साख को बरक़रार रखने की चुनौती से जूझता भारतीय लोकतंत्र

15 सितंबर 2021, अंतर्राष्ट्रीय लोकतंत्र दिवस के अवसर पर भारत मे लोकतांत्रिक उतार-चढ़ाव पर एक नज़र

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होरेस अलेक्ज़ेंडर ‘गार्जियन’ के संवाददाता के रुप में 1977 के आम चुनाव को कवर कर रहे थे, उन्होंने न्यूयॉर्क टाइम्स में छपे अपने एक पत्र में लिखा कि,

इस चमत्कारी चुनाव ने यह साबित किया कि भारतीय जनता में राजनीतिक साहस की कोई कमी नहीं है। यह राजनीतिक साहस उसे गांधी जी के व्यक्तित्व और अपने स्वतंत्रता संग्राम की विरासत से मिला है।”

आज जबकि हम अंतर्राष्ट्रीय लोकतंत्र दिवस मना रहे हैं तो ऐसे में यह देखना ज़रूरी है कि अलेक्ज़ेंडर की बात आगे चलकर कितनी सच साबित हुई! ध्यान रहे कि होरेस अलेक्ज़ेंडर सन् 1977 की बात कर रहे थे, जबकि उससे पहले सन् 1975 के आपातकाल को भारतीय लोकतंत्र के काले अध्याय के रूप में याद किया जाता है। 1977 के चुनाव को देखते हुए अलेक्ज़ेंडर ने भारतीय लोकतंत्र के स्वर्णिम अध्याय की भविष्यवाणी कर दी थी। तब से लेकर आज तक लोकतंत्र का चरित्र काफ़ी हद तक बदल गया है। यह जैसा दिखता है, वास्तव में अंदर से वैसा है नहीं।

आज़ादी के शुरुआती दो दशकों तक भारत कमोबेश एक संवैधानिक लोकतंत्र था, जब संसद में ज़रूरी बहसों और संशोधनों के बाद उन राजनीतिक दलों द्वारा क़ानूनों को पारित किया जाता जो स्वयं भी सुनिश्चित नियमों के तहत चलते थे। आज़ादी के बाद के तीसरे और चौथे दशक संक्रमण के दशक थे, जब सत्ताधारी कांग्रेस ने संविधान में संशोधन करके अपने आपको और भी अधिक क्षमतावान बनाने का प्रयास किया। उस समय यह पार्टी आंतरिक लोकतंत्र की व्यवस्था से हटकर एक सर्वाधिकार संपन्न नेता के अधीन जाती दिखी। इसके जवाब में विपक्ष ने भी संवैधानिक प्रावधानों से बाहर विरोध करना शुरू कर दिया और देशव्यापी आंदोलन करके एक चुनी हुई सरकार और उसकी सत्ता को अप्रभावी बनाने का प्रयास किया।

बहुत पहले ही सन् 1949 में संविधान सभा में दिए गए अपने अंतिम भाषण में बाबा साहब भीमराव अंबेडकर ने अपील की थी कि भारत में विवादास्पद मुद्दों को संवैधानिक प्रावधानों के तहत सुलझाया जाना चाहिए न कि व्यापक विरोध के द्वारा। उन्होंने नेताओं के प्रति भक्तिभाव के ख़िलाफ़ भी चेतावनी ज़ाहिर की थी जिसमें किसी नेता को इतना ऊंचा मान लिया जाता है कि वह हमेशा आलोचना से ऊपर दिखने लगता है।

इतिहासकार रामचंद्र गुहा अपनी किताब ‘भारत : नेहरू के बाद’ में लिखते हैं कि आज़ादी के इतने वर्षों बाद भी भारत एक लोकतंत्र बना हुआ है लेकिन पिछले दशकों में हुई घटनाएं इसके लिए एक नए विशेषण की मांग करती हैं। भारत अब केवल एक संवैधानिक लोकतंत्र नहीं रह गया है, बल्कि एक लोकलुभावन लोकतंत्र में तब्दील हो चुका है।

भारत में अब लोकतंत्र कितना शक्तिशाली रह गया है इसका जवाब कुछ समय पहले आयी दो विदेशी रिपोर्टों से पता चलता है। अमेरिकी के ‘फ़्रीडम हाउस’ और स्वीडन के ‘वी-डेम इंस्टीट्यूट’ ने अपनी रिपोर्ट में भारतीय लोकतंत्र की पड़ताल करते हुए यह चिंता व्यक्त की थी कि भारत में अब लोकतन्त्र कमज़ोर हो चुका है। वी-डेम की रिपोर्ट में कहा गया है कि भारत दुनिया के सबसे बड़े लोकतंत्र से चुनावी तानाशाही वाले देश में बदल गया है। रिपोर्ट में भारत को हंगरी और तुर्की के साथ रखा गया है और कहा गया है कि देश में लोकतन्त्र के कई पहलुओं पर प्रतिबंध लगा दिया गया है। रिपोर्ट कहती है, “सेंसरशिप के मामले में भारत, पाकिस्तान के जैसा तानाशाह देश हो गया है और उसकी स्थिति पड़ोसी देशों जैसे बांग्लादेश और नेपाल से भी बदतर हो गयी है।” वी-डेम इंस्टीट्यूट के अधिकारी कहते हैं कि इस रिपोर्ट को तैयार करते समय वैश्विक मानक और स्थानीय जानकारियों का ध्यान रखा गया है। इंस्टीट्यूट का दावा है कि उनकी ये रिपोर्ट बाक़ी रिपोर्टों से अलग है क्योंकि ये जटिल डेटा पर आधारित है।

