हाशिमपुरा हिरासती हत्याकांड के 36 वर्ष

लगभग दस वर्षों से उत्तर भारत मे चल रहे राम जन्मभूमि आंदोलन ने पूरे समाज को बुरी तरह से बांट दिया था। उत्तरोत्तर आक्रामक होते जा रहे इस आंदोलन ने ख़ास तौर से हिन्दू मध्यवर्ग को अविश्वसनीय हद तक साम्प्रदायिक बना दिया था। विभाजन के बाद सबसे अधिक साम्प्रदयिक दंगे इसी दौर मे हुए थे। स्वाभाविक था कि साम्प्रदायिकता के इस अन्धड़ से पुलिस और पीएसी के जवान भी अछूते नहीं रहे थे।

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हाशिमपुरा हिरासती हत्याकांड के 36 वर्ष

विभूति नारायण राय

(आज ही के दिन यानि 22/23 मई, 1987 की रात मेरठ के हाशिमपुरा से दर्जनों मुसलमानों को पीएसी की ट्रक में भर कर मुरादनगर और दिल्ली से सटे मकनपुर गाँव में लाया गया और उन्हें गोली मार कर नहर में फेंक दिया गया‌। विभूति नारायण राय उस समय ग़ाज़ियाबाद के पुलिस अधीक्षक थे। उनके ब्लॉग से लिए गए इस लेख में उन्होंने बताया है कि हाशिमपुरा के लोगों के साथ उस रात क्या हुआ था। उनके द्वारा लिखित किताब ‘हाशिमपुरा 22 मई’ उसी हृदयविदारक हत्याकांड, उसके पीछे काम करने वाली मानसिकता, उसके कारणों और इस जघन्य हत्याकांड के बाद चले मुकदमों का विवरण देती है।)

जीवन के कुछ अनुभव ऐसे होते हैं जो ज़िंदगी भर आपका पीछा नहीं छोडते। एक दु:स्वप्न की तरह वे हमेशा आपके साथ चलते हैं और कई बार तो क़र्ज़ की तरह आपके सर पर सवार रहते हैं। हाशिमपुरा भी मेरे लिए कुछ ऐसा ही अनुभव है। 22/23 मई, 1987 की आधी रात दिल्ली ग़ाज़ियाबाद सीमा पर मकनपुर गांव से गुज़रने वाली नहर की पटरी और किनारे उगे सरकंडों के बीच टॉर्च की कमज़ोर रोशनी में ख़ून से लथपथ धरती पर मृतकों के बीच किसी जीवित को तलाशना- सब कुछ मेरे स्मृति पटल पर किसी हॉरर फ़िल्म की तरह अंकित है। उस रात दस-साढ़े दस बजे हापुड़ से वापस लौटा था। साथ में ज़िला मजिस्ट्रेट नसीम ज़ैदी थे, जिन्हें उनके बंग्ले पर उतारता हुआ मैं पुलिस अधीक्षक निवास पर पहुंचा। निवास के गेट पर जैसे ही कार की हेडलाइट्स पड़ी, मुझे घबराया हुआ और उड़ी रंगत वाला चेहरा लिए सब इंसपेक्टर वी बी सिंह दिखाई दिया, जो उस समय लिंक रोड थाने का इंचार्ज था। मेरा अनुभव बता रहा था कि उसके इलाक़े में कुछ गंभीर घटा है। मैंने ड्राइवर को कार रोकने का इशारा किया और नीचे उतर गया।

वी बी सिंह इतना घबराया हुआ था कि उसके लिए सुसंगत तरीक़े से कुछ भी बता पाना संभव नहीं लग रहा था। हकलाते हुए और असंबद्ध टुकड़ों में उसने जो कुछ मुझे बताया वह स्तब्ध कर देने के लिए काफ़ी था। मेरी समझ में इतना तो आ गया कि उसके थाना क्षेत्र में कहीं नहर के किनारे पीएसी ने कुछ मुसलमानों को मार दिया है। क्यों मारा? कितने लोगों को मारा? कहां से लाकर मारा? स्पष्ट नहीं था।

