अंतरराष्ट्रीय महिला दिवस विशेष: मिलिए हिजाबी पायलट सलवा फ़ातिमा से

सलवा फ़ातिमा का कहना है कि उन्होंने पायलट बनने का सपना ज़रूर देखा था लेकिन उन्हें विश्वास नहीं था कि यह सपना सच हो जाएगा। क्योंकि उनके पिता को दो वक़्त की रोटी के लिए पूरी ताक़त से संघर्ष करना पड़ता था। वह आगे बताती हैं कि कुछ लोग ऐसे थे जो हमेशा कहते थे कि मैं एक महिला हूं और मुझे शादी के बाद घर और बच्चों की देखभाल करनी है, यह प्रयास व्यर्थ है। लेकिन न केवल मेरे माता-पिता बल्कि मेरे पति और ससुराल वालों ने भी मुझे हर क़दम पर प्रोत्साहित किया।

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मिलिए हिजाबी पायलट सलवा फ़ातिमा से

अब्दुल मुक़ीत

सैयदा सलवा फ़ातिमा ने हैदराबाद के पुराने शहर में एक ग़रीब परिवार में अपनी आंखें खोलीं। वह चार भाई-बहनों में सबसे बड़ी हैं। उनके पिता अशफ़ाक़ अहमद एक बेकरी में दिहाड़ी मज़दूर के रूप में काम करते थे। लेकिन फ़ातिमा बचपन से ही अख़बारों में एविएशन से जुड़े लेख पढ़ती थीं, उन्हें सुरक्षित करती थीं और घंटों उन पर बनी हुई हवाई जहाज़ों की तस्वीरें देखती थीं।

सलवा फ़ातिमा को आज दुनिया भर में भारत की हिजाबी पायलट के नाम से जाना जाता है। वह कमर्शियल पायलट लाइसेंस (CPL) रखने वाली भारत की केवल चार मुस्लिम महिलाओं में से एक हैं। वह हमेशा अपनी तरबियत और संस्कृति के अनुसार हिजाब पहनती हैं, जिसके लिए उन्हें न केवल भारत में बल्कि विदेश में भी सराहा गया। वह भारत में मुस्लिम महिला सशक्तिकरण का एक सुनहरा उदाहरण हैं। सलवा फ़ातिमा की कहानी उस धारणा को झुठलाती है जिसमें अक्सर कहा जाता है कि मुसलमानों को हुनर ​​के बाद भी मौक़े नहीं मिलते या मुस्लिम लड़कियां सिर्फ़ घरेलू काम करने के लिए पैदा होती हैं।

बेहद ग़रीब परिवार से ताल्लुक़ रखने वाली सलवा फ़ातिमा ने ग़रीबी को अपनी सफ़लता के रास्ते में कभी नहीं आने दिया। हमसे बात करते हुए उन्होंने कहा कि, “मेरा बचपन से ही पायलट बनने का सपना था। 12वीं पास करने के बाद जब मैंने एडमिशन के लिए इंजीनियरिंग कोचिंग ज्वाइन की तो मुझसे मेरे सपने के बारे में पूछा गया। मैंने कहा मैं पायलट बनना चाहती हूं। उस समय लोगों ने मेरा मज़ाक़ बनाया। मेरे माता-पिता भी मेरे इस फ़ैसले से निराश थे। उन्होंने मुझे इंजीनियरिंग करने का सुझाव दिया। लेकिन जैसा कि कहा जाता है मंज़िल उन्हें मिलती है जिनके सपनों में जीवन होता है, पंखों के साथ कुछ नहीं, साहस के साथ उड़ान होती है।”

