भारत के पहले शिक्षा मंत्री मौलाना अबुल कलाम आज़ाद

अबुल कलाम आज़ाद ने जिन्ना के दो राष्ट्र के विभाजन की नीति को नकारते हुए कहा था कि ''बंटवारे से जितनी समस्या हल नहीं होंगी उतनी समस्याएँ पैदा होंगी'' आज हम उनके कही गई बात को आँखों से देख सकते हैं। उनकी राजनीतिक सोच और दूरदर्शिता उस वक़्त के समकालीन लोगों से कहीं अधिक परिपक्व थी।

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शारिक़ अंसर, नई दिल्ली

आज़ादी हासिल करने में और भारत जैसे बहुसंख्यक, बहुभाषीय व बहुसांस्कृतिक समाज को बांधे रखने और उसे नई दिशा देने में जिस स्वतन्त्रा सेनानी का नाम सबसे ऊपर आता है उनमे मौलाना अबुल कलम आज़ाद प्रमुख हैं। एक जगह पंडित नेहरू मौलाना के बारे में लिखते हुए कहते हैं कि “जब वह इंग्लैंड से उच्च शिक्षा हासिल करके हिंदुस्तान लौटे तो अक्सर वो देखा करते थे कि कांग्रेस वर्किंग कमेटी की बैठकों में बहुत से बूढ़े लोगों के साथ एक नौजवान भी शरीक रहता है। उन्हें इस बात पर हैरत होती थी कि वो इस बैठक के क़रीब भी नहीं जा सकते थे जबकि इस नौजवान की हर बात को लोग काफी गौर से सुनते और उसे अहमियत देते हैं । ये नौजवान कोई और नहीं अबुल कलम आज़ाद थे।

अबुल कलाम आज़ाद ने जिन्ना के दो राष्ट्र के विभाजन की नीति को नकारते हुए कहा था कि ”बंटवारे से जितनी समस्या हल नहीं होंगी उतनी समस्याएँ पैदा होंगी” आज हम उनके कही गई बात को आँखों से देख सकते हैं। उनकी राजनीतिक सोच और दूरदर्शिता उस वक़्त के समकालीन लोगों से कहीं अधिक परिपक्व थी।

मौलाना अबुल कलम आज़ाद का जन्म 1888 में अरब के पवित्र शहर मक्का में हुआ। उनका सही नाम अबुल कलाम घुलाम मुहियुद्दीन था जो बाद में बदलकर मौलाना आज़ाद बना । आज़ाद के पिता मौलाना मुहम्मद खैरुद्दीन एक विद्वान लेखक थे जिनकी कई किताबे प्रकाशित हो चुकी थी। 1893 में उनके पिता उस वक़्त की राजधानी कलकत्ता आ गए। घर में शैक्षणिक माहौल होने के कारण विभिन्न विद्याओं और ज्ञान की गहराई को जानने और समझने का मौक़ा मिला। मौलाना आज़ाद कई भाषाओँ के जानकार थे जैसे उर्दू, हिंदी, पर्शियन, बंगाली, अरेबिक और इंग्लिश. वे मज़ाहिब हनफी, मालिकी, शफी और हंबली फिकह, शरीअत, गणित, दर्शनशास्त्र, विश्व इतिहास और विज्ञानं के इलावा क़ुरआन के अच्छे जानकार थे।

आपने पश्चिमी देशों को पढ़ा, साथ ही मिस्र तुर्की आदि देशों की किताबों और पत्र पत्रिकाओं का गहरा अध्यन किया। लोग छोटे उम्र से ही आपकी लेखन शैली और ज्ञान की व्यापकता के कायल हो गए थे। देश की आज़ादी की लड़ाई में आपकी क़लम के ज़रिये से लोगों में खामोश क्रांति का संचार हुआ। देश की राजनीतिक हालात और अंग्रेजों की दमनात्मक नीतियों के खिलाफ आप प्रखर होकर लिखते रहे। 1912 में साप्ताहिक ‘अल-हिलाल’ निकाली जिनकी रचनाओं ने स्वतन्त्रता आंदोलन में एक नयी जान डाल दी।

मौलाना ने राजनीति के लिए सामाजिक सरोकार की पत्रकारिता को चुना। ‘अल-हिलाल और अल-बलाग़’ उर्दू ही नहीं बल्कि हिंदुस्तान की अन्य भाषाओँ की पत्रकारिता में अपना अलग स्थान रखता है। मुल्क के राजनीतिक हालात के कारण आप राजनीति में सक्रिय हुए और गाँधी जी के साथ मिलकर स्वतंत्रता आंदोलन में अपनी सक्रिय भूमिका निभाई।

देश की आज़ादी के समय पूरे हिंदुस्तान में शायद दो लोग ऐसे थे जिनकी शिष्टता, ईमानदारी और उसूल की लोग कसमें खाया करते थे उनमे महात्मा गाँधी और अबुल कलम आज़ाद थे। 35 साल की उम्र में वह कांग्रेस के सबसे कम उम्र के अध्यक्ष बने। 1942 में भारत छोड़ो आंदोलन के समय कांग्रेस के अध्यक्ष थे और ये पूरा आंदोलन गाँधी जी और मौलाना के नेतृत्व में चलाई गई थी। लगातार 5 साल तक चले इस आंदोलन के बाद ही भारत को आज़ादी मिली।