कई बार उसे अपने तथ्यों को दुहराने के लिए कह कर मैंने पूरे घटनाक्रम के टुकड़े-टुकड़े जोड़ते हुए एक नैरेटिव तैयार करने की कोशिश की। जो चित्र बना उसके अनुसार वी बी सिंह थाने में अपने कार्यालय में बैठा हुआ था कि लगभग 9 बजे उसे मकनपुर की तरफ़ से फ़ायरिंग की आवाज़ सुनाई दी। उसे और थाने में मौजूद दूसरे पुलिसकर्मियों को लगा कि गांव में डकैती पड़ रही है।

आज तो मकनपुर गांव का नाम सिर्फ़ रेवेन्यू रिकॉर्ड्स में है। आज के गगनचुंबी आवासीय इमारतों, मॉल और व्यावसायिक प्रतिष्ठानों वाले मकनपुर में 1987 में दूर-दूर तक बंजर ज़मीन पसरी हुई थी। इसी बंजर ज़मीन के बीच की एक चक रोड पर वी बी सिंह की मोटरसाइकिल दौड़ी। उसके पीछे थाने का एक दारोग़ा और एक अन्य सिपाही बैठे थे।

वे चक रोड पर सौ गज़ भी नहीं पहुंचे थे कि सामने से तेज़ रफ़्तार से एक ट्रक आता हुआ दिखाई दिया। अगर उन्होंने समय रहते हुए अपनी मोटरसाइकिल चक रोड से नीचे न उतार दी होती तो ट्रक उन्हें कुचल देता। अपना संतुलन संभालते-संभालते जितना कुछ उन्होंने देखा उसके अनुसार ट्रक पीले रंग का था और उस पर पीछे 41 लिखा हुआ था, पिछली सीटों पर ख़ाकी कपड़े पहने कुछ लोग बैठे हुए दिखे।

किसी पुलिसकर्मी के लिए यह समझना मुश्किल नहीं था कि पीएसी की 41वीं बटालियन का ट्रक कुछ पीएसी कर्मियों को लेकर गुज़रा था। पर इससे गुत्थी और उलझ गई। इस समय मकनपुर गांव में पीएसी का ट्रक क्यों आ रहा था? गोलियों की आवाज़ के पीछे क्या रहस्य था? वी बी सिंह ने मोटरसाइकिल वापस चक रोड पर डाली और गांव की तरफ़ बढ़ा।

मुश्किल से एक किलोमीटर दूर जो नज़ारा उसने और उसके साथियों ने देखा, वह रोंगटे खड़े कर देने वाला था। मकनपुर गांव की आबादी से पहले चक रोड एक नहर को काटती थी। नहर आगे जाकर दिल्ली की सीमा में प्रवेश कर जाती थी। जहां चक रोड और नहर एक दूसरे को काटते थे वहां पुलिया थी। पुलिया पर पहुंचते-पहुंचते वी बी सिंह की मोटरसाइकिल की हेडलाइट जब नहर के किनारे सरकंडे की झाड़ियों पर पड़ी तो उन्हें गोलियों की आवाज़ का रहस्य समझ में आया।

चारों तरफ़ ख़ून के धब्बे बिखरे पड़े थे। नहर की पटरी, झाड़ियों और पानी के अंदर ताज़ा जख़्मों वाले शव पड़े थे। वी बी सिंह और उसके साथियों ने घटनास्थल का मुआयना कर अंदाज़ा लगाने की कोशिश की कि वहां क्या हुआ होगा? उनकी समझ में सिर्फ़ इतना आया कि वहां पड़े शवों और रास्ते में दिखे पीएसी की ट्रक में कोई संबंध ज़रूर है।

