जामिया में नए अकादमिक सत्र की घोषणा, फ़ीस बढ़ोत्तरी के कारण छात्रों में रोष

जामिया मिल्लिया इस्लामिया में नए अकादमिक सत्र 2021-2022 की घोषणा हो गई है। इस सत्र में विभिन्न पाठ्यक्रमों में प्रवेश के लिए आवेदन मांगे गए हैं। ख़ास बात यह है कि इस बार आठ नए पाठ्यक्रमों और चार नए विभागों की शुरुआत हुई है। इसी के साथ छात्रों के बीच बढ़ती फ़ीस का मुद्दा गरमाने लगा है। मौजूदा सत्र के छात्र भी बढ़ती फ़ीस का विरोध कर रहे हैं। इसके अलावा कई छात्र सोशल मीडिया पर फ़ीस को लेकर अपनी आवाज़ उठा रहे हैं।

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“मेरे पिता दिहाड़ी मज़दूर हैं, और उन्हें 12 अप्रैल के बाद से अब तक कोई काम नहीं मिला। मेरे घर में खाने-पीने की समस्या हो रही है। ऐसे में मैं अपनी रेगुलर पढ़ाई के बारे में सोच भी नहीं सकती। मैंने जो सपने पिछले साल देखे थे कि मैं अपने ग्रेजुएशन के बाद की पढ़ाई जामिया से करुंगी, लेकिन इतनी महंगी फ़ीस होने से मुझे नहीं लगता कि मेरा यह सपना पूरा हो पाएगा।”

यह कहना है अंजलि का जो फ़िलहाल दिल्ली विश्वविद्यालय से ग्रेजुएशन कर रही हैं।

जामिया मिल्लिया इस्लामिया में नए अकादमिक सत्र 2021-2022 की घोषणा हो गई है। इस सत्र में विभिन्न पाठ्यक्रमों में प्रवेश के लिए आवेदन मांगे गए हैं। ख़ास बात यह है कि इस बार आठ नए पाठ्यक्रमों और चार नए विभागों की शुरुआत हुई है। इसी के साथ छात्रों के बीच बढ़ती फ़ीस का मुद्दा गरमाने लगा है। मौजूदा सत्र के छात्र भी बढ़ती फ़ीस का विरोध कर रहे हैं। इसके अलावा कई छात्र सोशल मीडिया पर फ़ीस को लेकर अपनी आवाज़ उठा रहे हैं।

अंजलि आगे कहती हैं कि, “मैंने सोचा था कि दिल्ली में रहकर जामिया से पढ़ाई करुंगी, लेकिन फ़ीस इतनी ज़्यादा है जिसे भर पाना मेरे परिवार के लिए बहुत मुश्किल है। जामिया तो एक सरकारी संस्थान है, यहां पर भी वही हालात हैं, जैसे निजी संस्थानों में हैं। कोविड काल में न तो हम यहां की लैब का उपयोग कर पाएंगे क्योंकि संस्थान पहले से बंद है। आगे का पता नहीं कब तक ऐसे ही रहता है। ऐसे में मुझे अपने सपनों का त्याग करना होगा।”

दिल्ली विश्वविद्यालय के राम लाल आनंद कॉलेज से पत्रकारिता की पढ़ाई कर रहीं आभा ने कहा कि, “मुझे नहीं लगता है कि बारहवीं तक की शिक्षा प्राप्त करने कोई जॉब मिलती होगी। आज सब जगह स्नातक या इससे आगे की पढ़ाई मांगी जाती है। पैसे वाले छात्र तो कहीं से भी पढ़ाई कर लेते हैं, लेकिन मध्यम वर्ग या इससे नीचे के छात्र कहां जाएंगे?”

उन्होंने कहा कि, “कोरोना काल में कई लोगों का रोज़गार छिन गया है, जहां दो वक़्त की रोटी का बंदोबस्त करना ही मुश्किल है। जो छात्र प्रतिभाशाली हैं, इन संस्थानों की मोटी फ़ीस न चुका पाने से उनकी प्रतिभा मर जाती है।” आभा कहती हैं कि सरकार हमारे साथ ग़लत कर रही है। जो छात्र आर्थिक रुप से पिछड़े हैं, सरकार को उनकी मदद करनी चाहिए थी, लेकिन यहां तो फ़ीस बढ़ाई जा रही है।‌ उन्होंने कहा कि, “नाम बड़ा होना महत्व रखता है, लेकिन महंगी फ़ीस से कोई संस्थान बड़ा नहीं होता। शिक्षा का क्षेत्र पूरी तरह से पूंजीवाद से ग्रस्त है। सरकार को हम जैसे छात्रों की शिक्षा के बारे में सोचना चाहिए। सरकार एक तरफ कहती है ‘बेटी बचाओ, बेटी पढ़ाओ’ लेकिन यहां तो बेटी का भविष्य ही ख़तरे में है।”

