आज़ाद भारत के पहले शिक्षा मंत्री: मौलाना अबुल कलाम आज़ाद

आज भी मौलाना आज़ाद और उनके सिद्धांत हमारे लिए काफी महत्वपूर्ण हैं। ये देश के इतिहास के साथ एक बड़ा अन्याय है जो हम इस असाधारण क्षमताओं वाले व्यक्ति को भूल बैठे हैं। यह हमारे लिए काफी दुर्भाग्यपूर्ण है कि 21वीं सदी के बच्चों को अब्दुल कलाम तो याद हैं लेकिन उनको तैयार करने वाले प्रमुख संस्थान के दाता अबुल कलामआज़ाद याद नहीं।

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  • “वास्तव में शिक्षा एक ऐसे माहौल का निर्माण है जहाँ मनुष्य दोस्ती और समानता के आधार पर हम एक-दूसरे को समझ सकते हैं” – मौलाना आज़ाद

आज के कट्टर राष्ट्रवाद और इतिहास के ताने-बाने में हम उन लोगों को भूलते जा रहे हैं जिनका आधुनिक भारत के निर्माण में काफी बड़ा योगदान रहा है। हममें से कई लोगों ने शायद ही मौलाना आज़ाद के बारे में पढ़ने और समझने की कोशिश की हो। सोशल मीडिया और व्हाटसएप की बहसों में ये नाम अक्सर ये जताने के लिए उपयोग होता है कि आज के भारत के प्रमुख शैक्षिणिक संस्थानों की स्थापना करने वाले मौलाना आज़ाद थे। लेकिन हम समाज में एक गहरी छवि प्रदान करने में अक्सर विफल हो जाते हैं। यह काफी चिंताजनक है कि केवल सामयिक चर्चा के लिए हम सब काफी आगे रहते हैं लेकिन मौलाना आज़ाद जैसे व्यक्तित्व से लाभ लेने के लिए हमारे पास केवल अपने राजनैतिक उल्लू को सीधा करने के अलावा और कुछ नहीं है।

मौलाना आज़ाद काफी सादा जीवन जीते थे। एक इस्लाम के विद्वान, एक निर्भय पत्रकार और एक स्वतंत्रता सेनानी के रूप में आज़ाद कई बार जेल भी गए। कैद में रहते हुए उन्होंने राजनीति, आध्यात्मिकता और समाज के बारे में लिखा और बाहर आपने पर अपने विचारशील भाषणों के माध्यम से भारतीयों के दिलों में देशभक्ति की भावना को जागृत किया। वह उर्दू को फारसी के एक सुंदर मिश्रण के साथ बोलते थे। आज़ाद के जीवन को किसी एक रूप में देखना उनके व्यक्तित्व को सीमित कर देने जैसा है। शिक्षा के क्षेत्र में स्वतंत्र भारत को आईआईटी, यूजीसी, सीएसआईआर, आदि जैसे प्रमुख शैक्षिणिक संस्थान देने के साथ साथ पत्रिकारिता, उर्दू साहित्य, कुरान की शिक्षा के क्षेत्रों में भी आज़ाद का अमूल्य योगदान रहा है। गांधी ने तो मौलाना आज़ाद को सीखने के सम्राट के रूप में वर्णित किया। और प्लेटो, अरस्तू और पायथागोरस जैसी क्षमता वाले व्यक्ति के रूप में माना है।