मौलाना अबुल कलम आज़ाद की आधी ज़िन्दगी जेलों में कटी। बल्कि ये कहा जाता है की मौलाना की ज़िन्दगी का हर सातवाँ दिन जेलों में गुज़रा। जेलों में अंग्रेजी हुकूमत के ज़रिये प्रताड़ना और ज़ुल्म सहते रहे लेकिन कभी उफ़ तक नहीं किया। 1916 में जब आप रांची के जेल में नज़रबंद थे उस वक़्त भी अलबलाग़ निकालते रहे। जिसे बाद में अंग्रेजी हुकूमत ने जब्त कर लिया। आपने देश की आज़ादी और सम्मान के लिए अपना सब कुछ क़ुर्बान कर दिया लेकिन कभी अपने उसूलों से सौदा नहीं किये। जेल में नज़रबंदी के दौरान आपकी पत्नी काफी बीमार पड़ गयी थी। जेल सुप्रीटेंडेंड द्वरा खबर भेजवाया गया कि अगर आप अंग्रेजी हुकूमत से दरख्वास्त करेंगे तो आपको अपनी पत्नी से मिलने की इज़ाज़त मिल जाएगी, लेकिन आपने इस प्रस्ताव को ठुकरा दिया और अंग्रेजी हुकूमत के सामने झुकने से इनकार कर दिया। कुछ दिनों के बाद आपकी पत्नी का देहांत हो गया।

मौलाना हिन्दू मुस्लिम एकता और साम्प्रदायिक सौहार्द के बहुत बड़े हामी थे। उन्होंने 15 दिसम्बर 1923 को कांग्रेस के एक कार्यक्रम की अध्यक्षता करते हुए ये ऐतिहासिक शब्द कहे थे। उन्होंने कहा था कि ”आज अगर एक फरिश्ता आसमान के बादलों से उतर आये और क़ुतुब मीनार पर खड़े होकर ये ऐलान कर दे कि स्वराज 24 घंटे के अंदर मिल सकता है बशर्ते कि हिन्दू- मुस्लिम एकता को तर्क कर दिया जाये तो मैं स्वराज से अलग हो जाऊंगा लेकिन हिन्दू मुस्लिम एकता को आंच नहीं आने दूंगा ”

आप हमेशा हिन्दू मुस्लिम एकता के लिए प्रयास करते रहे। इसके लिए आप हमेशा कांग्रेस के नेताओं और अन्य लोगों से मज़बूत संवाद किये। मुस्लिम समुदाय में भी आपने उनके शैक्षणिक उत्थान और राजनीतिक समझ को मज़बूत करने की कोशिश की और देश के बदले हुए हालात पर एक योद्धा की तरह डटे रहे । 15 अगस्त 1947 को देश आज़ाद हुआ। साथ ही देश दो भागों में बंट गया। इस बटवारे में जहाँ मुस्लिम लीग क़सूरवार थी वहीँ कांग्रेस भी उतनी ही ज़िम्मेदार थी। आप इस बटवारे का अंतिम सांस तक विरोध करते रहे। लेकिन अंग्रेजों की चाल में फँस कर देश दो हिस्सों में तक़सीम हो चूका था। इस बटवारे से आप बहुत व्यथित थे।

आज़ादी के बाद आपने जामा मस्जिद की सीढ़ियों से खिताब करते हुए आपने ऐतिहासिक भाषण दिया था। अपने दर्द को बयां करते हुए उन्होंने कहा था कि ” जब मैं बोलना चाहा तुम लोगों ने मेरी ज़ुबान काट दी। जब मैंने लिखना चाहा तुम लोगों ने मेरे हाथ काट दिए। जब मैं खड़ा होना चाहा तो तुमलोगों ने मेरे कमर तोड़ दिए”। आपने अपने क़ौम और देश को झिंझोड़ते हुए उन्हें मिलजुल कर रहने और गंगा जमुनी तहज़ीब को बचाने की अपील की।

मौलाना ज़िन्दगी भर शोहरत और पद हासिल करने से दूर रहे। आज़ादी के बाद जब आपको शिक्षा मंत्री बनाया जा रहा था तब भी आप तैयार नहीं थे लेकिन बाद में आपने मुल्क के मफाद के लिए इसे स्वीकार किया। आप देश के पहले शिक्षा मंत्री हुए और देश की शैक्षणिक ज़रूरतों को पूरी करने का प्रयास किया। आपने ग्यारह वर्षों तक राष्ट्र की शिक्षा नीति का मार्गदर्शन किया। आपको ही ‘भारतीय प्रद्योगिकी संस्थान’ अर्थात ‘आई.टी.आई.’ और ‘विश्वविद्यालय अनुदान आयोग’ की स्थापना का श्रेय है। आपने शिक्षा और संस्कृति को विकिसित करने के लिए उत्कृष्ट संस्थानों की स्थापना की। संगीत नाटक अकादमी (1953), साहित्य अकादमी (1954) ललितकला अकादमी (1954) आदि संस्थानों की स्थापना की।

केंद्रीय सलाहकार शिक्षा बोर्ड के अध्यक्ष होने पर सरकार से केंद्र और राज्यों दोनों के अतिरिक्त विश्वविद्यालयों में सारभौमिक प्राथमिक शिक्षा, 14 वर्ष तक की आयु के सभी बच्चों के लिए निःशुल्क और अनिवार्य शिक्षा, कन्याओं की शिक्षा, व्यावसायिक प्रशिक्षण, कृषि शिक्षा और तकनीकी शिक्षा जैसे सुधारों के इलावा उन्होंने शिक्षा को समाज से जोड़ा।

आज नफरतों के इस माहौल में जब हम फिर से आज़ादी को याद कर रहे हैं तो ऐसे वक़्त में हमें मौलाना आज़ाद के संघर्षों और क़ुरबानी को ज़रूर याद करना चाहिए। तब ही हम आज़ादी के वास्तविक उद्देश्य को हासिल कर पाएंगे।

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