राष्ट्रीय राजनीति में नीतीश : उनकी आत्ममुग्धता या आत्मविश्वास

0
332

राजनीतिक विश्लेषकों का मानना है कि नीतीश के दिल्ली यात्रा के दौरान नीतीश के बॉडी लेंगुएज में जो बदलाव आ रहा है। यह उनकी आत्ममुग्धता है या आत्मविश्वास लोग इस पर कयास लगा रहे हैं। विश्लेषक कहते हैं कि नीतीश कुमार भारतीय राजनीति का राहुल द्रविड़ और वीवीएस लक्ष्मण हैं, नीतीश की राजनीतिक शैली पर गौर कीजिएगा तो वो हमेशा बैकफुट से खलते हैं। कभी नीतीश को आप फ्रंटफुट पर खेलते हुए नहीं देखे होंगे, 1973 के छात्र संघ के चुनाव में वो लालू को नेता बनाने में लगे थे, हारते हारते 1985 में पहली बार विधायक बने ,1990 में जब लालू प्रसाद और रामसुन्दर दास मैदान में थे तो उस समय भी नीतीश लालू के साथ खड़े रहे। यह समझते हुए कि लालू के मुख्यमंत्री बनने के बाद बिहार की राजनीति में उनकी सम्भावना नहीं रहेगी।

लेकिन वो लालू का साथ नहीं छोड़े और जब उन्हें लगने लगा कि उनकी जो राजनीतिक छवि बनी है, वो लालू के साथ रहते कमजोर पड़ सकती है, तो फिर वो लालू का साथ छोड़कर उन्होनें अपनी पार्टी बना ली। 1995 में उनकी पार्टी बुरी तरह से चुनाव हार गयी, वहां भी वो जार्ज फर्नांडिस के पीछे ही खड़े रहे, याद करिए जब 2000 के बिहार विधानसभा चुनाव में राजद ने सबसे अधिक सीट प्राप्त की थी। 66 सीट पर बीजेपी जीत कर आयी थी और नीतीश की पार्टी को मात्र 34 सीट ही मिले था। क्या हुआ अटल बिहारी वाजपेयी जी नीतीश पर भरोसा जताते हुए उन्हें बिहार का मुख्यमंत्री बनने का आग्रह किया। जबकि कहीं से भी वो दूर दूर तक वो बिहार के सीएम पद के उम्मीदवार नहीं थे और 2005 के चुनाव में तो बीजेपी नीतीश के चेहरे पर ही चुनाव मैदान में उतरी।

2020 के चुनाव में भी क्या स्थिति थी, आपको मालूम होगा कि मोदी जैसे शक्तिशाली नेता भी हर सभा में नीतीश सीएम होंगे बोलते हुए थक नहीं रहे थे। मतलब नीतीश ने 35 वर्ष के राजनीतिक जीवन में सामने वाले को यह भरोसा दिलाने में हमेशा कामयाब रहे कि हम साथ रहेंगे तो एक सम्मान जनक स्कोर जरुर खड़ा कर देंगे और इसी विश्वास के साथ नीतीश बिहार से बाहर निकले हैं, उन्हें राजनीति के अंकगणित में नीतीश की क्या हैसियत है ये नीतीश को पता है, इसलिए प्रधानमंत्री पद को लेकर उन्होंने स्थिति साफ कर दिया है ये समझते हुए कि अगर स्थिति बनी तो बन भी सकते हैं, नहीं बने तो खोने के लिए अब बचा ही क्या है?
यही वजह है कि दिल्ली में नीतीश, ममता और केसीआर से अधिक मजबूती के साथ मोदी पर हमलावर भी रहे हैं और जिनसे भी मिलने गये एक सम्मान के साथ इनसे हाथ मिलाया। हर मुलाकात के बाद मोदी पर हमला कर रहे हैं, लेकिन बीजेपी के किसी भी नेता की जुबान तक नहीं खुल रही है। पीएम मोदी ये जरुर बोले कि हमारे खिलाफ सारे भ्रष्टाचारी एक साथ हो रहे हैं, लेकिन नीतीश ऐसा चेहरा है जिस पर अभी भी दाग नहीं और यही ताकत मोदी और शाह को परेशान किये हुए है।

