उत्तरकाशी में क्या चल रहा है?

मुसलमानों की दुकानों पर लगाए गए इन पोस्टरों में कहा गया था कि 15 जून को होने वाली महापंचायत से पहले इस इलाक़े को छोड़ कर चले जाएं, जिसके बाद इस इलाक़े से मुस्लिम व्यापारियों का पलायन होने लगा।

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उत्तरकाशी में क्या चल रहा है?

एमडी स्वालेह अंसारी

पिछले कुछ दिनों से उत्तराखंड के उत्तरकाशी का पुरोला क्षेत्र काफ़ी चर्चा में है। चर्चा इसलिए हो रही है कि वहां पर हिंदू-मुस्लिम नफ़रत की खाई अधिक बढ़ गई है। क्षेत्र के मुस्लिम परिवारों को अपना घर, दुकान और व्यापार छोड़ कर पलायन करना पड़ रहा है। ये सब सिर्फ़ इसलिए हो रहा है ताकि वहां की सरकार अपनी हिंदू-मुस्लिम सियासी रोटी को आसानी से सेंक सके और उसका राजनीतिक फ़ायदा उठा सके। इस काम के लिए सरकार ने अपने कुछ तथाकथित धर्म रक्षकों को मैदान में उतार दिया है।

बीते दिनों उत्तरकाशी क्षेत्र में मुसलमानों की दुकानों के ऊपर धमकी भरे पोस्टर चिपकाए गए और उन्हें चिन्हित कर इलाक़े से पलायन कर जाने की धमकी दी गई, जिसके पश्चात् उस क्षेत्र से तमाम मुसलमान दुकानदार और व्यापारी भय की वजह से क्षेत्र से पलायन करने लगे।

क्षेत्र से पलायन करने वालों में आम मुस्लिम नागरिकों के साथ ज़िला स्तर के बड़े मुस्लिम नेता जिनका संबंध भारतीय जनता पार्टी से है, उनका नाम भी शामिल है।

मुसलमानों की दुकानों पर लगाए गए इन पोस्टरों में कहा गया था कि 15 जून को होने वाली महापंचायत से पहले इस इलाक़े को छोड़ कर चले जाएं, जिसके बाद इस इलाक़े से मुस्लिम व्यापारियों का पलायन होने लगा।

यह सब एक ऐसे देश में हो रहा है जहां का संविधान देश के सभी नागरिकों की संपत्ति और जीवन की सुरक्षा की गारंटी देता है। लेकिन धर्म की गंदी सियासत में खोए हुए तथाकथित नेता और संविधान के रखवाले, संविधान की तमाम बातों को ताक पर रख कर, मुसलमानों को इस क्षेत्र से पलायन करने पर मजबूर कर रहे हैं।

इसी बीच ख़बर आई कि 15 जून को होने वाली महापंचायत को,‌ एसोसिएशन फ़ॉर प्रोटेक्शन ऑफ़ सिविल राइट्स (एपीसीआर) द्वारा डाली गई याचिका पर अदालत के दख़ल के बाद, होने से रोक दिया गया तथा इलाक़े में शांति व्यवस्था बनाए रखने के लिए लोगों से अपील भी की गई।

एपीसीआर ने जब ज़मीनी स्तर पर हालात ख़राब होते हुए देखे तो उन्होंने प्रशासन और सरकार से अपील की और महापंचायत को रोकने की कोशिश की। लेकिन प्रशासन और सरकार का रवैया कुछ ठीक नहीं दिखा तो उन्होंने कोर्ट का रुख़ किया, जिसके बाद इस पंचायत को रोक दिया गया है।

इस संबंध में एपीसीआर की ओर से जारी प्रेस विज्ञप्ति में कहा गया है कि “परोला में हिंदुत्ववादी संगठनों द्वारा आयोजित ‘महापंचायत’ को रोकने के लिए उत्तराखंड उच्च न्यायालय में एपीसीआर द्वारा एक जनहित याचिका (पीआईएल) दायर की गई थी। याचिका में मुसलमानों से अपनी संपत्ति और क्षेत्र को ख़ाली करने की धमकी देने वालों के ख़िलाफ़ प्राथमिकी दर्ज करने का भी आग्रह किया गया था। याचिका के जवाब में, मुख्य न्यायाधीश विपन सिंघी और राकेश थपलियाल की अध्यक्षता में उत्तराखंड उच्च न्यायालय ने 14 जून, 2023 को फ़ैसला सुनाया। यह एक ऐतिहासिक निर्णय है। क़ानून व्यवस्था बनाए रखने के लिए राज्य के मौलिक कर्तव्य को दोहराते हुए प्रतिवादियों को नोटिस भी जारी किया है।”