आज़ाद, भारत के नागरिकों को मुफ्त बुनियादी शिक्षा देने पर ज़ोर देने वाले पहले शख्स थे। भारत के शिक्षा मंत्री बनने के बाद उन्होंने नीति निर्माताओं को मुफ्त बुनियादी शिक्षा पर काम करने के लिए प्रोत्साहित किया। उन्होंने प्राथमिक शिक्षा और वयस्क शिक्षा के क्षेत्र में भी काफी ध्यान दिया । भारत के विशाल वित्तीय संकट के बावजूद, उन्होंने शिक्षा क्षेत्र के लिए काफी बड़ा बजट आवंटित करवाया। उनका लक्ष्य शिक्षा पर 10% तक खर्च बढ़ाने के लिए था। वयस्क शिक्षा को बढ़ावा देने के लिए उनका मत था कि सरकारी कर्मचारी वयस्कों को बुनियादी शिक्षा देने में सहयोग करें। वह भारत की जमीन की वास्तविकताओं के बारे में बहुत ज्यादा जागरूक थे और नीति निर्माताओं को इसके बारे में बताते ताकि वे समस्याओं और चुनौतियों को बेहतर समझ सकें। मौलाना का ऐसा मानना थे कि स्कूलों में शिक्षा का माध्यम मातृभाषा में होना चाहिए। शिक्षा मंत्रालय के तहत उनके तत्काल लक्ष्य चार थे।

• सभी बच्चों के लिए सार्वभौमिक स्तर पर मुक्त और अनिवार्य बुनियादी शिक्षा का प्रावधान।
• जनता की निरक्षरता को खत्म करने के लिए वयस्क शिक्षा का प्रावधान।
• औद्योगिक और तकनीकी विकास के लिए तकनीकी शिक्षा में सुधार और विस्तार।
• राष्ट्रीय स्तर पर विश्वविद्यालय शिक्षा का पुनर्गठन और सुधार।

11 नवंबर को शिक्षा दिवस के रूप में भारत मौलाना आज़ाद का जन्मदिन मनाता है। शायद यही वह दिन है जो मौलाना की शिक्षाविद की निर्विवाद पहचान को अलग करता है। उन्होंने संविधान सभा को भी आश्वस्त किया कि नागरिकों को नि:शुल्क और अनिवार्य शिक्षा प्रदान करने की जिम्मेदारी राज्य की होनी चाहिए। और यह वोही सोच थी जिसके चलते हमने देखा कि 2009 में आर.टी.ई के तहत यह एक कानून के रूप में लागू किया गया है । शिक्षा का अधिकार अधिनियम 2009 में संसद द्वारा अधिनियमित किया गया था और यह 1 अप्रैल 2010 को प्रभाव में आया जो 6-14 आयु वर्ग के सभी बच्चों को उनके मूल अधिकार के तहत मूल/बुनियादी शिक्षा प्रदान करने की गारंटी देता है।

कानून प्रभाव में आने के 8 साल बाद भी बुनियादी शिक्षा प्रदान करने के मामले में ज़मीनी स्तर पर कोई ख़ास बदलाव नहीं आया है। न तो सरकार और न ही निजी क्षेत्रों ने इन प्रावधानों को लागू करने पर कोई दिलचस्पी दिखाई है। कई रिपोर्टों से पता चलता है कि सरकारी स्कूलों के शिक्षक बच्चों के लिए शिक्षा और सीखने की प्रक्रिया को दिलचस्प बनाने के लिए पूरी तरह सक्षम नहीं हैं। राज्य उन्हें बुनियादी शिक्षण कौशल का प्रशिक्षण देने में कोई रूचि नहीं दिखाता है। राष्ट्रीय स्तर पर शिक्षक प्रशिक्षण कार्यक्रम मौलाना आज़ाद का एक महत्वपूर्ण एजेंडा था और वह चाहते थे कि सरकार विशेष रूप से शिक्षकों को प्रशिक्षण देने पर ध्यान केंद्रित करें क्योंकि वे देश के ज़मीनी स्तर के शिक्षा के राजदूत हैं।

आज भी मौलाना आज़ाद और उनके सिद्धांत हमारे लिए काफी महत्वपूर्ण हैं। ये देश के इतिहास के साथ एक बड़ा अन्याय है जो हम इस असाधारण क्षमताओं वाले व्यक्ति को भूल बैठे हैं। यह हमारे लिए काफी दुर्भाग्यपूर्ण है कि 21वीं सदी के बच्चों को अब्दुल कलाम तो याद हैं लेकिन उनको तैयार करने वाले प्रमुख संस्थान के दाता अबुल कलामआज़ाद याद नहीं।

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