प्रतिरोध की आवाज पर पुलिस की दमनात्मक कार्यवाही

कर्नाटक के मशहूर कन्नड़ कवि यस बिसरावल्ली की कविता(निन्नाधाकले या वा गणिडती अर्थात अपना कागज़ कब दिखाओगे..?) आज देशभर में बहुचर्चित हो गया है। इस कन्नड़ कविता को हिन्दी उर्दू मराठी सहित भारत के कई भाषाओं में अनुवाद किया गया है और कई जनसभाओं में सुनाया और पढ़ा जा रहा है...

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अगर आप ये कहें कि देश में सबसे ज्यादा कानून का दुरूपयोग करने वाला पुलिस प्रशासन है तो वो कर्णाटक पुलिस प्रशासन उसमे सबसे आगे नजर आ रहा है। क्योंकि छोटे छोटे बच्चों को ढूंढ ढूंढ कर बेवजह केस बनाकर लोगों को परेशान करना इनका काम बन चुका है। ये बात मैं ऐसे ही नहीं कह रहा हूँ। पिछले दिनों बीदर(कर्नाटक) के शाहीन नामक स्कूल के बच्चों पर देशद्रोह का सेडिशन लगाया जाता है इन बच्चों का कसूर बस इतना है कि ये बच्चे CAA विरोधी व्यंग्यात्मक नाटक में कलाकार की भूमिका में हिस्सा लिया। इन बच्चों की उम्र महज 9 साल है। पता नहीं इन पुलिस ऑफिसर को IPC की धारा 124 में क्या क्या होना चाहिए और किनपर किस वजह से किस तरह इस दण्ड संहिता के तहत मामला बनाया जा सकता है, इसका सामान्य ज्ञान भी नहीं है। कोई सामान्य ज्ञान रखने वाला देश का आम नागरिक को भी ये पता है कि बच्चों से इंवेस्टीगेशन(पूछताछ) करते समय पुलिस को यूनिफॉर्म में नहीं होना चाहिये और इतना ही नहीं बगैर चाइल्ड वेलफेयर ऑफीसर के उनसे कोई पूछताछ नहीं होनी चाहिये। उनके क्लास और स्कूल में घुसकर डर और खोफ़ का वातावरण निर्माण नहीं करना चाहिए।
ये सब जघन्य अपराध है। बच्चों ने अपने नाटक में कहा तो क्या कहा यही न कि “अगर हमें अपनी नागरीकता साबित करने के लिए हमारे दादा परदादा का दस्तावेज दिखाना पड़ेगा तो एक बच्चा ये कहता है उनका देहांत हुए कई साल बीत गए। अब दस्तावेज दिखाने के लिए उन्हें खुद अपने कब्रिस्तान से उठकर आना पड़ेगा। अगर हमसे कोई उनका दस्तावेज मांगे तो हम उन्हें चप्पल से मारेंगे” इस व्यंग्यात्मक कन्वर्सेशन में देशद्रोह कहाँ है?
ये तो लगता है कि छात्रों को परेशान करने के लिए देश भर में फैले हुए नामवर संस्थान को बदनाम करने का सिर्फ एक सडयंत्र है। ऐसा लगता है कि पुलिस ने खुद से या किसी एक दो आदमी के कहने पर देश के कानून के साथ इतना भद्दा मजाक करने की हिम्मत करने की नहीं सोचता। ये तो लगता है कि लोकल बीजेपी सरकार के अपने आकाओं को खुश करने के चक्कर में ये सब किया है। एक या दो बार नहीं पांच बार बच्चों के साथ अमानवीय व्यवहार पुलिस के जरिये किया जाता रहा। इतना ही नहीं निरपराध गुनाह के लिए बच्चों के पोषक और शिक्षकों को भी जेल भेजा गया। यदि ये अपराध है और ऐसा करने वाला पुलिस के विरुद्ध में कार्यवाही की जाती है तो क्यों नहीं उस व्यक्ति का पता लगाया जाय जिसकी वजह से इस प्रकार की अमानवीय घटना संभव हुई।
आजतक एक भी FIR उस व्यक्ति के खिलाफ नहीं हुई जिसने इस तरह की गलत सूचना देकर पुलिस  कार्ययवाही के लिए मजबूर किया। ये अमानवीय घटना पुलिस प्रशासन द्वारा किया जाना और इसके खिलाफ सिविल सोसायटी के द्वारा आवाज नहीं उठाया जाना दोनों निन्दनीय है।
कर्नाटक के मशहूर कन्नड़ कवि यस बिसरावल्ली की कविता(निन्नाधाकले या वा गणिडती अर्थात अपना कागज़ कब दिखाओगे..?) आज देशभर में बहुचर्चित हो गया है। इस कन्नड़ कविता को हिन्दी उर्दू मराठी सहित भारत के कई भाषाओं में अनुवाद किया गया है और कई जनसभाओं में सुनाया और पढ़ा जा रहा है। ये ऐसा नहीं होता ये कन्नड़ तक ही सीमित होता अगर लिखने पर पुलिस अपनी दबंगता नहीं दिखाती। ये ठीक 9 साल के बच्चे पर देशद्रोह का आरोप जैसा है। अगर वही पुलिस ऑफिसर इस पर FIR दर्ज करती तो ये कवि भी उन पुलिस ऑफिसर की नजर में देशद्रोही होता। ऊपरी दबाव के कारण पुलिस ने देशद्रोह के अलग दूसरी धाराओं में केस दर्ज किया है। IPC की धारा 505 statments conducing to public mischief के तहत केस दर्ज किया है।
आइये पढ़कर देखते हैं यस बिसरावल्ली की कविता के खिलाफ की पुलिसिया कार्यवाही कितना उचित है।
कविता हिंदी में “अपना काग़ज़ कब दिखाओगे?
आधार, राशनकार्ड की लाईन में
अंगूठा, सर्वर के खेल में
ज़िन्दगी खोलने वालों के काग़ज़ात पूछने वाले
तू अपने काग़ज कब दिखाओगे?
वतन की आज़ादी के ख़ातिर
हंसते हंसते फांसी पर
चढ़ जाने वालों के
बे नाम ही शहीद हो जाने वाले
तू अपने काग़ज कब दिखाओगे?
ताजमहल, चारमीनार गुम्बद, लाल किला कुतुब
मिनारों की शहादत मांगने वाले
तू काग़ज़ कब दिखाओगे
अंग्रेजों के जूते चाटने वाले
नफरतों के नशे में खून चूसने वाले
गोबल की औलाद
तू अपने काग़ज कब दिखाओगे
पकौड़ा बेचकर जाने वाला
मेरे गांव का चाय बेचने वाला
इंसानियत नहीं बेचा
इज्ज़त नफ़्स नहीं बेचा
झूठ की कहानी नहीं रचा
बता तू अपने काग़ज़ कब दिखायेगा?
कांटो से फ़टे-फूटे ट्यूब टॉवर को
ठीक कर हवा भरने वाला
पंचर वाला अपनी खुदी नहीं बेचा
तूने वतन को ही बेच दिया
बता, तू अपने काग़ज़ कब दिखायेगा
देश को भी धोखा दिया तूने
नक़ली कागज़ बनाना कोई बड़ी बात नहीं
कम से कम इंसानियत तुझमें है
यह कहने वाले कागज़ कब दिखायेगा?

