इस्लाम के सांस्कृतिक पक्ष को उजागर करती एक किताब

लेखक बताता है कि इस्लामी सभ्यता की छाया में विज्ञान, कला, अनुसंधान और आविष्कार की एक अनूठी आकाशगंगा अस्तित्व में आती है जहां लोगों को विचार करने और उन्हें व्यक्त करने की आज़ादी होती है। लोगों को बहुत से अवसर उपलब्ध होते हैं, जिनके परिणामस्वरूप नवाचारों की एक नई दुनिया सामने आती है और ऐसे आविष्कार होते हैं जो मानव जाति के लिए केवल लाभदायक सिद्ध होते हैं, जिनसे किसी नुक़सान या बुराई का डर नहीं होता।

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इस्लाम के सांस्कृतिक पक्ष को उजागर करती एक किताब

अब्दुल्लाह अमीन

मार्माडूक पिकथॉल (Marmaduke Pickthall) की पुस्तक ‘The Cultural Side of Islam’ नज़र से गुज़री। इस किताब का संपादन अलीगढ़ मुस्लिम यूनिवर्सिटी के एक शोध छात्र उसामा हमीद ने किया है। इस पुस्तक की विशेषता यह है कि यह संस्कृति या सभ्यता पर सामान्य पारंपरिक चर्चा से हटकर एक अनूठा दृष्टिकोण रखती है। सामान्यतः, भाषा एवं साहित्य, शिष्टाचार एवं कला, भोजन एवं वस्त्र इत्यादि को संस्कृति और सभ्यता के तत्वों के रूप में देखा जाता है। लेकिन इस पुस्तक में इन बाहरी और भौतिक तत्वों को द्वितीय श्रेणी में रखते हुए, लेखक ने समझाया है कि इस्लामी संस्कृति का आधार न केवल इन बाहरी और भौतिक चीज़ों पर है, बल्कि इस सभ्यता की नींव सार्वभौमिक भाईचारे, आपसी सहयोग, करुणा और परोपकार जैसे उच्च नैतिक और आध्यात्मिक मूल्यों पर आधारित है।

इसे आगे स्पष्ट करते हुए लेखक कहता है कि इस्लामी सभ्यता की नींव और महत्वपूर्ण विशेषताओं में यह तथ्य शामिल है कि जब यह सभ्यता अपने पूरे अस्तित्व के साथ लोगों के सामने आती है, तो यह अपने साथ कुछ ऐसे आंतरिक और आध्यात्मिक सिद्धांत लेकर आती है, जिनके आधार पर सार्वभौमिक भाईचारे पर आधारित एक संयुक्त राष्ट्र के अस्तित्व का उदय होता है और यह कि इस सार्वभौमिक भाईचारे के परिणामस्वरूप गठित सार्वभौमिक एकता की नींव में तौहीद, रिसालत और आखिरत पर विश्वास और उनके नियमों पर कार्य करने की शक्ति विद्यमान होती है। साथ ही, इस सभ्यता के तहत पले-बढ़े लोगों की मुख्य विशेषता यह होती है कि ईश्वर की एकता में विश्वास करने के परिणामस्वरूप उनकी ब्रह्मांड के बारे में अवधारणा और जीवन को देखने का तरीक़ा सार्वभौमिक हो जाता है। वे सभी मनुष्यों को ईश्वर की सबसे महान रचना के रूप में देखते हैं और सभी मनुष्यों के साथ न्याय, समानता, सहयोग और करुणा का व्यवहार करते हैं। ऊंच-नीच, रंग-जाति और भाषा या क्षेत्र के आधार पर कोई भेदभाव नहीं होता, इस सभ्य समाज में रहने वाले प्रत्येक व्यक्ति को समानता का दर्जा मिलता है।