फ़्रीडम हाउस ने भी अपनी रिपोर्ट में इसी तरह की बात कही थी। ‘2021 में विश्व में आज़ादी-लोकतंत्र की घेराबंदी’ शीर्षक से जारी की गई इस रिपोर्ट में कहा गया था कि ऐसा लगता है कि भारत ने वैश्विक लोकतांत्रिक नेता के रूप में नेतृत्व करने की क्षमता को त्याग दिया है। इस एनजीओ ने 2018, 2019 और 2020 में भारत को ‘आज़ाद’ देशों की सूची में रखा था, हालांकि तब‌ भी भारत 77 से गिरकर 71 अंक पर आ गया था लेकिन ताज़ा रिपोर्ट में भारत 100 में से 67 अंक ही हासिल कर सका है और इसे ‘आंशिक आज़ाद’ देश की रैंक दी गई है।

फ़्रीडम हाउस ने अपनी रिपोर्ट में कहा था कि 2014 के बाद से ही भारत में राजनीतिक अधिकारों और लोगों की आज़ादी के मामले में स्थिति ख़राब हुई है। इसके पीछे मानवाधिकार संगठनों पर बढ़ता दबाब, पढ़े-लिखे लोगों और पत्रकारों को धमकियां मिलने और मुसलमानों पर धार्मिक कट्टरता वाले हमलों की बढ़ती घटनाओं को कारण बताया गया है। इसके अलावा सीएए का विरोध करने वाले प्रदर्शनकारियों और आलोचना करने वाले पत्रकारों को निशाना बनाने को भी इसका कारण बताया गया है।

इन रिपोर्ट्स पर प्रतिक्रिया देते हुए कांग्रेस नेता राहुल गांधी ने कहा था कि भारत अब लोकतांत्रिक देश नहीं रहा। सरकार की इन रिपोर्ट्स पर कोई आधिकारिक प्रतिक्रिया तो नहीं आई लेकिन इंडिया टुडे कॉन्क्लेव में विदेश मंत्री एस जयशंकर ने कहा था कि, आप जिन रिपोर्ट्स की बात कर रहे हैं उनमें लोकतंत्र और निरंकुश शासन की बात नहीं है, वह पाखंड है। दरअसल, कुछ लोग हैं जिन्होंने ख़ुद को दुनिया का रक्षक घोषित कर दिया है, अगर चीज़ें उनके हिसाब से नहीं होती तो उन्हें तकलीफ़ होती है। हमें किसी से सर्टिफिकेट लेने की‌ ज़रूरत नहीं है।”

जब उनसे पूछा गया कि अंतर्राष्ट्रीय स्तर पर ऐसी छवि बन रही है कि नरेंद्र मोदी के शासनकाल में भारत में लोकतंत्र कमज़ोर हुआ है, तो विदेश मंत्री ने इसके जवाब में कहा, वे बीजेपी को हिंदू राष्ट्रवादी पार्टी कहते हैं। हम राष्ट्रवादी हैं और हमने 70 देशों में वैक्सीन पहुंचाई है जो ख़ुद को अंतरराष्ट्रीयवादी कहते हैं उन्होंने कितने देशों को अपनी वैक्सीन दी?” स्पष्ट है कि विदेश मंत्री ने बिना किसी आकलन के इन रिपोर्ट्स को झुठला दिया। जबकि देश में गौरक्षा के नाम पर हमले, मॉब लिंचिंग जैसी घटनाएं अब सामान्य होती जा रही हैं।

हाल ही में कांग्रेस नेता राहुल गांधी ने एक वीडियो शेयर कर सवाल किया कि “संविधान का अनुच्छेद 1525 भी बेच दिए?” इस वीडियो में दिख रहा है कि एक आदिवासी युवक को घसीटा जा रहा है तो वहीं एक कबाड़ वाले से जबरन जय श्रीराम के नारे लगवाने की कोशिश की जा रही है।