साथ के सिपाही को घटनास्थल पर निगरानी के लिए छोड़ते हुए वी बी सिंह अपने साथी दारोग़ा के साथ वापस मुख्य सड़क की तरफ़ लौटा। थाने से थोड़ी दूर ग़ाज़ियाबाद-दिल्ली मार्ग पर पीएसी की 41वीं बटालियन का मुख्यालय था। दोनों सीधे वहीं पहुंचे। बटालियन का मुख्य द्वार बंद था। काफ़ी देर बहस करने के बावजूद भी संतरी ने उन्हें अंदर जाने की इजाज़त नहीं दी।

इसके बाद वी बी सिंह ने ज़िला मुख्यालय आकर मुझे बताने का फ़ैसला किया। जितना कुछ आगे टुकड़ों-टुकड़ों में बयान किए गए वृतांत से मैं समझ सका, उससे स्पष्ट हो ही गया था कि जो घटा है वह बहुत ही भयानक है और दूसरे दिन ग़ाज़ियाबाद जल सकता था। पिछले कई हफ़्तों से बग़ल के ज़िले मेरठ में सांप्रादायिक दंगे चल रहे थे और उसकी लपटें ग़ाज़ियाबाद पहुंच रही थीं।

मैंने सबसे पहले ज़िला मजिस्ट्रेट नसीम ज़ैदी को फ़ोन किया। वे सोने ही जा रहे थे। उन्हें जागने के लिए कह कर मैंने ज़िला मुख्यालय पर मौजूद अपने एडिशनल एसपी, कुछ डिप्टी एसपी और मजिस्ट्रेटों को जगाया और तैयार होने के लिए कहा। अगले चालीस-पैंतालीस मिनटों में सात-आठ वाहनों में लदे-फंदे हम मकनपुर गांव की तरफ़ लपके।

नहर की पुलिया से थोड़ा पहले हमारी गाड़ियां खड़ीं हो गईं। नहर के दूसरी तरफ़ थोड़ी दूर पर ही मकनपुर गांव की आबादी थी लेकिन तब तक कोई गांव वाला वहां नहीं पहुंचा था। लगता था कि दहशत ने उन्हें घरों में दुबकने पर मजबूर कर दिया था। थाना लिंक रोड के कुछ पुलिसकर्मी ज़रूर वहां पहुंच गए थे।

उनकी टार्चों की रोशनी के कमज़ोर वृत्त नहर के किनारे उगी घनी झाड़ियों पर पड़ रहे थे लेकिन उनसे साफ़ देख पाना मुश्किल था। मैंने गाड़ियों के ड्राइवरों से नहर की तरफ़ रुख़ करके अपने हेडलाइट्स ऑन करने के लिए कहा। लगभग सौ गज़ चौड़ा इलाक़ा प्रकाश से नहा उठा। उस रोशनी में मैंने जो कुछ देखा, वह वही दु:स्वप्न था जिसका ज़िक्र मैंने शुरू में किया है।

गाड़ियों की हेडलाइट्स की रोशनियां झाड़ियों से टकरा कर टूट-टूट जा रहीं थीं, इसलिए टार्चोंं का भी इस्तेमाल करना पड़ रहा था। झाड़ियों और नहरों के किनारे ख़ून के थक्के अभी पूरी तरह से जमे नहीं थे, उनमें से ख़ून रिस रहा था। पटरी पर बेतरतीबी से शव पड़े थे – कुछ पूरे झाड़ियों में फंसे तो कुछ आधे तिहाई पानी में डूबे। शवों की गिनती करने या निकालने से ज़्यादा ज़रूरी मुझे इस बात की पड़ताल करना लगा कि उनमें से कोई जीवित तो नहीं है!

