जानिए कौन हैं अली मानिकफ़न जिन्हें पाकर पद्मश्री भी धन्य हो गया!

अली मानिकफ़न पर्यावरण और प्रकृति को ध्यान में रखते हुए उनके अनुकूल कृषि विधियों का पालन करते हैं। वे अपनी ज़मीन पर पवन-चक्की से स्वयं बिजली बनाते हैं और खेती करते हैं। उन्होंने अपने क्षेत्र में स्वाभाविक रूप से उपलब्ध पर्यावरण के अनुकूल सामग्रियों के साथ एक घर भी बनाया है।

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लक्षद्वीप के मिनिकॉय द्वीप में रहने वाले अली मानिकफ़न उन 102 प्रतिष्ठित भारतीयों में से एक हैं, जिन्हें इस वर्ष देश के चौथे सर्वोच्च नागरिक सम्मान पद्म श्री पुरस्कार से सम्मानित किया गया है।

82 वर्षीय अली मानिकफ़न कई विषयों के विशेषज्ञ हैं लेकिन खास बात यह है ​​कि उनमें से किसी भी विषय में उन्होंने औपचारिक शिक्षा नहीं प्राप्त की है। आइए उनके बारे में विस्तार से जानते हैं:

अली मानिकफ़न का जन्म 16 मार्च 1938 को लक्षद्वीप के मिनिकॉय द्वीप में मूसा मानिकफ़न और फातिमा मनिका के घर हुआ था। उनके पिता ने उन्हें औपचारिक शिक्षा के लिए कन्नूर (केरल) भेजा। चूंकि उन्हें औपचारिक शिक्षा में कोई दिलचस्पी नहीं थी, इसलिए कक्षा 8 तक पढ़ाई करने के बाद उन्होंने अपनी पढ़ाई छोड़ दी और घर लौट आए। उनके अनुसार “औपचारिक शिक्षा बनावटी और निरर्थक है और ज्ञान प्राप्त करने का सबसे अच्छा तरीक़ा क़ायनात को देखकर ज्ञान प्राप्त करना है।”

घर लौटने पर उन्होंने स्वयं अंग्रेज़ी, हिन्दी, मलयालम, अरबी, लैटिन, फ़्रेंच, रूसी, जर्मन, सिंहली, फ़ारसी, संस्कृत, तमिल और उर्दू सहित कई अन्य भाषाएं सीखीं। उनका कौशल भाषाओं के सीखने तक सीमित नहीं है। उन्होंने समुद्री जीव विज्ञान, समुद्री अनुसंधान, भूगोल, खगोल विज्ञान, सामाजिक विज्ञान, पारंपरिक जहाज़ निर्माण, शिक्षा, मत्स्य पालन और कृषि के क्षेत्र में भी अपने ज्ञान का विस्तार किया। 1956 में उन्होंने एक शिक्षक के रूप में काम शुरू किया और बाद में मिनिकॉय द्वीप में क्लर्क की नौकरी भी की। लेकिन उनकी रुचि समुद्री जीवन में थी। 1960 के दशक में वे भारत के केंद्रीय समुद्री मत्स्य अनुसंधान संस्थान में शामिल हो गए।

इसी संस्थान में काम करते हुए उनके कौशल और गहरे अवलोकन ने समुद्री जीव विज्ञानी डॉक्टर संतप्पन जोंस को मछलियों की एक नई प्रजाति खोजने में मदद की। डॉक्टर जोंस ने इस प्रजाति का नाम अली मानिकफ़न के नाम पर ‘Abudefduf Manikfani’ रखा।

1981 में, उन्होंने पारंपरिक तरीक़ों का उपयोग करके एक प्राचीन अरब जहाज़ का पुनर्निर्माण भी किया। ओमान के व्यापारिक जहाज़ ‘सोहर’ के पुनर्निर्माण के लिए आयरिश खोजकर्ता टिम सेवरिन ने उन्हें संपर्क किया था। इस जहाज़ का नाम ओमान के ‘सोहर’ शहर के नाम पर रखा गया। पारंपरिक जहाज़ निर्माण तकनीकों का उपयोग करके इसे पूरी तरह से हाथ से बनाया गया था और दिलचस्प बात यह है कि इसके निर्माण में किसी भी धातु का उपयोग नहीं किया गया था। 27 मीटर लंबे इस जहाज़ को बनाने में एक साल का समय लगा। यह अब ओमान के एक संग्रहालय में रखा गया है।

अली मानिकफ़न का असली काम कैलेंडर से जुड़ा है। हिजरी कैलेंडर। उस समय इन्होंने बताया था कि पिछले 40-50 सालों से ये रोज़ सूर्योदय और सूर्यास्त का समय नोट करते आए हैं और चाँद की तारीखों को लेकर अपना एक अलग नज़रिया रखते हैं। इनका मानना है कि चाँद की तारीखों में भी एक गणित है और महज़ अंदाज़े से तारीखें नहीं बदलनी चाहिए। इनका यह भी मानना है कि मुसलमानों को हिजरी कैलेंडर के भिन्न-भिन्न सेट्स के इस्तेमाल करने के बजाए एक एकीकृत हिजरी कैलेंडर का इस्तेमाल करना चाहिए।

अली पर्यावरण और प्रकृति को ध्यान में रखते हुए उनके अनुकूल कृषि विधियों का पालन करते हैं। वे अपनी ज़मीन पर पवन-चक्की से स्वयं बिजली बनाते हैं और खेती करते हैं। उन्होंने अपने क्षेत्र में स्वाभाविक रूप से उपलब्ध पर्यावरण के अनुकूल सामग्रियों के साथ एक घर भी बनाया है।

उन्होंने साइकिल के पुर्ज़ों से एक रोलर-चालित मोटरसाइकिल का निर्माण भी किया जिसमें पुराने पावर स्प्रेयर मोटर लगे थे। शुरुआत में यह पेडलिंग द्वारा चालू होता था जब तक कि मोटर चालू नहीं हो जाती थी। इसी मोटर से उन्होंने अपने बेटे मूसा के साथ औसतन 60 से 70 किमी प्रति दिन की रफ़्तार से तमिलनाडु से नई दिल्ली का सफ़र किया था। हालांकि इसकी अधिकतम गति केवल 35 किमी / घंटा है। अली मानिकफ़न का दावा है कि यह एक पेट्रोल चालित दोपहिया वाहन की तुलना में काफ़ी सस्ता और कुशल है।

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