आगे एपीसीआर की तरफ़ से कोर्ट में अपनी बात रखते हुए अधिवक्ता शाहरुख़ आलम, तल्हा रहमान, अर्कत कृष्णा और प्रिया वत्स ने 5 जून, 2023 को नई टिहरी के ज़िलाधिकारी को संबोधित एक पत्र की ओर अदालत का ध्यान आकर्षित किया, जो कथित तौर पर विश्व हिंदू परिषद (विहिप) और बजरंग दल के लेटर पैड से लिया गया था। इसमें राज्य के कुछ इलाक़ों में रहने वाले मुसलमानों को घर ख़ाली नहीं करने पर 15 जून को हाईवे जाम करने की धमकी दी गई थी। इसके साथ उन सभी बिंदुओं पर बात रखी गई जो पिछले कुछ दिनों में हिंदुत्ववादी संगठनों की तरफ़ से किया गया था।

फ़िलहाल एपीसीआर की कोशिशों के बाद अदालत ने इस महापंचायत पर रोक लगा दी है और मामले की गंभीरता को देखते हुए लोगो से शांति व्यवस्था बनाए रखने की अपील की गई है। इस फ़ैसले पर एपीसीआर के राष्ट्रीय महासचिव नदीम ख़ान ने संतुष्टि के संकेत देते हुए, जारी बयान में कहा है कि “महापंचायतों को रोकना एक सकारात्मक क़दम है, लेकिन हमें डर और ध्रुवीकरण की ज़मीनी हक़ीक़त को नज़रअंदाज नहीं करना चाहिए। राज्य सरकार के लिए आवश्यक है कि मुस्लिम व्यापारियों की सुरक्षा सुनिश्चित की जाए और मुसलमानों को परोला शहर में अपनी दुकानें फिर से खोलने की अनुमति हो।”

नदीम ख़ान ने ज़ोर देकर कहा कि “एपीसीआर नागरिक अधिकारों की रक्षा करने और भेदभाव एवं सांप्रदायिक तनाव से मुक्त समाज को बढ़ावा देने की अपनी प्रतिबद्धता में दृढ़ है।” उन्होंने कहा कि “भय और ध्रुवीकरण की ज़मीनी हक़ीक़त को संबोधित करना अनिवार्य है जो सामान्य व्यापार संचालन को बाधित करता है और इसके परिणामस्वरूप निर्दोष लोगों की आजीविका को ख़तरा पैदा होता है। हमें उम्मीद है कि अधिकारी अभद्र भाषा और हिंसा की घटनाओं की जांच के लिए तत्काल कार्रवाई करेंगे। दोषियों के ख़िलाफ़ एक व्यापक प्राथमिकी दर्ज की जाएगी और अपराधियों को न्याय के कठघरे में लाया जाएगा। इसी प्रकार न्याय, समानता और सांप्रदायिक सद्भाव के सिद्धांतों को क़ायम रखा जा सकता है।”

फ़िलहाल पुरोला और आस-पास के इलाक़े में स्थिति तनावपूर्ण बनी हुई है। क्षेत्र में शांति व्यवस्था बनाए रखने के लिए भारी संख्या में पुलिस बल सरकार की तरफ़ से तैनात किया गया है। लेकिन सवाल यह है कि क्या उत्तराखंड सरकार नफ़रती भाषण देने वाले, पोस्टर लगाने वाले और धमकी देने वालों के ख़िलाफ़ क़ानूनी कारवाई करेगी या पुराने अन्य मामलों की तरह यहां भी सिर्फ़ ख़ानापूर्ति की जाएगी? क्या पलायन कर गए परिवारों को पुनः बसाने और उन्हें व्यापार करने देने में सरकार पहल करेगी?

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