इस्लामी सभ्यता और उसकी नींव का अर्थ समझाने के बाद, लेखक बताता है कि इस्लामी सभ्यता की छाया में विज्ञान, कला, अनुसंधान और आविष्कार की एक अनूठी आकाशगंगा अस्तित्व में आती है जहां लोगों को विचार करने और उन्हें व्यक्त करने की आज़ादी होती है। लोगों को बहुत से अवसर उपलब्ध होते हैं, जिनके परिणामस्वरूप नवाचारों की एक नई दुनिया सामने आती है और ऐसे आविष्कार होते हैं जो मानव जाति के लिए केवल लाभदायक सिद्ध होते हैं, जिनसे किसी नुक़सान या बुराई का डर नहीं होता।

लेखक केवल दावों के आधार पर इन विशेषताओं का वर्णन करने के तक सीमित नहीं रहता है, बल्कि वह सबूत के रूप में इस्लामी इतिहास और परंपराओं के सिद्ध तथ्यों के साथ अपनी बात की पुष्टि करता है। वह विशेष रूप से इस्लामी इतिहास का वर्णन करता है जब यह सभ्यता अपने चरम पर थी।

अगले अध्याय में लेखक, इस्लामी सभ्यता के उत्थान और पतन के कारणों की चर्चा करते हुए, उन विशेषताओं का उल्लेख करता है जिनके द्वारा इस्लामी सभ्यता दिन-रात विकसित होने में सक्षम थी। वह इन गुणों और विशेषताओं में सबसे प्रमुख विशेषता मानवता और परोपकार की भावना बताता है। इसे समझाते हुए वह आगे कहता है कि इस्लाम और इस्लामी क़ानून की नज़र में सभी इंसान समान व्यवहार के पात्र हैं और इस्लाम सभी मनुष्यों को समान अधिकार प्रदान करता है और उनके साथ समान व्यवहार करता है। किसी के साथ केवल इस आधार पर भेदभाव नहीं किया जाता कि वह किसी विशेष धर्म या राष्ट्र का है या वह किसी विशेष दल का सदस्य है। बल्कि इस्लामी संस्कृति के फल से सभी लोगों को समान रूप से लाभ होता है।

मुसलमानों के पतन के कारणों में प्रेरक, संकीर्णता, आलस्य, विद्वानों की भूमिका में गिरावट और नेतृत्वकर्ताओं व आम लोगों के बीच जवाबदेही की कमी आदि जैसी विशेषताओं की भूमिका प्रमुख रूप से उल्लिखित है। ये वे बुरे गुण हैं जिनके कारण इस्लामी सभ्यता का पतन हुआ। इन बुरे लक्षणों की उत्पत्ति के कारण मुसलमान धीरे-धीरे आंतरिक और बाह्य रूप से अपमानित होते चले गए। उन्होंने अपने सुल्तानों को आंतरिक रूप से जवाबदेह ठहराना बंद कर दिया और बाहरी दुनिया में ग़ैर-मुस्लिम लोगों के प्रति पूर्वाग्रह, संकीर्णता और असहिष्णुता का रवैया अपना लिया। ये वे बिंदु हैं जिन्हें लेखक मुसलमानों के उत्थान और पतन के कारणों के रूप में वर्णित करता है।

तीसरे अध्याय में लेखक ने सार्वभौम भाईचारे पर आधारित राष्ट्र की अवधारणा को इस्लामी इतिहास द्वारा सिद्ध करने के बाद क़ुरआन के तर्कों से भी इसे सिद्ध किया है। वह इस्लाम के पांच मूल स्तंभों को तर्क के रूप में प्रस्तुत करते हुए बताता है कि इस्लाम द्वारा प्रदान की जाने वाली नमाज़ की व्यवस्था इस्लामी भाईचारे व राष्ट्र की एकता को और अधिक मज़बूत करती है। साल में एक बार हज यात्रा इस समुदाय में भाईचारा व एकजुटता और उनके एक ही शरीर होने की भावना को पुनर्जीवित करती है। साथ ही ज़कात की व्यवस्था इस्लामी समाज में रहने वाले हर ज़रूरतमंद का भरण-पोषण करती है। और बैत-उल-माल के माध्यम से, धर्म या राष्ट्रीयता से ऊपर उठ कर, प्रत्येक योग्य व्यक्ति को उसका अधिकार प्राप्त होता है। आपसी सहायता का यह कार्य निस्वार्थ भाव से, सद्भावना और करुणा की दृष्टि से किया जाता है।

