के छात्र हैं।)

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