इस पूरी कविता में ना किसी सरकार और सरकारी ऑफिसर का नाम है ना किसी दल और उससे जुड़े नेताओं का नाम है और इस कविता के जरिये ना किसी खास समुदाय को दुख पहुंचाने की कोशिश की गई है और न ही किसी को डराने की कोशिश की गई है। आप किसी कानून के जानकारों से पूछ लें वो भी मेरे आAAकाजैसे ही221क़2 कहेंगे। इसी तरह केस बनते रहे और कल जाकर किसी से दस्तावेज दिखाने की बात करें या उस कविता की भाषा में पूछें जैसे उस कवि ने पूछा है” तुम अपना कागज कब दिखाओगे” क्या प्रशासन उसपर भी केस बनाएगा। यदि ऐसा है तो एनपीआर करने वाले अधिकारियों पर भी एक केस बनाता है। ऐसे भी CAA, NRC की तरह एनपीआर भी नहीं होने वाला है। अगर प्रशासन और सरकार इस तरह कानून के साथ भद्दा मजाक करते हुए भ्रमित है कि CAA NRC NPR के खिलाफ देश भर में चल रहे आंदोलन खत्म हो जाएगा तो इस भ्रम से सरकार को बाहर आना चाहिए। अबतक सरकार फलते फ़ूलते आंदोलन को दबाने की जितनी कोशिश की है आंदोलन उतना ही तीव्र और देश भर में फैलता हुआ नजर आ रहा है।

शाहिद सुमन

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