उसके बाद, लेखक ने शिक्षा हासिल करने पर ज़ोर देकर बताया है कि इस्लाम ने ज्ञान की प्राप्ति को हर मुस्लिम पुरुष एवं महिला पर एक कर्तव्य के रूप में निर्धारित किया है। ज्ञान की प्राप्ति का अर्थ केवल प्राचीन और पारंपरिक विज्ञानों को जानना ही नहीं है, बल्कि शोध और सिद्ध तथ्यों पर आधारित समकालीन और आधुनिक ज्ञान की प्राप्ति भी अत्यंत महत्वपूर्ण है। इन विज्ञानों में कुशलता के बिना मुसलमान उच्चतम स्तर तक नहीं पहुंच सकते। ये वे विचार हैं जिन्हें लेखक इस भाषण संग्रह में व्यक्त करता है।

चौथे अध्याय में, लेखक ने इस्लामी सभ्यता के उत्थान के दौरान शिखर तक पहुंचाए गए विज्ञान और कलाओं का उल्लेख किया है। वह बताता है कि इस्लामी संस्कृति की प्रकृति और उसमें रहने वाले लोगों की सोच इस तरह से बनती है कि इस सभ्यता का प्रत्येक व्यक्ति अपने विभाग से संबंधित विज्ञान और कला में रचनात्मकता का प्रदर्शन करते हुए मानव जीवन के सभी संबंधित क्षेत्रों में अपनी रचनाओं और आविष्कारों को प्रस्तुत करता है। साथ ही, इन विज्ञानों और कलाओं की प्रकृति न केवल संवेदी और प्रायोगिक अनुसंधान तक सीमित है, बल्कि मानव जीवन के एक महत्वपूर्ण पहलू, सौंदर्य स्वाद को भी पूरी तरह से संतुष्ट करती है। वह आगे कहता है कि इस्लामी सभ्यता और संस्कृति में वैज्ञानिक और प्रायोगिक अनुसंधान के साथ, विज्ञान और कला की दुनिया में कुछ अनोखे और विशेष अध्याय स्थापित हुए, जिनका उदाहरण मानव जगत की किसी अन्य सभ्यता द्वारा प्रस्तुत नहीं किया जा सकता है। जैसे वास्तुकला, सुलेख, जिरह की कला, एंथ्रोपोलॉजी, स्मारकों और परंपराओं का संपादन, इस्लामी न्यायशास्त्र, अरबी भाषा और साहित्य, और सूफ़ीवाद पर आधारित विज्ञान और कला।

सहिष्णुता और परोपकार के शीर्षक के तहत पांचवें अध्याय में लेखक कहता है कि इस्लामी युग  के दौरान, राजकुमारों और सुल्तानों और आम लोगों, विशेष रूप से ग़ैर-मुस्लिमों के बीच संबंध इतने खुशगवार थे कि जब क्रूसेड के दौरान ईसाइयों ने इस्लामी दुनिया हमला किया पर तो ग़ैर-मुस्लिम लोग इस्लामी सेना की तरफ़ से आक्रमणकारियों से लड़ने के लिए आ गए और अपने सह-धर्म योद्धाओं के शासन के तहत रहने के बजाए मुस्लिम शासकों की छाया में रहना पसंद किया। इस तरह के एक अनुकरणीय मॉडल का कारण केवल मुस्लिम शासकों द्वारा अपनी ग़ैर-मुस्लिम जनता के प्रति परोपकार और सहिष्णुता के रूप में अपनाए गए उत्कृष्ट गुण थे।

