क्या दिल्ली चुनाव परिणाम पूरे देश के लिये आदर्श है?

पूरी दिल्ल्ली की चुनाव में अरविंद केजरीवाल ही आप के स्टार प्रचारक रहे और सारे गाने, नारे ,बैनर ,पोस्टर केजरीवाल को चेहरे की तरह इस्तेमाल किया गया...

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पिछले हफ्ते दिल्ली  चुनाव के नतीजे आये जिससे के देखने को मिल की दिल्ली  की जनता ने देशव्यापी मुददे को छोड़कर बिजली,पानी,स्कूल और अस्पताल जैसे मुददों पर वोट किया और बहुत बड़ी आसानी से बी.जे.पी को हरा कर आम आदमी पार्टी को 62/70 सीटो से जिताया। इस बार चुनाव में बहुत सारी ऐसी चीज़े देखने को मिली जो आज़ाद भारत ने पहले कभी सुनी थी न कभी देखी थी। ये पहली बार हो रहा था की भारत जैसे महान देश का गृह मंत्री एक मोहल्ले की 400-500 महिलाएं जो किसी मुददे पर धरने पर बैठी थी उनको करंट लगाने की अपील कर कर रहे थे, एक केंद्रय मंत्री जनता को संबोधन करते हुए गोली मारने जैसी नारे लगवाते है, और ऐसे कई बयान जो बता रही थी की ये देश की राजनीती अब तक के अपने सबसे निचले स्तर पर है।
आम आदमी पार्टी की बड़ी जीत

2 महीने पहले तक ऐसा लग रहा था की आम आदमी पार्टी से सामने कोई पार्टी नहीं टिक सकती लेकिन भाजपा ने राष्ट्रवाद, मुसलमान, राष्ट्रसुरक्षा जैसे मुददों को उठाने की पूरी कोशिश की लेकिन दूसरी तरफ आम आदमी पार्टी ने शरू से अंत तक चुनाव केवल आम इंसान से जुड़े मुददे पर लड़ी और बहुत बड़ी जीत हासिल की।
क्या ये आम आदमी पार्टी का एक मास्टर प्लान है ?

आम आदमी पार्टी एक आन्दोलन से निकली हुई पार्टी है जो विचारधाराओं के  परे आम इंसान की जरूरत के लिए राजनीती के खड़ी हुई थी। पार्टी बनने से लेकर आजतक के सफ़र में बहुत कुछ बदली है।

सेंट्रलाइज्ड पार्टी

जो पार्टी एक आन्दोलन से निकल कर राजनीती में आन्दोलन लाने के लिए उठी थी वो एक इंसान के चेहरे के दम पर सारे चुनाव लड़ रही है। आज उस पार्टी के झंडे में भी उस इंसान का चेहरा है। अगर बाजपा,कांग्रेस पे ये इलज़ाम लगती है की वो सेंट्रलाइज्ड पार्टी है तो वही हाल आप का भी है। पूरी दिल्ल्ली की चुनाव में अरविंद केजरीवाल ही आप के स्टार प्रचारक रहे और सारे गाने, नारे ,बैनर ,पोस्टर केजरीवाल को चेहरे की तरह इस्तेमाल किया गया।

ऐसा क्यों किया गया?

पिछले कुछ चुनावो के नतीजे देखे तो मालूम होगा कि देश की जनता राजनीतिक तौर पर समझदार हुई है , वो जानती है की चुनाव किसको जीतना है और किसको नहीं और जनता को अगर प्रधानमंत्री या मुख्यमंत्री उम्मीदवार चुनाव से पहले मालूम होता है तो ज्यादा आसानी से वोट करती है। आप को ये मालूम था की दिल्ली में केजरीवाल को चुनौती देने वाला उम्मीदवार किसी पार्टी के पास नहीं है इसलिए आप ने चुनावी मैदान में केजरीवाल के नाम को आगे रखा जिसका उससे फ़ायदा भी मिला।

क्या ऐसा करना सही है ?
मेरे राय में ये गलत है क्योंकि ऐसा करने से पूरी पार्टी को एक इंसान ही प्रतिनिधित्व कर रहा होता है उसके किसी गलत फैसला का भुगतान पुरे पार्टी को करनी पड़ती है।

केजरीवाल की मुसलमानों से दुरी?

पिछले 2 महीने  केजरीवाल ने मुसलमानों से जुड़े मुददों से दुरी बनाए रखी, कभी भी खुलकर NRC,CAA,NPR जैसे विषयों पे चर्चा नहीं की, यहाँ तक की आज चुनाव के परिणाम आने के बाद भी केजरीवाल इनपर अबतक कुछ नहीं बोले। 2 महीनें से दिल्ली में 10 से ज्यादा जगहों पर महिलाएं रात दिन प्रदर्शन कर रही है लेकिन आन्दोलन से निकले हुए नेता उनके पास आजतक नहीं गए। उत्तर प्रदेश में 20 से ज्यादा लोगो की जान चली गयी लेकिन उसपे एक शब्द नहीं बोले।

क्या ये सब एक बड़े लक्ष के लिए हो रहा है ?
अगर आप ध्यान देंगे तो आपको पता लगेगा ये पूरा भाजपा का पैटर्न है जिसपे आप चल रही . चुनाव पूर्व केजरीवाल हनुमान मंदिर जाते है ,चुनाव जितने के बाद कहते है की चुनाव हनुमान जी के वजह से जीते। केजरीवाल कांग्रेस की असफल “सॉफ्ट हिंदुत्वा” को इस्तेमाल कर रहे है। मेरा मानना ये है की ये तैयारी आने वाली लोकसभा की तैयारी है  क्योंकि सब जानते है भाजपा अबतक विफल रही है और देश मजबूत विकल्प की तलाश में है  तो एक मजबूत सेंट्रलाइज्ड पार्टी का नेता जो विकाशील है और मुसलमानों से दुरी भी रखता है विकल्प के तौर पर देखा जा सकता है।
क्या देश में चुनाव अब केवल मुसलमानों से दुरी बना कर ही जीती जा सकती है ?
ऐसा नहीं है, अच्छा नेता वो नहीं जो किसी दुसरे के बनाये हुए रेखा पे रखते हुए चुनाव लाड़े बल्कि वो है खुद नयी रेखा खिचे और उनपर रह कर चुनाव लड़े।

 

Nadeem Khan

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