सबने अलग-अलग दिशाओं में टार्चों की रोशनियां फेंक-फेंक कर अंदाज़ा लगाने की कोशिश की कि कोई जीवित है या नहीं! बीच-बीच में हम हांक भी लगाते रहे कि यदि कोई जीवित हो तो उत्तर दे।‌हम दुश्मन नहीं दोस्त हैं। उसे अस्पताल ले जाएंगे। लेकिन कोई जवाब नहीं मिला। निराश होकर हम में से कुछ पुलिया पर बैठ गए। मैंने और ज़िलाधिकारी ने तय किया कि समय खोने से कोई लाभ नहीं है।

हमें दूसरे दिन की रणनीति बनानी थी इसलिए जूनियर अधिकारियों से शवों को निकालने और ज़रूरी लिखा-पढ़ी करने के लिए कह कर हम लिंक रोड थाने के लिए मुड़े ही थे कि नहर की तरफ़ से खांसने की आवाज़ सुनाई दी। सभी ठिठक कर रुक गए। मैं वापस नहर की तरफ़ लपका। फिर मौन छा गया। स्पष्ट था कि कोई जीवित था लेकिन उसे यक़ीन नहीं था कि जो लोग उसे तलाश रहे हैं, वे मित्र हैं।

हमने फिर आवाज़ें लगानी शुरू कीं। टार्च की रोशनी अलग-अलग शरीरों पर डालीं और अंत में हरकत करते हुए एक शरीर पर हमारी नज़रें टिक गईं। कोई दोनों हाथों से झाड़ियां पकड़े आधा शरीर नहर में डुबोये इस तरह पड़ा था कि बिना ध्यान से देखे यह अन्दाज़ा लगाना मुश्किल था कि वह जीवित है या मृत! वह दहशत से बुरी तरह कांप रहा था और काफ़ी देर तक आश्वस्त करने के बाद यह विश्वास कर पाया कि हम उसे मारने नहीं, बचाने वालें हैं। जो व्यक्ति अगले कुछ घंटे हमें इस लोमहर्षक घटना की जानकारी देने वाला था, उसका नाम बाबूदीन था।

गोली उसे छूते हुए निकल गई थी। भय से निश्चेष्ट होकर वह झाड़ियों में गिरा तो भाग-दौड़ में उसके हत्यारों को यह जांचने का मौक़ा नहीं मिला कि वह जीवित है या मर गया! दम साधे वह आधा झाड़ियों और आधा पानी में पड़ा रहा और इस तरह मौत के मुंह से वापस लौट आया। उसे कोई ख़ास चोट नहीं आयी थी और नहर से चलकर वह गाड़ियों तक आया। बीच में पुलिया पर बैठकर थोड़ी देर सुस्ताया भी।

लगभग 21 वर्षों बाद जब हाशिमपुरा पर एक किताब लिखने के लिए सामग्री इकट्ठा करते समय मेरी उससे मुलाक़ात हुई, जहां पीएसी उसे उठा कर ले गई थी तो उसे याद था कि पुलिया पर बैठे उसे किसी सिपाही से मांग कर बीड़ी दी थी। बाबूदीन ने जो बताया, उसके अनुसार उस दिन शाम के वक़्त तलाशियों के दौरान पीएसी के एक ट्रक पर बैठाकर चालीस-पचास लोगों को ले जाया गया तो उन्होंने समझा कि उन्हें गिरफ़्तार कर किसी थाने या जेल ले जाया जा रहा है। मकनपुर पहुंचने के लगभग पौन घंटा पहले एक नहर पर ट्रक को मुख्य सड़क से उतारकर नहर की पटरी पर कुछ दूर ले जाकर रोक दिया गया। पीएसी के जवान कूद कर नीचे उतर गए और उन्होंने ट्रक पर सवार लोगों को नीचे उतरने का आदेश दिया। अभी आधे लोग ही उतरे थे कि पीएसी वालों ने उन पर‌ फ़ायर करना शुरू कर दिया। गोलियां चलते ही ऊपर वाले गाड़ी में ही दुबक गए‌। बाबूदीन भी उनमें से एक था। बाहर उतरे लोगों का क्या हुआ, वह सिर्फ़ अनुमान ही लगा सकता था।