अध्याय छः नियति की समस्या पर चर्चा करता है। इस अध्याय में, मुसलमानों के बीच प्रचलित नियति की झूठी अवधारणा की आलोचना करते हुए लेखक कहता है कि मुसलमानों के उत्थान और पतन का कारण नियति का निश्चित निर्णय नहीं होता, बल्कि एक विशेष ईश्वरीय क़ानून के तहत निर्धारित किया जाता है, कि किन विशेषताओं से समृद्ध राष्ट्र को उत्थान और विकास प्रदान किया जाएगा, और किन बुरे लक्षणों से पीड़ित राष्ट्र पतन और गिरावट की गहराई में जा गिरेगा। इस प्रश्न के उत्तर में लेखक कहता है कि जो राष्ट्र ज्ञान, आचरण और नैतिकता में विकसित होगा, उसके हाथों में विश्व का नेतृत्व होगा, और जो राष्ट्र ज्ञान और व्यवहार से दूर, अंधविश्वासों और पुरानी परंपराओं से पीड़ित व आलस्य से काम लेता है, वह अवनति व गिरावट का सामना करेगा।

सातवें अध्याय में इस्लाम में महिलाओं की स्थिति, उनके सामाजिक अधिकारों और स्थिति पर चर्चा की गई है, जिसमें कहा गया है कि इस्लाम में पुरुषों और महिलाओं के समान अधिकार हैं। बल्कि कई मामलों में महिलाएं अपने अधिकारों को हासिल करने में पुरुषों से आगे हैं। लेकिन मुस्लिम समाज में, विशेषकर भारत और पाकिस्तान में, महिला को वह स्थान और दर्जा नहीं मिल सका जो उसे इस्लाम द्वारा दिया गया था। लेखक विशेष रूप से चेहरे को ढंकने का पुरज़ोर विरोध करता है तथा इसे एक रूढ़िवादी अभ्यास कहता है। तर्क के रूप में वह पहली सदी के अरब समाज और तुर्की समाज का उदाहरण पाठकों के सामने पेश करता है और बताता है कि शुरुआती दौर में अरब समाज में इस तरह की कोई प्रथा नहीं थी। जब मुसलमान अरब क्षेत्र की सीमा को छोड़कर मिस्र, सीरिया, ईरान व इराक़ की सीमाओं में पहुंचे, तो उन्होंने अपनी महिलाओं को छिपाना उचित समझा ताकि वहां के लोगों से खतरा न हो। इस प्रथा को अज्ञानतापूर्ण बताते हुए लेखक इसके कुछ नुक़्सान इस प्रकार बताता है कि इससे महिलाओं में सांस और फेफड़ों से संबंधित कई बीमारियां होती हैं और उनके स्वास्थ्य और आने वाली पीढ़ी के स्वास्थ्य और पालन- पोषण पर इसके हानिकारक प्रभाव पड़ते हैं।

अंतिम अध्याय में, लेखक ‘इस्लाम का शहर’ शीर्षक के तहत एक ऐसे आदर्श समाज के बारे में बात करता है, जो इस्लाम की शिक्षाओं के कार्यान्वयन का फल है। यह समाज शांति और सद्भाव, न्याय और समानता, भाईचारे और परोपकार जैसे उच्च आध्यात्मिक और नैतिक मूल्यों पर आधारित है। फिर वह इस समाज की विशेषताओं का विस्तार से वर्णन करता है, इस समाज में लोगों के आपस में किस तरह के संबंध होंगे? समाज में न्याय और व्यवस्था बनाए रखने के लिए किस प्रकार की संस्थाओं को अस्तित्व में लाया जाएगा? व्यापार, अर्थव्यवस्था और राजनीति के सिद्धांत और नियम क्या होंगे? ये ऐसे प्रश्न हैं जिनका उत्तर लेखक ने विस्तार से दिया है।

इस पुस्तक में ऐसे विचारों और अवधारणाओं को बार-बार प्रस्तुत किया गया है जिन से लाभान्वित होकर बाद के कई विद्वानों ने इस्लाम की व्याख्या पर काम किया है। बेशक, यह पुस्तक ध्यान से पढ़ने योग्य है। कामना है कि यह अच्छी तरह से प्रचारित हो। साथ ही, बाद में आने वाले लेखकों द्वारा इस पुस्तक में वर्णित विषयों पर उनके अपने लेखन में जो विचार व्यक्त किया है उनका तुलनात्मक अध्ययन भी उपयोगी होगा।

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