अपने मन की बात नहीं, मेरी बात कीजिये माननीय प्रधानमंत्री जी!

किसी को क्या पता कि दिल्ली हाई कोर्ट के फैसले आने के बाद भी दिल्ली सरकार फिर से जलने मरने और लूटने के लिए छोड़ देगी? केजरीवाल सरकार द्वारा हाइ कोर्ट के दिशा-निर्देश का पालन नहीं करना क्या दर्शाता है? योगी और केजरीवाल सरकार में अब कोई अंतर नहीं है? अब जबकि पूरा देश लॉकडाउन है इनके पास खाने-पीने एवं रहने के लिए घर भी नहीं है ऐसे में इतनी बड़ी आबादी को उसके हालत पर छोड़ देना कहाँ की मनुष्यता है?

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यह एक बस अड्डे की तस्वीर है, जहां लोग अपने घर जाने के लिये बस का इंतेजार कर रहे हैं

दिसंबर 2019 से अब तक कोरोना का आतंक चीन (वुहान प्रांत की राजधानी हूबेई) से लेकर पूरी दुनिया में फैल चुका है। ताज़ा अपडेट के मुताबिक 512701 लोग अब तक संक्रमित पाये गए हैं। 23495 लोगों की मौत इस खतरनाक वायरस के चपेट में आने से हो चुकी है। अब तक संक्रमण से बचाव के लिए किसी पेटेंट दवाई की खोज नहीं हो पाई है। मेडिकल एक्स्पर्ट्स लगातार सोध जारी है। एक्सपर्ट का कहना है कि इसकी रोकथाम के लिए टीके की खोज चिकित्सीय उपयोग तक लाने में एक से डेढ़ साल लग सकते हैं। ऐसे में आम पब्लिक क्या करे? अगर ये 2021 में मार्केट में उपलब्ध भी हो जाए तो क्या एक ही बार में पूरी दुनिया के अवाम को इसका फायदा उठाना नामुमकिन सा है।

चीन इस वायरस के संक्रमण पर पूरी तरह काबू पा चुका है। इसलिए चीन ने अपने यहाँ लॉकडाउन की क़ैद से जनता को मुक्ति दे दी है। चीन के अलावा पूरी दुनिया लॉकडाउन है भारत अभी इस वायरस के संक्रमण के दूसरे फेज़ से गुजर रहा है। पूरी दुनिया के देशों में देखा गया है की इस संक्रमण का तेजी से फैलाव तीसरे और चौथे सप्ताह में ज्यादा होता है। यह वायरस के संक्रमण का चौथा फेज़ माना जाता है। इस अमेरिका, ब्रिटेन, इटली और स्पेन मुख्य रूप से इसी तीसरे फेज़ से गुजर रहा है। संक्रमण का यह फेज़ सामुदायिक स्तर तक फैल जाता है। इस लेवल को सामान्य रूप से मेंटेन करना बहुत ही मुश्किल हो जाता है। क्योंकि इस वक़्त तक एक पूरी फेमिली के साथ मुहल्ले तक इस वायरस का संक्रमण फैल चुका होता है। दुनिया के साइंस और टेक्नालजी से परिपूर्ण देश भी इस वायरस के सामने बौना साबित हो रहे हैं। अमेरिका ब्रिटेन और इटली जैसे देश की हालत इस वायरस के सामने पतली है। जबकि इन देशों की प्रथम स्तर की स्वास्थ्य सेवाएँ भी संक्रमण को रोकने में असफल साबित हो रहे हैं। संक्रमित लोगों के लिए वहाँ की अस्पतालों में बेड नहीं है। प्रायप्त वेंटिलेटर नहीं है। जिसकी वजह से वायरस संक्रमित लोगों की लगातार मृत्यु जारी है। अस्पतालों में बेड से ज्यादा मरीजों की संख्या है। बीबीसी संवादता विनीत खरे के मुताबिक मरीजों का इलाज अमेरिकी अस्पतालों के जगह की कमी के कारण कॉरीडोर में किया जा रहा है। इटली में भी लगभग यही समस्याएँ हैं। खैर ये समस्याएं वैश्विक सतह पर अपनी जगह हैं और इस पर विश्व स्वास्थ्य संगठन से लेकर सभी बड़ी विकसित और विकासशील देश एवं अंतर्राष्ट्रीय संस्थाएं विचार विमर्श के साथ हल ढूँढने में लगी हैं। बहुत मुमकिन है की सभी के प्रयास से देर ही सही इसका उपाय ढूंढ लिया जा सकता है।

नॉर्थ ईस्ट दिल्ली के दंगा पीड़ितों की व्यथा और वायरस का कहर

यह दिल्ली दंगा पीड़ितों के लिये राहत कैंप था जिसमें लाभग 1000 परिवारों को रखा गया था, लेकिन कोरोना वायरस की वजह से बिना किसी वैकल्पिक व्यवस्था के इस कैंप को बंद कर दिया गया है …