शायद फ़ायरिंग की आवाज़ आसपास के गांवों में पहुंची, जिसके कारण आसपास से शोर सुनाई देने लगा और पीएसी वाले वापस ट्रक में चढ़ गए। ट्रक तेज़ी से बैक हुआ और वापस ग़ाज़ियाबाद की तरफ़ भागा। यहां वह मकनपुर वाली नहर पर आया और एक बार फिर सबसे उतरने के लिए कहा गया। इस बार डर कर ऊपर दुबके लोगों ने उतरने से इन्कार कर दिया तो उन्हें खींच-खींच कर नीचे घसीटा गया।

जो नीचे आ गए उन्हें पहले की तरह गोली मारकर नहर में फेंक दिया गया और जो डर कर ऊपर दुबके रहे उन्हें ऊपर ही गोली मारकर नीचे धकेला गया। बाबूदीन जब यह विवरण बता रहा था तो हमने पहले घटनास्थल का अंदाज़ा लगाने की कोशिश की। किसी ने सुझाव दिया कि पहला घटनास्थल मेरठ से ग़ाज़ियाबाद आते समय रास्ते में मुरादनगर थाने में पड़ने वाली नहर हो सकती है।

मैंने लिंक रोड थाने के वायरलेस सेट से मुरादनगर थाने को कॉल किया तो स्पष्ट हुआ कि हमारा सोचना सही था। कुछ देर पहले ही मुरादनगर थाने को भी ऐसी ही स्थिति से गुज़रना पड़ा था। वहां भी कई मृत शव नहर में पड़े मिले थे और कुछ लोग जीवित थाने लाए गए थे।

इसके बाद की कथा एक लंबा और यातनादायक प्रतीक्षा का वृतांत है, जिसमें भारतीय राज्य और अल्पसंख्यकों के रिश्ते, पुलिस का ग़ैर-पेशेवराना रवैया और घिसट-घिसट कर चलने वाली उबाऊ न्यायिक प्रणाली जैसे मुद्दे जुड़े हुए हैं। मैंने 22 मई, 1987 को जो मुक़दमे ग़ाज़ियाबाद के थाना लिंक रोड और मुरादनगर पर दर्ज कराए थे वे पिछले 21 वर्षों से विभिन्न बाधाओं से टकराते हुए अभी भी अदालत में चल रहे हैं और अपनी तार्किक परिणति की प्रतीक्षा कर रहें हैं।

मैं लगातार सोचता रहा हूं कि कैसे और क्यों कर हुई होगी ऐसी लोमहर्षक घटना? होश-ओ-हवास में कैसे एक सामान्य मनुष्य किसी की जान ले सकता है? वह भी एक की नहीं पूरे समूह की? बिना किसी ऐसी दुश्मनी के जिसके कारण आप क्रोध से पागल हुए जा रहे हों, कैसे आप किसी नौजवान के सीने से सटाकर अपनी रायफ़ल का घोड़ा दबा सकते हैं? बहुत सारे प्रश्न हैं जो आज भी मुझे मथते हैं।

इन प्रश्नों के उत्तर तलाशने के लिये हमें उस दौर को याद करना होगा जब यह घटना घटी थी। बड़े ख़राब थे वे दिन। लगभग दस वर्षों से उत्तर भारत मे चल रहे राम जन्मभूमि आंदोलन ने पूरे समाज को बुरी तरह से बांट दिया था। उत्तरोत्तर आक्रामक होते जा रहे इस आंदोलन ने ख़ास तौर से हिन्दू मध्यवर्ग को अविश्वसनीय हद तक साम्प्रदायिक बना दिया था। विभाजन के बाद सबसे अधिक साम्प्रदयिक दंगे इसी दौर मे हुए थे। स्वाभाविक था कि साम्प्रदायिकता के इस अन्धड़ से पुलिस और पीएसी के जवान भी अछूते नहीं रहे थे। पीएसी पर तो पहले से भी साम्प्रदायिक होने के आरोप लगते रहे हैं।