डेली सियासत को दिए गए अपने एक इंटरव्यू में सलवा फ़ातिमा ने कहा कि वह अज़ीज़िया स्कूल की मेधावी छात्रा रही हैं। मैट्रिक में उनका रिज़ल्ट इतना अच्छा आया कि शहर के एक प्रतिष्ठित कॉलेज ने उनकी 50% फ़ीस माफ कर दी। हालांकि उनके माता-पिता चाहते थे कि वह किसी विज्ञान या इंजीनियरिंग पाठ्यक्रम में प्रवेश लें, लेकिन वह आम लड़कियों से थोड़ा अलग बनना चाहती थीं। पायलट बनना उनका जुनून था, लेकिन अपने माता-पिता के आग्रह पर सलवा ने एक मुफ़्त कोचिंग सेंटर में दाख़िला लिया जहां इंजीनियरिंग और मेडिकल प्रवेश परीक्षा की तैयारी करायी जाती थी।

सलवा आगे बताती हैं कि कोचिंग सेंटर द्वारा नए समूह का उद्घाटन समारोह था। जब मुझे पता चला कि डेली सियासत के संपादक ज़ाहिद अली ख़ान कार्यक्रम के मुख्य अतिथि हैं तो मैंने अपने शिक्षक से इस कार्यक्रम में स्वागत भाषण देने की इच्छा व्यक्त की, क्योंकि मेरे लिए ज़ाहिद अली ख़ान साहब का ध्यान आकर्षित करने का यह एक विशेष अवसर था। वह कहती हैं कि उन्होंने मेरा भाषण सुना, भाषण के बाद उनसे मिलना हुआ, उन्होंने मुझसे भविष्य की योजनाओं के बारे में पूछा। मैंने उनसे बिना झिझके कहा पायलट बनना चाहती हूं और पायलट बनने के लिए आपसे सहायता की अपील करती हूं।

ज़ाहिद अली ख़ान और उनके दोस्तों के सहयोग से फ़ातिमा को 2007 में आंध्र प्रदेश एविएशन अकादमी में प्रवेश मिला। पांच साल का कठिन प्रशिक्षण लिया और एक कमर्शियल पायलट का लाइसेंस प्राप्त किया। इसके अलावा एक निजी पायलट का लाइसेंस और एक उड़ान रेडियो टेलीफ़ोन ऑपरेटर का लाइसेंस भी प्राप्त किया। इस पूरे प्रशिक्षण के दौरान सलवा फ़ातिमा ने सेसना 152 और 172 पर 200 घंटे की उड़ान भरी। जिसमें उनकी 123 घंटे की एकल उड़ान भी शामिल थी। लेकिन यह उनके सपने को पूरा करने के लिए काफ़ी नहीं था। अब उन्हें बोइंग या एयरबस जैसे बड़े विमानों की ट्रेनिंग लेनी थी, जहां इस ट्रेनिंग पर उन्हें 30-35 लाख रुपए ख़र्च करने थे।

पैसों की कमी के कारण उनके माता-पिता ने शादी का प्रस्ताव रखा और वह इस फ़ैसले के लिए राज़ी हो गईं। जब फ़ातिमा चार महीने की गर्भवती थीं, उस समय उन्होंने तेलंगाना सरकार से मदद की गुहार लगाई। सरकार ने उनकी मदद की और न्यूज़ीलैंड में उनके प्रशिक्षण के लिए 36 लाख रुपये की मंज़ूरी दी। न्यूज़ीलैंड में अपने प्रशिक्षण के समय फ़ातिमा ने 5 घंटे के लिए एक बहु-इंजन विमान उड़ाया और 10 घंटे के लिए एक सिम्युलेटर पर प्रशिक्षण लिया। इसके बाद उन्होंने बहरेन में गल्फ़ एविएशन अकादमी में एयरबस पर अपनी टाइप रेटिंग योग्यता पूरी की।

इंडिगो एयरलाइंस में काम करने वाली सलवा फ़ातिमा का कहना है कि उन्होंने पायलट बनने का सपना ज़रूर देखा था लेकिन उन्हें विश्वास नहीं था कि यह सपना सच हो जाएगा। क्योंकि उनके पिता को दो वक़्त की रोटी के लिए पूरी ताक़त से संघर्ष करना पड़ता था। वह आगे बताती हैं कि कुछ लोग ऐसे थे जो हमेशा कहते थे कि मैं एक महिला हूं और मुझे शादी के बाद घर और बच्चों की देखभाल करनी है, यह प्रयास व्यर्थ है। लेकिन न केवल मेरे माता-पिता बल्कि मेरे पति और ससुराल वालों ने भी मुझे हर क़दम पर प्रोत्साहित किया।

