केंद्र सरकार फिर से नागरिकता अधिनियम विधेयक को संसद के पेश करने की तैयारी में है.

भारतीय संविधान का अनुच्छेद 14 कहता है, “कानून के समक्ष समानता राज्य किसी भी व्यक्ति को कानून से पहले समानता या भारत के क्षेत्र के भीतर कानूनों के समान संरक्षण से इनकार नहीं करेगा। धर्म, जाति, जाति, लिंग या स्थान के आधार पर भेदभाव का निषेध जन्म का। ”किसी भी धार्मिक आधार पर नागरिकता बिल में कोई भी बदलाव संविधान के अनुच्छेद 14 का उल्लंघन होगा।

0
215
Guwahati: Activists of Krishak Mukti Sangram Samiti raise slogans during a protest against the Citizenship Amendment Bill (2016) in Guwahati, Friday, Nov. 22, 2019. (PTI Photo) (PTI11_22_2019_000014B)

केंद्र सरकार फिर से नागरिकता अधिनियम विधेयक को संसद के पेश करने की तैयारी में है

इस बिल के साथ कई समस्याएं हैं और उनमें से कुछ सीधे संविधान के मूल सिद्धांतों और यहां तक कि भारत के पूरे विचार का उल्लंघन कर रहे हैं।
यह विधेयक अफगानिस्तान, बांग्लादेश और पाकिस्तान में अल्पसंख्यक समुदायों (हिंदू, सिख, बौद्ध, जैन, पारसी और ईसाई) से अवैध प्रवासियों को अनुमति देगा इसको 1955 के नागरिकता अधिनियम में संशोधन करके किया जाएगा।
विधेयक में मौलिक समस्या: –

गांधी जी ने कहा “मेरे स्वप्न का स्वराज कोई जाति या धार्मिक भेद नहीं मानता है। यह पत्रावलियों या एक पैसे वाले पुरुषों का एकाधिकार होना नहीं है। स्वराज सभी के लिए है, जिसमें पूर्व भी शामिल है, लेकिन सशस्त्र रूप से, मैमेड, अंधा, भूखे, मेहनतकश लाखों में। “(वाईआई, 1-5-1930, पी। 149)
तो कुछ भी जो सरकारी कार्य नस्लीय आधार पर किया जाता हो वो न केवल संविधान के खिलाफ है बल्कि भारत के राष्ट्र पिता के विचारो के विपरीत है।

भारतीय संविधान का अनुच्छेद 14 कहता है, “कानून के समक्ष समानता राज्य किसी भी व्यक्ति को कानून से पहले समानता या भारत के क्षेत्र के भीतर कानूनों के समान संरक्षण से इनकार नहीं करेगा। धर्म, जाति, जाति, लिंग या स्थान के आधार पर भेदभाव का निषेध जन्म का। ”किसी भी धार्मिक आधार पर नागरिकता बिल में कोई भी बदलाव संविधान के अनुच्छेद 14 का उल्लंघन होगा।
NRC और CAB कनेक्शन: इससे केंद्र सरकार की एक शातिर प्रयास के रूप में देखा जा सकता है , इस बिल का उपयोग उन सभी गैर-मुस्लिमों को नागरिकता देने के लिए जायेगा जो NRC प्रक्रिया में छूट हुए हैं।

बिल उन लोगों के बारे में बात करता है जो मुस्लिम और यहूदी को छोड़कर पड़ोसी देशों में अल्पसंख्यक हैं, विधेयक के समर्थन में जो तर्क प्रस्तुत किया गया है, वह यह है कि “यह आसपास के देशों में अल्पसंख्यकों को उत्पीड़न से बचाएगा”, इसलिए यहाँ सवाल यह है, केवल अल्पसंख्यक पर अत्याचार हो रहा है या बहुसंख्यक समुदाय के लोगों में भी कुछ लोगो पर भी अत्याचार हो रहा है।
यह बिल पूर्वोत्तर और बंगाल क्षेत्र में स्वदेशी समुदायों की जनसांख्यिकी के लिए बहुत बड़ा खतरा है।
यह विधेयक भारतीयों के लिए उनकी धर्मनिरपेक्षता का प्रमाण देने के लिए एक परीक्षण के अलावा कुछ भी नहीं है, जिसके लिए हमारे पूर्वजों ने अंग्रेजों के खिलाफ और दो राष्ट्र सिद्धांत के खिलाफ संघर्ष किया था।

गांधी जी ने यह भी कहा, “स्वराज का अर्थ है सरकारी नियंत्रण से स्वतंत्र होने के लिए निरंतर प्रयास, चाहे वह विदेशी सरकार हो या चाहे वह राष्ट्रीय हो।” (वाईआई, 6-8-1925, पी। 276) इसलिए किसी भी चीज के लिए जो भारत और संविधान के विचार के खिलाफ है, वह ऐसी चीज है जिसके लिए हम सभी संघर्ष करने पर प्रतिबद्ध है।

आगे का रास्ता :
2013 में भूमि अधिग्रहण अधिनियम संसद द्वारा पारित किया गया था लेकिन किसान के भारी विरोध के कारण 2014 में रोलबैक किया गया, इसी तरह देश के नागरिक सड़क पर आते हैं तो यह बिल भी वापस ले लिया जाएगा। उनके पास संसदीय बहुमत हो सकती है लेकिन नैतिक बहुमत नहीं।

Nadeem Khan

LEAVE A REPLY

Please enter your comment!
Please enter your name here