पिछले महीने 23 फरवरी से लेकर 27 फरवरी तक दिल्ली के नॉर्थ ईस्ट इलाके में मुसलमानों का नर्सन्हार होता रहा। गृह मंत्री अमित शाह के संसद में दिये गए बयानों के मुताबिक 36 घंटे उत्तर प्रदेश से आए दंगाइयों ने दंगा ग्रस्त इलाकों में लूट-पाट के अलावा घरों को आग के हवाले कर दिया। इस सरकारी वक्तव्य से दंगा पीड़ितों का हाल समझ सकते हैं। हजारों परिवारों के घर को चुन चुनकर जलाया गया। उनके रोजगार के सभी छोटे बड़े साधन को पूरी तरह से बर्बाद कर दिया। इस अलाके के मुसलमान रोड पर ज़िंदगी गुजारने के लिए बेबस है। पिछले दिनों जब दिल्ली सरकार, वक़्फ़ बोर्ड और जमात-ए-इस्लामी की मदद से मुस्तफाबाद के ईदगाह ग्राउंड में इन पीड़ित परिवारों के लिए राहत शिविर लगाया गया तो उन परिवारों को थोड़ी बहुत उम्मीद जगी कि इतना लूटने-पीटने के बाद अब भी एक मौका फिर से नई जिंदगी कि शुरुआत करने का है। लेकिन किसी को क्या पता कि दिल्ली हाई कोर्ट के फैसले आने के बाद भी दिल्ली सरकार फिर से जलने मरने और लूटने के लिए छोड़ देगी? केजरीवाल सरकार द्वारा हाइ कोर्ट के दिशा-निर्देश का पालन नहीं करना क्या दर्शाता है? योगी और केजरीवाल सरकार में अब कोई अंतर नहीं है? अब जबकि पूरा देश लॉकडाउन है इनके पास खाने-पीने एवं रहने के लिए घर भी नहीं है ऐसे में इतनी बड़ी आबादी को उसके हालत पर छोड़ देना कहाँ की मनुष्यता है? जबकि दिल्ली उच्च न्यायालय ने एक सरकारी कैंप को नाकाफी बताया था। और कई दूसरे कैंप बनाने के निर्देश सरकार को जारी किए गए थे। लेकिन इस खबर से किसको कोई फर्क पड़ता है क्योंकि इस कैंप में तो सिर्फ पीड़ित मुसलमान हैं। चलो ये जो कुछ हो रहा है मुसलमानों के साथ हो रहा है। इसपर कोई न्यूज और खबर देश की मेन स्ट्रीम मिडिया ने नहीं दिखाई। ना ही बड़ी संख्या में लोगों ने सरकार से सवाल पूछा। कैंप से दंगा पीड़ितों को बिना किसी सहायता के भगा दिया गया। बहरहाल मुद्दे दबा दिये गए ठीक वैसे ही हमने उस सीरियाई बच्चे की लाश को समुन्द्र के साहिल पर देखने के बाद भी विश्व के शांतिप्रीये समाज को कोई फर्क नहीं पड़ता है। ये सब कुछ हम सोच ही रहे थे कि भूख-प्यास से बेहाल भारतीय भारत के झुंड के झुंड राष्ट्रीय राज्य मार्गों पर चलते-फिरते नजर आने लगे। फिर मुझे सीरिया का वो बच्चा और साथ ही कुछ दिनों पहले रोहंगिया मुसलमानों का वो दृश्य याद आ गया। हमें बस खुद में भले-चंगे कि फिक्र ने इस दिन तक ला खड़ा किया है।

भारत में कोरोना से ज्यादा भूख से मरेंगे

देश में अचानक लॉक डाउन की सरकारी घोषणा के बाद देश के गरीब भारतीय विकट परिस्थिति में अपने घर जाने पर मजबूर हैं

एक जरूरी प्रश्न जो भारत जैसे विकासशील या उन छोटे देशों के सामने है जिसके पास जरूरी चिकिसकीय सुविधाओं का संकट है, लोगों के पास एक टाईम के खाने के अलावा कुछ नहीं है, वो भी तब मुमकिन है जब लोगों के पास रोजगार का अच्छा प्रबंध हो। सबसे ज्यादा परेशानी दिहाड़ी मजदूरों को हो रही है। एक साथ लॉकडाउन के फैसला लेने से परिवहन से लेकर सभी छोटे-मोटे कल-कारखाने भी बंद पड़े हैं। इससे देश की बड़ी आबादी के बाद रोजी-रोटी का मसला सामने आ गया है। सरकार और सामाजिक संस्थाओं का प्रयास नाकाफी साबित हो रहा है। यातायात के सभी साधन के एक साथ बंद हो जाने से लोग हजारों किलोमीटर भूखे-प्यासे बदहवास होकर चले जा रहे हैं। उनके सामने बस घर पहुँचने की चुनौती है। कई के बूढ़े माँ-बाप घर पर हैं। कई के पास रोजगार चले जाने से जहां रह रहे थे रहने के लिए किराया नहीं है। इस वजह से अपने घर की तरफ भागे जा रहें हैं। आपको आयलान कुर्दी याद है न, वो तीन साल का कुर्दी मूल का सीरियाई बच्चा! जिसका समुद्र तट की रेत पर पड़े शव का चित्र पूरे विश्व में सुर्ख़ियों में आ गया था। आज बिलकुल वही दृश्य है, जब न्यूज़ चैनल पर एक क्लिप दिखाई गई जिसमे एक प्रवासी मजदुर साइकिल पर अपने बीवी बच्चे को बिठाकर सैकड़ो किलोमीटर की दूरी तय कर रहा था उसका बच्चा  निढाल सा साइकिल के डंडे पर बैठा था, बैठा क्या था लेटा हुआ था और उसका माथा साइकिल के हैंडल पर टिका हुआ था। कसम से हलक से खाना नही उतरा। एक मज़दूर सरिता विहार की तरफ भटकता हुआ मिला। उसे आनंद विहार जाना था लेकिन कोई सही रास्ता बताने वाला भी नहीं।