ममता बाहर निकली तो सीबीआई और ईडी के सहारे ऐसा घेराबंदी किया कि उनकी बयानबाजी बंद है वो जबाव देने कि स्थिति में नहीं है कि उनके मंत्री के पास इतने पैसे कहां से आए। बिहार में क्या हुआ राजद के जिन तीन नेता के घर छापेमारी हुई सीबीआई को अनुमान था कि इन तीनों के यहां से( RJD सांसद अशफाक करीम, फैयाज अहमद के अलावा एमएलसी सुनील सिंह) 30 से 40 करोड़ रुपये की सम्पत्ति और नगद और जेबरात के रुपए में जरुर मिलेगा।

लेकिन ऐसा कुछ भी नहीं मिला। अभी हाल यह है कि ईडी बिहार के तीन चार मंत्री के घर, ससुराल नाते रिश्तेदार और दोस्त का डाटा खंगाल रही है कही से कुछ बड़ा मिल जाये क्योंकि बीजेपी के पास यही एक जरिया है, जिसके सहारे नीतीश की घेराबंदी की जा सकती है।

जहां तक मुझे जानकारी है सीबीआई और ईडी की 40 से अधिक अधिकारी इन दिनों बिहार में इसी काम में लगे हैं आरसीपी सिंह को करीब लाने के पीछे भी यही सोंच है कि नीतीश के निवेश का कुछ सबूत दे दें ताकी उन्हें भी भ्रष्ट घोषित किया जा सके।

सृजन में तीसरी बार नये सिरे से अनुसंधान शुरु हुआ है, लेकिन नीतीश तक पहुंच नहीं पा रहा है, इसकी एक बड़ी वजह है कि कही का भी अधिकारी हो नीतीश कुमार को लेकर थोड़ा सोफ्ट रहते हैं क्योंकि अब अधिकारियों में सवर्ण का दबदवा नहीं के बराबर रह गया है जो मोदी के लिए किसी भी हद तक जा सकता है देख नहीं रहे हैं ईडी के हेड को पंडित जी को सेवा विस्तार पर विस्तार किये जा रहे हैं लेकिन मोदी को भरोसेमंद दूसरा अधिकारी नहीं मिल रहा है।

नीतीश इन सब बातों को समझते हैं और सबसे बड़ी बात है उनके पास राजनीति का जो अनुभव है, उस तरह के अनुभव का कोई दूसरा नेता देश के सामने नहीं है, वहीं विपक्ष में जो नेता हैं उनसे नीतीश का हमेशा से बेहतर रिश्ता रहा है।

गौर करने की बात है नीतीश राष्ट्रीय राजनीति में पकड़ मजबूत हो इसके लिए बिहार के सीएम रहते पिछले 10 वर्षों से ही काम कर रहे हैं।

आपको याद है नीतीश कुमार बिहार में गुरुगोविन्द सिंह के 350 वाँ जन्मदिन मना कर सिख के दिलों पर राज कर ही रहे थे और पहली बार देखा जा रहा है कि बिहार के गया जिले में जो पिंड दान कार्यक्रम का आयोजन हो रहा है मौका मिले तो आकर देखिए कितनी भव्यता के साथ आयोजन सरकार कर रही है।पहली बार इस तरह की व्यवस्था देखने को मिल रहा है। मतलब इसी आयोजन के सहारे राष्ट्रीय स्तर पर एक छवि बनाने की तैयारी में हैं। इसलिए मेरी समझ ने नीतीश का आत्मविश्वास बढ़ा क्योंकि बिहार में इन्होंने ऐसी किलाबंदी कर दी है जिसे भेदना फिलहाल मुश्किल दिख रहा है और इस वजह से राष्ट्रीय राजनीति में खुल कर खेलने में इन्हें परेशानी नहीं है।

इन्हीं सब कारणों से नितीश कुमार बिहार के परिवेश से निकलकर राष्ट्रीय स्तर पर मजबूत पहचान बना पाने में सफल साबित हो रहे हैं।

✍️एस० के० सिंह

LEAVE A REPLY

Please enter your comment!
Please enter your name here