सलवा का कहना है कि मेरे पिता सैयद अशफ़ाक़ अहमद प्यार से मुझे ‘चमत्कारिक लड़की’ कहते हैं और सही भी है, क्योंकि एक ग़रीब पिता जो बेकरी में काम करता है, जिसकी एक दिन की तनख़्वाह की महज़ तीन सौ रुपये है, ऐसे में इस प्रकार के सपने देखना और मुश्किलों से जूझना और फिर बेटी का इसे पूरा कर दिखाना किसी भी पिता के लिए चमत्कार ही हो सकता है।

वह आगे कहती हैं, “मैंने पायलट बनने का सपना ज़रूर देखा था लेकिन मेरे पास इतने पैसे भी नहीं थे कि मैं हवाई जहाज़ का टिकट ख़रीद सकूं। ख़ुदा का शुक्र और मेरी ख़ुश क़िस्मती है कि मेरी पहली उड़ान पैसेंजर सीट से नहीं बल्कि कॉकपिट से थी।”

हिजाब पहनने से किसी तरह की परेशानी के बारे में पूछे जाने पर वह कहती हैं कि उन्हें कभी किसी परेशानी का सामना नहीं करना पड़ा। बल्कि हिजाब की वजह से उन्हें बहरेन में काफ़ी सराहना मिली। एक मैगज़ीन ने उनकी ड्रेस और हिजाब के साथ एक तस्वीर भी प्रकाशित की थी। वह अपनी बेटी के बारे में कहती हैं, मैं चाहती हूं कि वह एक आईएएस अधिकारी बने।

सलवा फ़ातिमा के साथ छात्र विमर्श संपादक मण्डल के सदस्य अब्दुल मुक़ीत

हैदराबाद के मौलाना आज़ाद राष्ट्रीय उर्दू विश्वविद्यालय में पत्रकारिता एवं जनसंचार विभाग के एसोसिएट प्रोफ़ेसर मुहम्मद मुस्तफ़ा अली सरवरी, सलवा फ़ातिमा के बारे में कहते हैं कि सलवा अपने शुरुआती दिनों में थीं जब मैंने डेली सियासत के लिए उनका इंटरव्यू लिया था। उस समय सलवा बहुत सारी कठिनाइयां और समस्याओं से जूझ रही थीं। लग रहा था कि उनका सपना टूट जाएगा। जो सपने वे देख रही हैं, वे उनके लिए बने सपने नहीं हैं। हर कोई उनकी विफलता के बारे में बात करता था। मैंने ख़ुद उनके इंटरव्यू का जो शीर्षक दिया था वह था “ग़रीबों के सपने कभी पूरे नहीं होते” लेकिन सलवा लोगों के विभिन्न प्रकार की बातों के बावजूद अपने मिशन के प्रति प्रतिबद्ध रहीं। यही कारण है कि आज उन्होंने अपने सपने और मिशन को पूरा कर लिया है।

सलवा फ़ातिमा आज महिला सशक्तिकरण का चेहरा बन गई हैं, उनको मुंबई स्थित महिला सशक्तिकरण के एक संगठन ने वंचित महिलाओं को शिक्षा प्राप्त करने में मदद करने के लिए अपना ब्रांड एंबेसडर बनाया है, ताकि वंचित महिलाओं को शिक्षा हासिल करने में मदद की जा सके।

महिलाओं को संदेश देते हुए वह कहती हैं कि महिलाएं किसी भी क्षेत्र में रहें लेकिन अपने सपनों के साथ कोई समझौता कभी भी न करें। वह एक स्लोगन दोहराते हुए कहती हैं कि, “जहां चाह है, वहां राह है।” कठिनाइयां और असफलताएं भी सफलता का हिस्सा हैं। अगर आप सफल होना चाहती हैं तो उन्हें कभी भी अपने ऊपर हावी न होने दें।

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