90 साल की महिला कजोड़ी है, दिल्ली से 400 किमी दूर सवाई माधोपुर(राजस्थान) के लिए पैदल ही चल पड़ी है, उम्र के इस आखिरी पड़ाव में ये अपने घर पहुँच पाएगी

उसे अभी भी उम्मीद है कि आनंद विहार से उसे उसके घर की बस मिल जाएगी। इसलिए उस दिशा में भागा जा रहा है। 90 साल की महिला जिसका नाम कजोड़ी है, दिल्ली से 400 किमी दूर सवाई माधोपुर के लिए पैदल ही चल पड़ी है क्या करें और कोई रास्ता भी नहीं है। एक बुज़ुर्ग दादरी से पैदल चलकर आ रहा था। उसका पेन्टर बेटा और बहू दिल्ली में कहीं रहते हैं। ये कोई एक दो या सेकड़ों कहानी है बल्कि इन बेबस कहानियों की संख्या लाखों करोड़ों में है। जिनके पास खाने को पैसे नहीं हैं। कोई मदद करने या कर्ज़ देने को तैयार नहीं है। इन तीनों की समस्या एक जैसी है। भूख मिटाने के लिए पैसे नहीं हैं। दिल्ली सरकार कह रही है कि किसी को भूखा नहीं सोने देंगे लेकिन ये दिहाड़ी मज़दूर केजरीवाल पर भरोसा करने की बजाए सैकड़ों किलोमीटर दूर पैदल अपने घर जाना चाहते हैं। राज्य सरकारों ने अपने इन नागरिकों को यूं ही छोड़ रखा है। ये जियें या मरें, कोई फर्क़ नहीं पड़ता। यही सच है। ये कोरोना से तो नहीं मरेंगे लेकिन इतना लंबा सफ़र तय करने में ज़रूर मारे जाएंगे।

पूर्व वित्त मंत्री का दस सूत्रीय सुझाव

प्रधानमंत्री किसान सम्मान निधि के तहत मिलनी वाली 6 हजार रुपए की राशि को तुरंत बढ़ाकर 12 हजार करना चाहिए। बढ़ी हुई राशि लाभार्थी के खाते में तुरंत डालनी चाहिए। इसके अलावा बटाईदार किसानों को भी इस योजना का लाभ देते हुए 12,000 रुपए दिए जाने चाहिए। मनरेगा में रजिस्टर्ड मजदूरों के खातों में तुरंत 3 हजार रुपए डाले जाएं। आधार सीडिंग में गलती की वजह से किसी लाभार्थी को दो बार राशि मिल भी जाए तो इस स्थिति में इस गलती को नजरअंदाज कर देना चाहिए। अगर ऐसा करने में 15 फीसदी राशि का भुगतान गलत ढंग से होता भी है तो भी इसे करना सही है। शहरी गरीबों को राहत पहुंचाने के लिए उनके जन-धन खाते में 6 हजार रुपए तुरंत डालें जाएं। ऐसा करते समय उन जीरो बैलेंस खातों का भी ध्यान रखा जाए, जो जन-धन स्कीम शुरू होने से पहले खोले गए थे। सभी राशनकार्ड धारकों को अगले 21 दिन के भीतर 10 किलो चावल या गेहूं बिल्कुल मुफ्त दिया जाए।

सभी पंजीकृत नियोक्ताओं से किसी व्यक्ति की छंटनी नहीं करने को कहा जाए। कर्मचारियों का एक महीने का वेतन सरकार देगी, इसकी गारंटी कंपनियों को दी जानी चाहिए। बैंकों को निर्देश दिए जाएं कि वे ईएमआई पैमेंट की समयसीमा 30 जून तक बढ़ा दें। 1 अप्रैल से 30 जून, 2020 तक सभी जरूरी वस्तुओं और सेवाओं पर जीएसटी दरों में 5 प्रतिशत की कटौती की जाए। चिदंबरम ने कहा कि जिनलोगों को इसके बाद भी अगर योजना का लाभ नहीं मिल पाता है तो उनके लिए सभी ब्लॉक के वार्ड में एक रजिस्टर पर अपना ब्यौरा और आधार नंबर लिखने की सुविधा दी जाए। जांच के बाद सरकार रजिस्टर में नाम दर्ज कराने वाले ऐसे सभी लोगों के खाते में 3000 रुपए ट्रांसफर करे।

~शाहिद सुमन

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