आयोध्या पर सुप्रीम कोर्ट के फैसले से नाखुश गांधी के प्रपौत्र तुषार गांधी

इस ट्वीट के सियासी मायने यही निकाले जा रहे हैं कि देश की सर्वोच्च अदालत एक ऐसी विचारधारा के दबाव में काम करने को मजबूर है जो नाथूराम गोडसे में देशभक्ति तलाशती है। उन्होंने आयोध्या विवाद पर आए इस फैसले को राजनीतिक क़रार देते हुए यह भी कहा कि "हर किसी को ख़ुश करना न्याय नहीं होता, हर किसी को ख़ुश करना राजनीति होती है।"

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सुप्रीम कोर्ट द्वारा बाबरी मस्जिद फैसले पर आ रही प्रतिक्रियाओं के बीच राष्ट्रपिता महात्मा गाँधी के प्रपौत्र तुषार गाँधी का बयान सामने आया है।
तुषार गाँधी ने अपने ट्वीटर हेंडल से लिखा है कि “अगर आज गाँधी की हत्या मामले में सुप्रीम कोर्ट फिर से सुनवाई करे तो फैसला यही होगा कि नाथुराम गोडसे हत्यारा था लेकिन वह एक देशभक्त भी था।”
उनके इस ट्वीट के सियासी मायने यही निकाले जा रहे हैं कि देश की सर्वोच्च अदालत एक ऐसी विचारधारा के दबाव में काम करने को मजबूर है जो नाथूराम गोडसे में देशभक्ति तलाशती है। उन्होंने आयोध्या विवाद पर आए इस फैसले को राजनीतिक क़रार देते हुए यह भी कहा कि “हर किसी को ख़ुश करना न्याय नहीं होता, हर किसी को ख़ुश करना राजनीति होती है।”
कोर्ट के फैसले के बाद देश के विभिन्न समाजिक कार्यकर्ताओं की तरफ से विभिन्न प्रकार की प्रतिक्रियाएं सामने आ रही हैं ऐसे में तुषार गाँधी का यह बयान भी काफी महत्वपूर्ण है।

उन्होंने कहा, “सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि आस्था और विश्वास के आधार पर आपको कोई प्राथमिकता नहीं मिल सकती। वे कह रहे हैं कि मस्जिद के नीचे एक ढांचा था लेकिन ढांचा मंदिर का नहीं था। कोई नहीं कह सकता कि मंदिर को ढहाकर मस्जिद बनाई गई लेकिन अब मस्जिद को ढहाकर मंदिर बनाया जाएगा?” इसी क्रम में जस्टिस गांगुली ने भी अपनी प्रतिक्रिया दर्ज कराते हुए कहा, “500 साल पहले जमीन का मालिकाना हक किसके पास था? क्या कोई जानता है? हम इतिहास को दोबारा नहीं बना सकते। अदालत की ज़िम्मेदारी है कि जो भी है, उसका संरक्षण किया जाए। इतिहास को दोबारा बनाना अदालत की ज़िम्मेदारी नहीं है। वहां 500 साल पहले क्या था, यह जानना अदालत का काम नहीं है। मस्जिद का वहां होना सीधे एक तर्क था, ऐतिहासिक तर्क नहीं बल्कि एक ऐसा तर्क जिसे हर किसी ने देखा है। इसका गिराया जाना सभी ने देखा, जिसे रिस्टोर किया जाना चाहिए। जब उनके पास मस्जिद होने का कोई अधिकार नहीं है तो आप मस्जिद के निर्माण के लिए पांच एकड़ ज़मीन देने के लिए सरकार को निर्देश कैसे दे रहे हैं, आख़िर क्यों? आप स्वीकार कर रहे हैं कि मस्जिद को नष्ट किया जाना उचित नहीं था।” यह पूछने पर कि आप उचित और निष्पक्ष फैसला किसे मानेंगे? इस पर जस्टिस गांगुली ने कहा, “मैं दो में से कोई एक फैसला लेता या तो मैं उस क्षेत्र में मस्जिद को दोबारा बनाए जाने को कहता या अगर वह जगह विवादित होती तो मैं कहता कि वहां न तो मस्जिद बनेगी और न ही मंदिर। आप वहां कोई अस्पताल या स्कूल बना सकते हैं या इसी तरह का कुछ या कॉलेज। मंदिर और मस्जिद दूसरे इलाकों में बनाने को कहा जा सकता था। इस ज़मीन को हिंदुओं को नहीं देना चाहिए था। यह विश्व हिंदू परिषद (वीएचपी) और बजरंग दल का दावा है। वे उस समय और आज किसी भी मस्जिद को ढहा सकते थे। उन्हें सरकार का समर्थन मिल रहा था और अब उन्हें न्यायपालिका का भी समर्थन मिल रहा है। मैं बहुत व्यथित हूं। बहुत सारे लोग स्पष्ट तरीके से ये चीज़े नहीं कहेंगे।” सुप्रीम कोर्ट के रिटायर्ड जज अशोक कुमार गांगुली पश्चिम बंगाल मानवाधिकार आय़ोग के अध्यक्ष भी रह चुके हैं। मालूम हो कि शनिवार को सुप्रीम कोर्ट ने बाबरी मस्जिद-रामजन्मभूमि ज़मीन विवाद पर अपना फैसला सुनाते हुए विवादित ज़मीन पर मुस्लिम पक्ष का दावा ख़ारिज करते हुए हिंदू पक्ष को ज़मीन देने को कहा। एक सदी से अधिक पुराने इस मामले की सुनवाई करते हुए सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि रामजन्मभूमि न्यास को 2.77 एकड़ ज़मीन का मालिकाना हक़ मिलेगा। वहीं, सुन्नी वक़्फ़ बोर्ड को अयोध्या में ही पांच एकड़ ज़मीन दी जाएगी। मंदिर निर्माण के लिए केंद्र सरकार को तीन महीने के अंदर ट्रस्ट बनाना होगा और इस ट्रस्ट में निर्मोही अखाड़ा का एक सदस्य शामिल होगा। न्यायालय ने कहा कि विवादित 2.77 एकड़ ज़मीन अब केंद्र सरकार के रिसीवर के पास रहेगी, जो इसे सरकार द्वारा बनाए जाने वाले ट्रस्ट को सौंपेंगे.

उन्होंने ही 2012 में 2G स्पेक्ट्रम के मामले में फैसला दिया था। जिस पर बीजेपी के नेतृत्व में फिलहाल सत्ता पर क़ाबिज़ एनडीए ने उस वक़्त इसी को आधार बनाते हुए मनमोहन सरकार पर तीखा हमला किया था।

रिपोर्ट : अहमद कासिम (मीडिया छात्र, जामिया मिल्लिया इस्लामिया)

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