आसिफ़ कहते हैं कि, “सबसे पहले तो पढ़ाई सभी के लिए मुफ़्त होनी चाहिए। यह हम सभी का अधिकार है। वहीं बढ़ती फ़ीस हम जैसे निम्न वर्ग के छात्रों के लिए बहुत घातक है। कोरोना काल में हमारे परिजनों के पास रोज़गार नहीं है और ऐसे में इतनी महंगी फ़ीस भरना नामुमकिन है। सरकार को इस बारे में सोचना चाहिए कि जो परिवार पहले थोड़ा बहुत कमा रहे थे आज उनके हाथ भी ख़ाली हैं। मुझे भी जामिया में पढ़ना था लेकिन जो अभी वहां मास मीडिया का कोर्स आया है, उसकी फ़ीस इतनी ज़्यादा है कि मैं उसे नहीं भर सकता। अगर फ़ीस कम होती तो मैं इसके लिए आवेदन ज़रुर करता।”

कहते हैं कि जामिया मिल्लिया इस्लामिया का गठन ही इसलिए हुआ था कि यहां सभी तरह की पृष्ठभूमि के छात्र पढ़ सकें। भारत कोकिला सरोजिनी नायडू के अनुसार उन्होंने तिनका-तिनका जोड़कर और तमाम क़ुर्बानियां देकर जामिया के निर्माण में भूमिका निभाई। रवीन्द्रनाथ टैगोर ने इसे भारत के सबसे प्रगतिशील शैक्षणिक संस्थानों में से एक बताया था। वहीं महात्मा गांधी जामिया की वित्तीय सहायता के लिए भीख मांगने के लिए भी तैयार थे। लेकिन इन छात्रों को सुनकर लगता है कि जो गांधी जी ने सोचा था वह लक्ष्य कहीं दूर-दूर से साकार होता नहीं दिख रहा।

जामिया मिल्लिया इस्लामिया से पत्रकारिता में पीजी डिपलोमा कर रहीं इल्मा ने कहा कि, “जामिया में सभी तरह के छात्र पढ़ने आते हैं और मैं देख रही हूं कि हमसे फ़ीस तो सभी चीज़ों की ले ली गई है लेकिन हमने संस्थान की किसी भी चीज़ का इस्तेमाल नहीं किया। अगर जामिया में ऐसे ही फ़ीस बढ़ती गई तो ग़रीब छात्रों के लिए यहां पढ़ पाना मुश्किल हो जाएगा।”

दिल्ली विश्वविद्यालय में तृतीय वर्ष की छात्रा अरुणा ने कहा कि, “जामिया की फ़ीस इतनी ज़्यादा है कि निजी संस्थान और इसमें कोई अंतर नहीं है। उन्होंने कहा मैंने अपनी क्लास में देखा है कि बहुत से बच्चे अपनी फ़ीस ख़ुद ही काम करके या ट्यूशन पढ़ाकर जमा करते हैं।”

उन्होंने बताया कि उन्हें पब्लिक रिलेशन से संबंधित आगे पढ़ाई करनी है, लेकिन जब उन्होंने जामिया और बाक़ी निजी संस्थानों की फ़ीस जांची तो उन्हें फ़ीस के मामले में कोई अंतर नहीं नज़र आया।‌

अरुणा कहती हैं कि, “हम सरकारी संस्थान में पढ़ने इसलिए जाते हैं क्योंकि हमारी आर्थिक स्थिति ठीक नहीं होती, यहां भी ऐसा ही है तो फ़िर हमारे पास पढ़ाई छोड़ने के अलावा और कोई चारा नहीं बचता।”