मैनें इस किताब के सिलसिले में वी. के.‌ बी. नायर, जो दंगों के शुरुआती दौर में मेरठ के वरिष्ठ पुलिस अधीक्षक थे, से एक लम्बा इंटरव्यू लिया था और जो बातें 23 साल बाद भी उन्हें याद थीं उनमें एक घटना बड़ी मार्मिक थी। दंगे शुरू होने के दूसरे या तीसरे दिन ही एक रात शोर-शराबा सुनकर जब वे घर के बाहर निकले तो उन्होनें देखा कि उनके दफ़्तर में काम करने वाला मुसलमान स्टेनोग्राफ़र बंग्ले के बाहर बीवी-बच्चों के साथ खड़ा है और बुरी तरह से दहशतज़दा उसके बच्चे चीख़-चिल्ला रहे हैं। पता चला कि पुलिस लाइन में रहने वाले इस परिवार पर वहां कैम्प कर रहे पीएसी के जवान कई दिनों से फ़िक़रे कस रहे थे और आज अगर अपने कुछ पड़ोसियों की मदद से वे भाग नहीं निकले होते तो सम्भवतः उनके क्वार्टर पर हमला कर उन्हें मार दिया जाता। पूरे दंगों के दौरान यह परिवार वरिष्ठ पुलिस अधीक्षक निवास में शरण लिये पड़ा रहा।‌ मेरठ से जब कुछ मुसलमान क़ैदी फ़तेहगढ़ जेल ले जाए गए तो उनमें से कई को वहां के बन्दियों और वार्डरों ने हमला करके मार डाला। ऐसे ही भयानक थे वे दिन!

फिर भी वे इस हद तक कैसे गये होंगे – मैं इस गुत्थी को सुलझाना चाहता था। मैं हत्यारों की उस मानसिकता को समझना चाहता था जिसके तहत बिना किसी पूर्व परिचय या व्यक्तिगत दुश्मनी के,‌ उन्होनें निहत्थे और अपनी अभिरक्षा में मौजूद नौजवान लड़कों को एक-एक करके भून डाला और असहाय, ज़मीन पर छ्टपटाते घायलों पर भी तब तक गोलियां चलायीं जब तक उन्हें यक़ीन नहीं हो गया कि उनका काम तमाम हो गया है। मैंने 23 साल इन प्रश्नों के उत्तर तलाशने में लगाये हैं और अब जब काफ़ी हद तक यह गुत्थी सुलझ गयी है, मैं अपनी किताब पर काम करने बैठा हूं।

मुझे अफ़सोस है कि प्लाटून कमांडर सुरेन्द्र सिंह, जो इस पूरी कथा का नायक या खलनायक है, अब मर चुका है और उसके साथ बिताये वे बहुत सारे घंटे बेकार हो गये हैं जिनके दौरान मैंने उस मानसिकता को समझने का प्रयास किया था जिसके चलते वह अपने नेतृत्व वाली एक छोटी-सी टुकड़ी से ऐसा जघन्य काम करवा पाया होगा। मेरी स्मृति और बातचीत के बाद लिये गये छिटपुट नोट्स में कई दिलचस्प चीज़ें दर्ज हैं लेकिन मैं अब उनका इस्तेमाल बहुत कम और अनिवार्य होने पर ही करूंगा जिससे किसी को यह कहने का मौक़ा न मिले कि मैंने उसमें कुछ अपनी तरफ़ से जोड़ा या घटाया है। इसी तरह पीएसी की 41वीं बटालियन के तत्कालीन कमांडेंट जोध सिहं भंडारी भी अब जीवित नही हैं। अत: उनके साथ हुई अपनी लम्बी बातचीत का ज़िक्र भी अपरिहार्य होने पर ही करूंगा। यह कथा दरअस्ल एक ऐसे क़र्ज़ को चुकाने का प्रयास है जो 22 मई 1987 से मेरे सीने पर एक बोझ की तरह लदा है।

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