भारतीय संविधान में सभी नागरिकों को बिना किसी भेदभाव के मौलिक अधिकार दिए गए हैं। इन अधिकारों का उद्देश्य है कि हर नागरिक सम्मान के साथ अपना जीवन जी सके और किसी के साथ किसी आधार पर भेदभाव न हो। अनुच्छेद 15 (1) के मुताबिक़ राज्य किसी भी नागरिक के साथ जाति, धर्म, लिंग, जन्म स्थान और वंश के आधार पर भेदभाव नहीं कर सकता। अनुच्छेद 15 के दूसरे क्लॉज़ के मुताबिक़, किसी भी भारतीय नागरिक को जाति, धर्म, लिंग, जन्म स्थान और वंश के आधार पर दुकानों, होटलों, सार्वजानिक भोजनालयों, सार्वजानिक मनोरंजन स्थलों, कुओं, स्नान घाटों, तालाबों, सड़कों और पब्लिक रिजॉर्ट्स में घुसने से नहीं रोका जा सकता। संविधान के अनुच्छेद 25 से लेकर 28 तक में धार्मिक स्वतंत्रता की बात है। हर किसी को किसी भी धर्म का पालन करने और मानने का अधिकार है। उसका प्रचार-प्रसार और प्रवचन करने का भी अधिकार है। लेकिन 2014 के बाद से लगातार इन अनुच्छेदों का दोहन हमें देखने को मिलता है। अल्पसंख्यकों पर हमले और मॉब लिचिंग की घटनाएं लगातार बढ़ती जा रही है।

राष्ट्रीय मानवाधिकार आयोग के मुताबिक़ 2016 से 2019 के बीच अल्पसंख्यकों और दलितों को परेशान करने वाली घटनाओं की संख्या 2008 रही, जिनमें लिंचिंग भी शामिल हैं। इन घटनाओं में 43 फ़ीसदी मामले सिर्फ़ उत्तर प्रदेश से रहे। देश में 2019 तक यूएपीए से जुड़े मामलों की संख्या 2,361 थी। इनमें से सिर्फ़ 113 का ही निस्तारण हो सका था जिनमें 33 लोग दोषी ठहराए गए, जबकि बरी या आरोप मुक्त होने वालों की तादाद 80 रही। सिर्फ़ 4.79 फ़ीसदी मामलों का ही निपटारा हुआ। बाक़ी 95.21 फ़ीसदी मामले लंबित रह गए। अब यही लंबित मामले 98 फ़ीसदी तक जा पहुंचे हैं।

किसी देश का लोकतंत्र तब मज़बूत माना जाता है जब वहां आर्थिक असमानता कम हो, ग़रीबी दर कम हो और रोज़गार के साधन ज़्यादा हों और बेरोज़गारों की संख्या कम हो, लेकिन इस संबंध में देश की स्थिति किसी से छुपी हुई नहीं है। ऑक्सफ़ैम इंटरनेशनल की रिपोर्ट के मुताबिक़ लॉकडाउन के समय जहां मुकेश अंबानी की कमाई 90 करोड़ रुपए प्रति घंटे की थी वहीं इसके मुक़ाबले में लगभग 24 प्रतिशत भारतीय लॉकडाउन के दौरान 3000 रुपए प्रति माह से भी कम कमा रहे थे। यह रिपोर्ट बताती है कि मार्च 2020 के बाद भारत के 100 अरबपतियों की संपत्ति में 12,97,822 करोड़ रुपए का इज़ाफ़ा हुआ जो कि देश के 13.8 करोड़ सबसे ग़रीब भारतीयों में से प्रत्येक को 04,045 रुपए देने के लिए पर्याप्त थी।

कैसे बदलेंगे हालात?

भारत का अस्तित्व तभी बरक़रार रह सकता है जब संविधान एक मान्यता से आगे संशोधित न किया जाए। जब तक देश में निरंतर और निष्पक्ष ढंग से चुनाव होते रहें। जब तक व्यापक तौर पर धर्मनिरपेक्षता क़ायम रहे और लोगों की सरकारी योजनाओं का लाभ बिना किसी भेदभाव के मिलता रहे। इसीलिए देश के लोकतांत्रिक ढांचे को बनाए रखने के लिए ज़रूरी है कि अमीर और ग़रीब के बीच की बढ़ती खाई को पाटा जाए। लोक कल्याणकारी योजनाओं का लाभ बिना किसी भ्रष्टाचार के सीधे वंचितों तक पहुंचे। संसद से क़ानून जबरन न पास कराए जाएं। संसद में एक स्वस्थ बहस का वातावरण हो और सरकार उचित जवाबदेही के लिए तैयार रहे। मीडिया की स्वतंत्रता पुनः बहाल हो। देश की लोकतांत्रिक संस्थाओं की स्वायत्ता में दख़लअंदाज़ी ना हो। तभी हम वास्तव में लोकतंत्र दिवस को सेलिब्रेट कर सकेंगे।

– सहीफ़ा ख़ान

(लेखिका स्वतंत्र पत्रकार हैं।)

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