अबूज़र कमालउद्दीन कहते हैं कि, “जामिया एक अल्पसंख्यक संस्थान है। इस देश में अल्संख्यकों की आर्थिक और शैक्षणिक स्थिति क्या है यह बताने की ज़रूरत नहीं है। लोग यहां खाने को मोहताज हैं और विश्वविद्यालय का सारा ध्यान भारी भरकम फ़ीस की वसूली पर है। वो भी फ़ीस इतनी कि निजी विश्वविद्यालयों और जामिया में फ़र्क करना मुश्किल हो जाए। ऐसे में सालाना एक लाख रुपये कमाने वाला परिवार भी क्या जामिया में अपने बच्चे को पढ़ाने की हिम्मत जुटा पाएगा? कितने बीपीएल परिवार अपने बच्चे को इन सेल्फ़ फाइनांस्ड कोर्स में भेज पाएंगे। अगर हिम्मत जुटा भी लें तो क़र्ज़ या बैंक लोन ही एक मात्र उपाय है। जिस संस्थान को आम लोगों ने अपने एक-एक रुपये के चंदे से खड़ा किया वो आज उनका ही तेल निकालने में लगा हुआ है। ऐसे हालात बनाए जा रहे हैं कि अल्पसंख्यक आबादी के साथ देश का एक बड़ा तबक़ा इस तरह के केंद्रीय विश्वविद्यालयों से दूर हो जाए।”

जामिया ने इस सत्र में 8 नए पाठ्यक्रमों के शुरुआत की पुष्टि की है। इनमें से 6 कोर्स सेल्फ़-फ़ाइनांस्ड हैं।

  1. मास्टर ऑफ़ डिज़ाइन इन द फ़ैकल्टी ऑफ़ ऑर्किटेक्चर
  2. एमए मास मीडिया (हिंदी) इन द डिपार्टमेंट ऑफ़ हिन्दी
  3. एमएससी इंवायरमेंटल साइंस एंड मैनेजमेंट
  4. बीए (ऑनर्स) इन फ़्रेंच एंड फ्रैंकोफ़ोन स्टडीज़ इन सेंटर ऑफ़ स्पैनिश एंड लैटिन अमेरिकन स्ट्डीज़
  5. बीए (ऑनर्स) स्पैनिश एंड लैटिन अमेरिकन स्ट्डीज़ इन सेंटर ऑफ़ स्पैनिश एंड लैटिन अमेरिकन स्ट्डीज़
  6. पीजी डिप्लोमा इन ट्रांसलेशन स्ट्डीज़ इन द डिपार्टमेंट ऑफ़ इंग्लिश
  7. पीजी डिप्लोमा इन इंग्लिश-हिंदी ट्रांसलेशन इन द डिपार्टमेंट ऑफ़ हिन्दी
  8. एमबीए (हेल्थकेयर एंड हॉस्पिटल मैनेजमेंट)

साथ ही जामिया ने चार नए विभाग भी शुरु किए हैं जिनमें डिपार्टमेंट ऑफ़ डिज़ाइन एंड इनोवेशन, डिपार्टमेंट ऑफ़ हॉस्पिटल मैनेजमेंट एंड हॉस्पिस स्ट्डीज़, डिपार्टमेंट ऑफ़ फ़ॉरेन लैंग्वेज और डिपार्टमेंट इंवायरमेंटल साइंसेज़ शामिल हैं।

एमए मास मीडिया (हिंदी) की फ़ीस ₹ 33,700/- प्रति सेमेस्टर तय की गई है यानी क़रीब 67 हज़ार रुपये सालाना। एमबीए (हेल्थकेयर एंड हॉस्पिटल मैनेजमेंट) सेल्फ़-फ़ाइनांस्ड कोर्स नहीं है लेकिन इसकी फ़ीस ₹ 1,05,000/- सालाना तय की गई है। मास्टर ऑफ़ डिज़ाइन में सेल्फ़-फ़ाइनांस्ड सीट की फ़ीस ₹ 1,00,000/- सालाना और एमएससी इंवायरमेंटल साइंस एंड मैनेजमेंट की फ़ीस ₹ 45,000/- सालाना रखी गई है। बाक़ी के दो-तीन पाठ्यक्रमों में विश्वविद्यालय ने तुलनात्मक तौर पर कुछ नर्मी दिखाई है। विदित हो कि जामिया में नए सत्र के लिए आवेदन करने की अंतिम तिथि 30 जून है।

रिपोर्ट: आशीष

(आशीष जामिया में पत्रकारिता की पढ़ाई कर रहे हैं।)

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